गुरुवार, 3 मार्च 2016

शुक्र है संसद चली तो सही


मंगलवार को बार-बार बाधित किए जाने के बाद, शु क्र है, बुधवार को संसद की कार्यवाही सुचारु रुप से चली तो सही। पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम के पुत्र कीर्ति और इशरत जहां पर पूर्व  गृह सचिव जीके पिल्लई के विवादास्पद बयान से  प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस सतारूढ दल के निशाने पर आ गई है। इसी कारण मंगलवार को विवादित मुद्दों पर गला फाड-फाड कर बोलते कांग्रेसी सदस्य बुधवार को दबे-दबे से नजर आए। भाजपा का आरोप है गुजरात की भाजपा सरकार और तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को बदनाम करने के लिए पी चिदंबरम ने इशरत जहां के मामले में गलत हलफनामा दायर किया था। सरकार ने बडी चतुराई से पी चिदंबरम मामले को आगे करके   पासा कांग्रेस पर ही पलट दिया है। इसी कारण राज्यसभा में सरकार अन्नाद्रमुक की मांग पर कीर्ति चिदंबरम  मामले में चर्चा  के लिए तैयार हो गई। लोकसभा में भी इस मामले में चर्चा  हुई और वित्त मंत्री ने साफ-साफ शब्दों में कहा कि सरकार दोषियों को कतई नही  बख्शेगी । स्पष्टतय,  इशारा पी चिदंबरम और उनके पुत्र  कीर्ति चिंदबरम की तरफ था। पिता-पुत्र एयरसेल-मैक्सिस घोटाले में आरोपी हैं और अन्नाद्रमुक उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग पर अडा हुआ है। इस दौरान यह भी खुलासा हुआ है कि कीर्ति की कंपनियों का व्यापार चौदह देशों  तक फैला हुआ है। इस मामले के उछाले जाने से अब तक “आक्रामक“ कांग्रेस रक्षात्मक मोड में आ गई है।  मंगलवार को लोकसभा में केन्द्रीय मंत्री रमा  शंकर कठेरिया द्वारा दिए गए विवादित बयान पर विपक्ष ने लोकसभा की कार्यवाही बाधित की थी। कठेरिया पर आरोप है कि उन्होंने आगरा में एक समुदाय विशेष  को “राक्षस“ बताते हुए बहुसंख्यक समुदाय से बदला लेने का आहवान किया था। कठेरिया के इस बयान से असहिष्णुता  का मुद्दा फिर अन्य मुद्दों पर फिर हॉवी हो सकता  है। विपक्ष को बैठे-बिठाए भाजपा को घेरने का मुद्दा मिल गया था। हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमूला के मामले में केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी पहले ही विपक्ष के निशाने पर है। इन मामलों में भाजपा और कांग्रेसके सद्स्य एक-दूसरे के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पेश  कर माहौल को  और ज्यादा तल्ख कर रहे हैं।  बुधवार को भाजपा के सदस्यों ने इशरत जहां मामले में विषेशाधिकार हनन  प्रस्ताव पेश  किए। पर गनीमत यह रही कि   आरंभ  के कुछ क्षणों को छोडकर बुधवार को संसद  शांतिपूर्वक चली और चर्चा भी हुई। आक्रामक विपक्ष से कैसे निपटा जाए, बुधवार को इस मसले पर भाजपा ने बैठक करके रणनीति  तय की और संसद में कांग्रेस पर हमला बोला।  कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर निशाना  साधते हुए काले धन को सफेद करने की बजटीय स्कीम  पर चुटकी ली। पक्ष और विपक्ष अभी भी सकारात्मक  की बजाय गतिरोध बनाने वाली भावना से चर्चा कर रहे हैं।  इससे यही निष्कर्ष   निकलता है कि राष्ट्र्पति  प्रणब मुखर्जी और राज्यसभा के सभापति उप-राष्ट्र्पति  हामिद अंसारी की “गतिरोध की बजाय चर्चा“ के आहवान का कोई ज्यादा असर नहीं हुआ है। सियासी दल  संसद में हर विवादित मुद्दे उछाल कर जनसेवा का कम, निहित हितों का ख्याल कहीं ज्यादा रख रहे हैं। निसंदेह, विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पेश  करना सांसदों का अधिकार है मगर इसे सियासी हितों के लिए इस्तेमाल करना स्वस्थ संसदीय परंपरा के खिलाफ है। सांसदों के “आक्रामक“ आचरण से यह भी स्पष्ट  है कि “गतिरोध“ का खुमार अभी भी उन पर सर चढ कर बोल रहा है। सासदों के आचरण को  जनमानस पारखी नजर से देखते हैं और इसका उनपर असर भी पडता है। कहावत हैं “जैसी राजा, वैसी प्रजा“। देश  के नेता और जन प्रतिनिधियों से आदर्श   आचरण की अपेक्षा की जाती है। संसद में एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने अथवा सियासी फायदे के लिए मुद्दे उठाने से मर्यादाओं  का ही निरादर होता है। और लोकतंत्र मर्यादाओं का निरादर करके फल-फूल नहीं सकता। सांसद और जन प्रतिनिधियों को इस सच्चाई को ग्राह्य करना ही होगा।