“बलात्कारी“ भी जुवेनाइल होता है क्या?
क्या बलात्कार जैसे जघन्य कृत्य करने वाले बाल अपराधी को उसके संगीन जुर्म केे लिए कडी सजा नहीं दी जानी चाहिए? बलात्कारी तो बलात्कारी ही होता है, फिर कानून उमर का भेदभाव क्यों करता है? बाल अपराधी को सुधार का मौका देकर कानून क्या उसे अपराध करने का अवसर नहीं दे रहा है? देश का जुवेनाइल कानून कितना न्यायसंगत है? दिल्ली में दिसंबर 2012 में निर्भय सामूहिक बलात्कार के संदर्भ में केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी ने इस तरह के कई सवाल उठाए हैं। निर्भय गैंग रेप कांड का नाबालिग आरोपी इस दिसंबर को बाल सुधार गृह से छूटकर बाहर आ रहा है। यह आरोपी बलात्कारी है, अदालत में उसका अपराध सिद्ध हो चुका था मगर नाबालिग होने की वजह से उसे तीन साल तक बाल सुधार गृह में रहने की सजा दी गई। मेनका ने सोमवार को यह कहकर एक नई बहस छेड दी है कि बाल गृह से बाहर आने के बाद उस पर (बलात्कारी) निगरानी रखने की जरुरत है। साफ-साफ कहें तो केन्द्रीय मंत्री को आशंका है कि वह फिर से “बलात्कार“ जैसा संगीन अपराध कर सकता है क्योंकि कानून ने उसे अन्य अपराधियों की तरह कडी सजा नहीं दी है। उनकी यह आशंका निर्मूल भी नहीं है । मेनका गांधी की तरह देश में अधिकांश लोगों का भी यह मानना है कि निर्भय सामूहिक बलात्कार में इंसाफ नहीं हुआ है, भले ही कानून ने अपना काम किया हो। छह लोगों के सामूहिक बलात्कार से 23 वर्षीय निर्भय (असली नाम नहीं) की मौत हो गई थी। इस संगीन जुर्म में नाबालिग “बलात्कारी“ भी उतना ही दोषी था, जितने अन्य थे। इस जघन्य अपराध में कुल मिलाकर छह लोग शामिल थे। इनमें से एक नाबालिग था। चार बलात्कारियों को अदालत ने सितंबर 2013 में मौत की सजा सुनाई। दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी फांसी की सजा बरकरार रखी है। फिलहाल मामला सर्वोच्च न्यायालय में है। न्यायालय ने चारों की फांसी पर रोक लगा रखी है। पांचवें अपराधी ने तिहार जेल में फंदा लगाकर खुदकुशी कर ली थी। कुल मिलाकर, निर्भय के चार बलात्कारियों को फांसी की सजा, पांचवें की खुदकुशी मगर नाबालिग को मात्र बाल सुधार गृह की सजा और फिर तीन साल बाद आजादी। विडंबना यह है कि दिसंबर 2012 के छह माह बाद “नाबालिग बलात्कारी“ बालिग होने वाला था। और बलात्कार के समय वह बालिग होता, तो उसे भी फाँसी दी जा सकती थी। पूरा देश यही कह रहा है, “यह कहां का इंसाफ“। इस इंसाफ से निर्भय के माता-पिता के जख्मों पर सिर्फ नमक छिडका है और अब दिसंबर में जब “नाबालिग बलात्कारी“ आजाद हो जाएगा, निर्भय की “ आत्मा“ को भी शांति नहीं मिल पाएगी। देश में हर बडी से बडी और ज्वलंत से ज्वलंत समस्या का फौरी तौर पर निदान करने का चलन है। कुछ समय तक पूरा देश उबलता है, फिर सब कुछ भुला दिया जाता है। निर्भय गैंग रेप केस में भी यही हुआ। कुछ दिनों तक पूरा देश उबलता रहा। सरकार ने जुवेनाइल कानून की समीक्षा के लिए एक न्यायिक समिति भी बना ली। समिति को पूरे देश से अस्सी हजार से ज्यादा सुझाव मिले। समिति ने निर्भय जैसी सामूहिक बलात्कार कांड का ठीकरा पुलिस और प्रशासन के सिर पर फौड दिया। सरकार ने 2013 में क्रिमिनिल लॉ को संषोधित करने के लिए अध्यादेश भी जारी कर दिया। बलात्कर के मामलों की सुनवाई के लिए छह नई फास्ट-ट्रैक अदालतें खोली गईं मगर जुवेनाइल की उमर 18 साल ही रखी गई। इसलिए, नाबालिग बच निकला। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार भारत में हर रोज 92 महिलाएं बलात्कार का शिकार होती हैं। चौंकाने वाल तथ्य यह है कि 96 फीसदी “बलात्कारी“ पीडिता के परिचित होते हैं और 20 फीसदी के करीब नाबालिग और 70 फीसदी से भी ज्यादा पीडिता नाबालिग। हर साल बलात्कार के मामले उतरोत्तर बढ रहे हैं। मद्रास उच्च न्यायालय ने हाल ही में केन्द्र सरकार को बच्चियों से बलात्कार करने वालों को “नपुसंक“ बनाने की सजा का प्रावधान करने को कहा है। इससे पता चलता है कि देश बलात्कार की घटनाओं से किस कद्र चिंतित है। केन्द्रीय मंत्री और न्यायपालिक भी अगर बलात्कार की घटनाओं से जुडी न्यायप्रकिया से संतुष्ट नहीं है, तो सरकार को मामले पर गंभीरता से सोचने की जरुरत है।






