गुरुवार, 31 मार्च 2016

संवैधानिक संकट से बच गए

गंगोत्री की पावन भूमि उत्तराखंड में यह क्या हो रहा है? मोदी सरकार को स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराओं में जरा भी विश्वास  नहीं है। दल-बदल कानून के बावजूद देश  के लॉमेकर्स धडल्ले से “आया राम, गया राम “ को अंजाम दे रहे हैं। लॉमेकर्स  ही कानून का मखौल उडा रहे हैं और संवैधानिक पॉवर्स का दुरुपयोग किया जा रहा है।  विश्वास  मत हासिल करने से पहले ही केन्द्र सरकार ने हरीश  रावत सरकार को बर्खास्त कर  उत्तराखंड में राष्ट्रपति  शासन लगा दिया। कांग्रेस केन्द्र के फैसले के खिलाफ उव्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाती है और न्यायालय रावत को विश्वांस  मत हासिल करने के लिए वीरवार का दिन तय करती है। केद्र सरकार उच्च न्यायालय की इस व्यवस्था को इस बिला पर चुनौती देती है कि राज्य में  राष्ट्रपति  शासन लगने के बाद विधानसभा तब तक अस्थाई तौर पर निलंबित रहती है जब तक संवैधानिक व्यवस्था अनुच्छेद  356 को हटा नहीं दिया जाता। यानी जब तक राज्य से  षासन हटा नहीं लिया जाता, विधानसभा निलंबित रहती है। उच्च न्यायालय में बुधवार को केन्द्र की दलील थी कि राष्ट्रपति  शासन के बाद राज्य में न तो कोई लोकप्रिय सरकार है और विधानसभा भी अस्तित्व में नहीं है। इस स्थिति के मद्देनजर  खाली विधानसभा भवन में विश्वास  मत कैसे हासिल किया जा सकता है? उच्च न्यायालय ने केन्द्र से सहमति जताते हुए  विश्वास  मत वाली व्यवस्था पलट दी। बुधवार को उच्च न्यायालय ने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश  रावत को दी राहत निरस्त कर दी। मगर उच्च न्यायालय ने भी माना है कि लोकतंत्र में  विश्वास  मत ही सबसे उम्दा विकल्प है।  बहरहाल, उच्च न्यायालय की यह टिप्पणी अभी भी प्रासंगिक है कि केन्द्र ने विधानसभा में  विश्वास  मत का इंतजार क्यों नहीं किया?  बुधवार को उच्च न्यायालय ने फिर कहा कि  दो दिन में ऐसा कौनसा पहाड टूट जाता कि केन्द्र को आनन-फानन में राष्ट्रपति  शासन लगाना पडा। अगले सोमवार को केन्द्र  को उच्च न्यायालय को उन परिस्थितियों को बताना पडेगा जिनके तहत उतराखंड में राष्ट्रपति  शासन लगाना पडा। उच्च न्यायालय का मंगलवार का फैसला न केवल ऐतिहासिक था, अलबत्ता अभूतपृर्व भी था। उत्तराखंड में इस फैसले से दल-बदल करने वाले विधायकों की कलई खुल जाती।  विश्वास  मत के दौरान बागी विधायकों के आचरण पर उच्च न्यायालय की नजर रहती।  नौ बागी विधायकों की वोटिंग को अलग से सीलबंद लिफाफे में उच्च न्यायालय में पेश  किया जाना था। इन सब घटनाक्रम से लोकतंत्र मजबूत होता। राज्य में लोकप्रिय सरकार को अस्थिर करने में कांग्रेस के नौ बागी विधायकों का बहुत बडा हाथ है। और अब अगर  इन विधायकों की मदद से राज्य में सरकार बनती है, तो यह कानून का बहुत बडा मजाक होगा। अरुणाचल प्रदेश  में दल-बदलुओं की सरकार बनाकर भाजपा ने दल-बदल कानून का खुला मजाक उडाया है। जनमानस सियासी नेताओं से आदर्श  आचरण और कानून का सम्मान करने की उम्मीद रखता है। ऐेसे दल-बदल निरोधी कानून का  क्या फायदा जो दल=बदलुओं को सत्ता का सुख भोगने का मार्ग  प्रशस्त करे। दल-बदल कानून के तहत भी एक तिहाई विधायकों का बहुमत ही मूल पार्टी से अलग हो सकता है। अरुणाचल प्रदेश  के लॉमेकर्स  इसी कारण दल-बदल कानून से बच गए। उतराखंड में ऐसा नहीं है। वहां दल-बदलू नौ विधायक कांग्रेस विधायक दल की मौजूदा संख्या का एक-तिहाई नहीं है। इस वजह अगर वे पार्टी व्हिप का उल्लघंन कर विरोध में वोट करते हैं, तो दल-बदलू कानून में अयोग्य करार दिए जाते। उत्तराखंड में राष्ट्रपति  शासन लगाने की असली वजह भी यही है कि भाजपा विधानसभा अध्यक्ष द्वारा अयोग्य ठहराए गए नौ बागी विधयकों की मदद से सरकार नहीं बना सकी । मोदी सरकार ने देश  में स्वच्छ और पारदर्षी सरकार का वायदा कर रखा है।  लेकिन हाल ही के राजनीतिक घटनाक्रम स्वच्छ राजनीति के लक्षण  नहीं है। भाजपा भी कांग्रेस की तरह सत्ता पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। दल-बदल को जड से मिटाकर ही स्वच्छ राजनीति को सुनिश्चित  किया जा सकता है। लोकतंत्र में जनादेश  का सम्मान किया जाना चाहिए। पार्टी के टिकट पर चुने गए सांसद अथवा विधायक को पार्टी छोडने पर विधानसभा सदस्यता से भी इस्तीफा दे देना चाहिए। पंजाब में कुछ विधायकों ने ऐसा करके स्वस्थ परंपरा निभाई है। कानून में इस तरह की स्पष्ट  व्यवस्था होनी चाहिए।