आय और व्यय में सामंजस्य स्थापित कर सबकी जरुरतों को पूरा करना हर सफल बजट की प्रमुख विषेशता होती है। बजट परिवार को या देश का, इसकी विशेषताएं सभी को साफ -साफ नजर आनी चाहिए । मोदी सरकार के दूसरे नियमित से मध्यम वर्ग को आशा षा कम, निराशा कहीं ज्यादा हो रही है। लगभग हर वर्ग की जेब पर “डाका“ डालने के बावजूद बजट में बीस फीसदी पैसा कर्ज लेकर जुटाया गया है। मोदी सरकार का यह तीसरा बजट है। अरुण जेटली 2014-15 के लिए भी नौ माह का बजट पेश कर चुके हैं। । इस बजट में सबसे ज्यादा मार मध्यम वर्ग पर पडी है। अधिकांश कर रियायतें वापस ले ली गईं हैं। भाजपा ने लोकसभा चुनाव के दौरान लोगों से आयकर सीमा को संतोषजनक स्तर तक बढाने का वायदा किया था मगर अन्यों की तरह यह वायदा भी आज तक पूरा नहीं हो पाया है। इस बार आयकर सीमा में कोई बदलाव नहीं किया गया है। तीन लाख आय वालों को आयकर में मात्र 3000 की छूट महंगाई के इस जमाने में मजाक लगती है। हर कोई यही कहेगा कि भला यह भी कोई छूट हुई। किराये की छूट को सालान 24000 से बढाकर 60,000 रु बडी राहत मानी जा सकती है। महानगरों और बडे शहरों में रहने वालों के लिए यह छूट भी “ऊंट के मुंह में जीरा“ जैसी लग सकती है, मगर छोटे शहरों , कस्बों और ग्रामीण क्षत्रों में कार्यरत कर्मचारियों को इससे बडी राहत मिल सकती है। बजट में नए कर्मचारियों की प्रोविडेंट फंड में पहले तीन साल के अंशदान को सरकार द्वारा भरे जाने का लाभ उन कर्मचारियों को मिलने से रहा जिनकी कंपनियां पीएफ देती ही नहीं है। देश में आज भी 50 फीसदी से ज्यादा कंपनियां हैं, जो अपने कर्मचारियों को प्रोविडेंट फंड लागू ही नहीं करती हैं और कई मामलों में पीएफ का पैसा भी हजम कर जाती हैं। जेटली ने इस मामले भी चतुराई से पीएफ निकालने पर कर लगाकर जो राहत दी है, उसे वसूल लिया है। यानी वित्त मंत्री ने जितना इस हाथ से दिया है, उससे कहीं ज्यादा उस हाथ ले लिया है। सर्विस टैक्स तो बढाया नहीं मगर आधा फीसदी कृषि कल्याण सैस लगाकर उन सभी चीजों को महंगा कर दिया है जो आमतौर पर उपभोग की जाती है। बाहर खाना-पीना, सिनेमा देखना, हवाई यात्री करना, क्रेडिट कार्ड, इवेंटस, प्रॉपर्टी खरीदना, इन्शुरन्स जैसी हर चीज सैस लगने से मंहगी हो जाएंगी। और-तो-और फोन करना भी महंगा हो जाएगा। पिछले ही साल मोदी सरकार ने सर्विस टैक्स को 12.36 फीसदी से बढाकर 14 फीसदी कर दिया था और अब यह 14.50 फीसदी हो जाएगा। दो साल में दो फीसदी से भी ज्यादा की बढोतरी कुछ ज्यादा ही लग रही है। दस लाख से ज्यादा कार और डीजल गाडी खरीदने पर टैक्स, कोल्ड ड्रिंक और ब्रांडिड कपडों पर भी ज्यादा टैक्स। केबल कार या उडन खटोले में सैर करने पर भी टैक्स। कोयले पर टैक्स लगने से बिजली भी महंगी हो जाएगी। मध्यम वर्ग से जुडी कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिस पर कर बढाया न गया हो। ऐसे बजट पर मध्यम तबका यही कहेगा “तौबा, मेरी तौबा“? मोदी सरकार लगता है इस सच्चाई को भूल गई है कि यह वही तबका है जो भाजपा को सत्तारुढ करने में सबसे ज्यादा सक्रिय रहा है। कहते हैं“ रियायत वही जो तुरंत राहत दे़। दस-बीस साल बाद क्या होगा, इतना सब्र किसी के पास नहीं है। बजट को किसान और फॉर्मर फ्रेंडली बताया जा रहा है क्योंकि इसमें फार्म सेक्टर के बजट प्रावधान को लगभग दो गुना (90 फीसदी) कर दिया गया है। किसानों को दो लाख करोड रु का कर्जा बांटने का प्रावधान भी किया गया है। किसान यह सब बातें नहीं जानता। कर्ज में डूबा किसान और ज्यादा कर्ज लेने की स्थिति में ही नहीं है। इस कर्ज मेंसे भी बहुत बड़ी रकम कृषि की आड में पूंजीपति हडप जाएंगे। जिस तरह बडे उधोगपति बैकों का कर्जा हडप कर डिफाल्टर घोषित हो जाते हैं, ठीक उसी तरह बडे और रसूकदार जमींदार भी कर्ज लेकर उसे लौटाते ही नहीं है । किसान को अविलंब कर्ज से मुक्ति और फसल के दामों में पर्याप्त वृद्धि की दरकार है। बजट में पहली बार जवानों का कोई उल्लेख नहीं है और इससे पूर्व सैनिक खासे क्षुब्ध है। उधोग-व्यापार जगत ने भी सकारात्मक प्रतिकिया व्यक्त नहीं की है। बजट के बाद सोमवार सेंसेक्स 152 अंक गिरकर बंद हुआ। प्रधानमंत्री और भाजपाई भले ही जेटली के बजट को “प्रो-फार्मर, प्रो-विलेज और प्रो-पुअर“ बताएं मगर जिस बजट से ज्यादातर तबके संतुष्ट न हों, उसे “प्रो“ नहीं माना जा सकता।
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