राज्यपाल की सक्रियता
हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने राजभवन में मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति में राज्य के आला अधिकारियों से बैठक करके फिर से नई परंपरा शुरु की है। राज्यपाल ने पांच घंटे तक आला अधिकारियों से राज्य के हालात का जायजा लिया। इस बैठक में राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) एवं अतिरिक्त मुख्य सचिव, विभागाध्यक्षों के अलावा कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। राज्यपाल ने मंत्रियों को भी बुलाया था मगर षिमला में मौजूद रहने के बावजूद कोई भी मंत्री इस बैठक में नहीं गया। मुख्यमंत्री उस समय दिल्ली में थे। जाहिर है पूरा मामला राजनीतिक था। राज्यपाल की इस शुरुआत से कांग्रेस का लीला-पीला होना स्वभाविक है ।मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति में और उनकी सहमति के बगैर आला अधिकारियों की बैठक बुलाकर आचार्य देवव्रत ने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं किया है। राज्यपाल राज्य में संवैधानिक मुखिया होता है और वह मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल की सलाह से काम करता है। संविधान के अनुच्छेद 167 में स्पष्ट तौर पर आपातकाल को छोडकर राज्यपाल को मुख्यमंत्री से ही जानकारी लेने की व्यवस्था की गई है। राज्यपाल सीधे तौर पर मंत्रियों अथवा नौकरशाही से जानकारी नहीं ले सकते। संविधान पीठ ने राज्यपाल की भूमिका को तय करते समय इस बात का पूरा ध्यान रखा था कि राज्यपाल अथवा मुख्यमंत्री में किसी भी स्थिति में टकराव न होे। इस टकराव का ख्याल करते हुए निर्वाचित राज्यपाल के विकल्प को सिरे से खारिज कर दिया गया था। संघीय ढांचे के अनुरुप राज्यपाल को केन्द्र में प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल की सलाह पर काम कर रहे राश्ट्रपति की तरह राज्य में संवैधानिक प्रमुख की भूमिका दी गई है। यानी संविधान निर्माताओं ने राज्यपाल को तट्स्थ संवैधानिक प्रमुख माना था। संविधान की रक्षा तथष्ट एवं निष्पक्ष राज्यपाल ही कर सकता है। इसी भूमिका के दृष्टिगत राज्यपाल के पद को गरिमापूर्ण बनाया गया था। देेष में जवाहर लाल नेहरु के कार्यकाल को छोडकर, राज्यपाल की गरिमा में उतरोतर गिरावट आती गई। और अब हालात यह है कि राजनीति में नकारा अथवा सताधारी दल के करीबी लोगों को राज्यपाल जैसे गरिमापूर्ण पद पर नियुक्त किया जाता है। इंदिरा गांधी के समय से शुरु हुई यह रिवायत आज तक बदस्तूर जारी है। इंदिरा गांधी सरकार के समय राज्यपाल केन्द्र का एजेंट बनकर रह गए थे। स्मरण करें 1984 में केन्द्र सरकार के इशारे पर किस तरह आन्ध्र प्रदेश में तत्कालीन राज्यपाल ठाकुर राम लाल ने स्पष्ट बहुमत के बावजूद एनटी रामाराव की सरकार को बर्खास्त कर एन भास्कर राव को मुख्यमंत्री बना दिया था। यह बात दीगर है कि यह सरकार 31 दिन में ही गिर गई और राम लाल को राज्यपाल का पद छोडना पडा था । कांग्रेस के समय ही नहीं राजग सरकार के समय भी यही हाल रहा। 2002-03 में राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल अंशुमन सिंह ने अपने कार्यालय का भगवाकरण करके पद की गरिमा को जबरदस्त ठेस पहुंचाई थी। इसी स्थिति के दृष्टिगत , संविधान में स्पष्ट भूमिका तय होने के बावजूद, राज्यपाल की “सक्रियता“ को लेकर जब-तब चर्चा शुरु हो जाती है। 1971 में राज्यपाल की भूमिका की समीक्षा के लिए गठित भगवान सहाय समिति ने माना था कि राज्यपाल के पद की गरिमा में खासी गिरावट आई है। 1988 में केन्द्र और राज्यों के संबंधों की समीक्षा के लिए गठित सरकारिया आयोग ने कहा था कि संघीय ढांचे को मजबूत करने में राज्यपाल की अहम भूमिका होती है और अगर राज्यपाल अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं करता है तो केन्द्र और राज्यों के संबंध बिगड सकते हैं। इस स्थिति से बचने के लिए सरकारिया आयोग ने सिफारिश की थी कि सत्तारूढ दल से संबंधित व्यक्ति को कदाचित राज्यपाल पद पर नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए। किसी भी दल ने इस सिफारिश को नहीं माना। हिमाचल की ताजा स्थिति इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि राज्यपाल सत्तारूढ दल का नुमाइंदा नहीं होना चाहिए। अब अगर राष्ट्रपति मंत्रियों को तलब करके केन्द्र में प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में आला अधिकारियों की बैठक करें और उन्हें निर्देश दें, तो मोदी सरकार को कैसा लगेगा?
हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने राजभवन में मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति में राज्य के आला अधिकारियों से बैठक करके फिर से नई परंपरा शुरु की है। राज्यपाल ने पांच घंटे तक आला अधिकारियों से राज्य के हालात का जायजा लिया। इस बैठक में राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) एवं अतिरिक्त मुख्य सचिव, विभागाध्यक्षों के अलावा कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। राज्यपाल ने मंत्रियों को भी बुलाया था मगर षिमला में मौजूद रहने के बावजूद कोई भी मंत्री इस बैठक में नहीं गया। मुख्यमंत्री उस समय दिल्ली में थे। जाहिर है पूरा मामला राजनीतिक था। राज्यपाल की इस शुरुआत से कांग्रेस का लीला-पीला होना स्वभाविक है ।मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति में और उनकी सहमति के बगैर आला अधिकारियों की बैठक बुलाकर आचार्य देवव्रत ने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं किया है। राज्यपाल राज्य में संवैधानिक मुखिया होता है और वह मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल की सलाह से काम करता है। संविधान के अनुच्छेद 167 में स्पष्ट तौर पर आपातकाल को छोडकर राज्यपाल को मुख्यमंत्री से ही जानकारी लेने की व्यवस्था की गई है। राज्यपाल सीधे तौर पर मंत्रियों अथवा नौकरशाही से जानकारी नहीं ले सकते। संविधान पीठ ने राज्यपाल की भूमिका को तय करते समय इस बात का पूरा ध्यान रखा था कि राज्यपाल अथवा मुख्यमंत्री में किसी भी स्थिति में टकराव न होे। इस टकराव का ख्याल करते हुए निर्वाचित राज्यपाल के विकल्प को सिरे से खारिज कर दिया गया था। संघीय ढांचे के अनुरुप राज्यपाल को केन्द्र में प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल की सलाह पर काम कर रहे राश्ट्रपति की तरह राज्य में संवैधानिक प्रमुख की भूमिका दी गई है। यानी संविधान निर्माताओं ने राज्यपाल को तट्स्थ संवैधानिक प्रमुख माना था। संविधान की रक्षा तथष्ट एवं निष्पक्ष राज्यपाल ही कर सकता है। इसी भूमिका के दृष्टिगत राज्यपाल के पद को गरिमापूर्ण बनाया गया था। देेष में जवाहर लाल नेहरु के कार्यकाल को छोडकर, राज्यपाल की गरिमा में उतरोतर गिरावट आती गई। और अब हालात यह है कि राजनीति में नकारा अथवा सताधारी दल के करीबी लोगों को राज्यपाल जैसे गरिमापूर्ण पद पर नियुक्त किया जाता है। इंदिरा गांधी के समय से शुरु हुई यह रिवायत आज तक बदस्तूर जारी है। इंदिरा गांधी सरकार के समय राज्यपाल केन्द्र का एजेंट बनकर रह गए थे। स्मरण करें 1984 में केन्द्र सरकार के इशारे पर किस तरह आन्ध्र प्रदेश में तत्कालीन राज्यपाल ठाकुर राम लाल ने स्पष्ट बहुमत के बावजूद एनटी रामाराव की सरकार को बर्खास्त कर एन भास्कर राव को मुख्यमंत्री बना दिया था। यह बात दीगर है कि यह सरकार 31 दिन में ही गिर गई और राम लाल को राज्यपाल का पद छोडना पडा था । कांग्रेस के समय ही नहीं राजग सरकार के समय भी यही हाल रहा। 2002-03 में राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल अंशुमन सिंह ने अपने कार्यालय का भगवाकरण करके पद की गरिमा को जबरदस्त ठेस पहुंचाई थी। इसी स्थिति के दृष्टिगत , संविधान में स्पष्ट भूमिका तय होने के बावजूद, राज्यपाल की “सक्रियता“ को लेकर जब-तब चर्चा शुरु हो जाती है। 1971 में राज्यपाल की भूमिका की समीक्षा के लिए गठित भगवान सहाय समिति ने माना था कि राज्यपाल के पद की गरिमा में खासी गिरावट आई है। 1988 में केन्द्र और राज्यों के संबंधों की समीक्षा के लिए गठित सरकारिया आयोग ने कहा था कि संघीय ढांचे को मजबूत करने में राज्यपाल की अहम भूमिका होती है और अगर राज्यपाल अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं करता है तो केन्द्र और राज्यों के संबंध बिगड सकते हैं। इस स्थिति से बचने के लिए सरकारिया आयोग ने सिफारिश की थी कि सत्तारूढ दल से संबंधित व्यक्ति को कदाचित राज्यपाल पद पर नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए। किसी भी दल ने इस सिफारिश को नहीं माना। हिमाचल की ताजा स्थिति इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि राज्यपाल सत्तारूढ दल का नुमाइंदा नहीं होना चाहिए। अब अगर राष्ट्रपति मंत्रियों को तलब करके केन्द्र में प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति में आला अधिकारियों की बैठक करें और उन्हें निर्देश दें, तो मोदी सरकार को कैसा लगेगा?






