बुधवार, 25 नवंबर 2015

Dress Code in God House ? Isn't It An Insult To Almighty

                                           मंदिर में ड्रेस कोड

काशी  के नाम से विख्यात वाराणसी के विश्व  विख्यात विश्व्नाथ  मंदिर में ड्रेस कोड  के क्या अभिप्राय निकाले जाएं? असहिष्णुता   के मौजूदा माहौल में विश्व्नाथ  मंदिर की इस कवायद से भारत को विदेशों  में फिर धार्मिक असहिष्णुता  का प्रतीक माना जा सकता है।  सबसे बडी बात यह है कि सिर्फ महिलाओं के लिए ड्रेस कोड लागू किया गया है हालांकि मंदिर प्रशासन कह रहा है कि  पुरूषों   के लिए भी जल्द ही धोती-कुर्ता ड्रेस कोड लागू किया जाएगा। काशी  का विश्व्नाथ मंदिर बारह ज्योतिर्लिगों मेंसे एक है और देश -विदेश  से  श्रद्धालुओं के अलावा पर्यटक भी मंदिर में  दर्शनार्थ   आते हैं। जाहिर है ड्रेस  कोड लागू होने से मंदिर में महिलाओं, विशेषकर विदेशियों का आना रुक सकता है । विश्व्नाथ मंदिर में हर रोज लगभग 60,000 श्रद्धालू आते हैं। इनमें से करीब 5 फीसदी विदेशी  पर्यटक होते हैं। विदेशी  महिलाओं के तंग और छोटे परिधान (शॉर्ट   ड्रेसिस) पर  कुछ लोगों द्वारा  ऐतराज जताए जाने पर  मंदिर प्रषाासन ने यह कदम  उठाया है। मंदिर प्रबंधन के अनुसार  विदेशी  महिलाओं  के  तडक-भडक वाले परिधान पर दक्षिण भारत से आने वाले श्रद्धालुओं को ऐतराज होता था। उनका मानना है कि तंग और शॉर्ट   परिधान मंदिर की पवित्रता को प्रदूषित करते हैं। विश्व्नाथ मंदिर प्रशासन को महिलाओं के जीन्स अथवा शॉर्ट   पहने पर ऐतराज है मगर पुरूषों को जीन्स अथवा पैंट पहनने की छूट है। स्पष्ट  है ड्रेस कोड फिलहाल महिलाओं के लिए ही है। दक्षिण के कुछ मंदिरों ने श्रद्धालुओं के लिए ड्रेस कोड लागू कर रखा है मगर यह पुरूष और महिला दोनों के लिए है। दक्षिण में आंध्र प्रदेश  के तिरुमला  स्थित तिरुपति देवस्थली में भी 2013 से श्रदालुओं के लिए ड्रेस कोड लागू है। मंदिर में महिलाओं के लिए साडी अथवा चुन्नी के साथ चुडीधार परिधान निर्धारित किया गया है। कोई भी महिला  जीन , शॉर्ट अथवा  पश्चिम  स्टाइल के वस्त्र पहनकर मंदिर नहीं आ सकती। पुरूषों के लिए लुंगी अथवा धोती-कुर्ता निर्धारित किया गया है। विदेशी  पर्यटकों को भी यही ड्रेस पहनकर मंदिर में प्रवेश  करने दिया जाता है। दक्षिण के कुछ और मंदिरों में भी इसी तरह का ड्रेस कोड लागू है। दक्षिण भारत में साडी और धोती-कुर्ता  बहुत ज्यादा प्रचलित है। इस बात के दृष्टिगत मंदिरों में स्थानीय ड्रेस कोड का अपना महत्व है। काशी   विश्वनाथ  मंदिर प्रबंधन ने दक्षिण भारत के श्रद्धालुओं की भावनाओं का सम्मान रखने की खातिर महिलाओं के लिए ड्रेस कोड लागू किया है, यह बात सहज में गले नहीं उतरती है। फिर महिलाओं के लिए ही ड्रैस कोड क्यों? पुरूषों के लिए भी साथ-साथ ड्रेस कोड क्यों लागू नहीं किया गया? तडक-भडक वाले परिधान विदेशी  महिलाएं ही नहीं पुरूष भी पहनते है। और भारत में तो नगा साधु नंगे घूमते हैं और कुंभ में बाकायदा अपनी शोभायात्रा निकालते हैं। कहीं, यह भगवा एजेंडे का हिस्सा तो नहीं है़? वाराणसी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का हलका है। यहां भगवा पार्टी का ज्यादा बोलबाला है।  बहरहाल,  सहिष्णुताऔर धार्मिक विविधता भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रही है। भगवान के घर में कैसा ड्रेस कोड  और कैसी तडक-भडक। सच यह है कि धर्म के ठेकेदारों को आज भी महिलाओं की आजादी रास नहीं आ रही है। इसलिए महिलाओं को सम्मान देने की बजाय पुरुष  प्रधान भारतीय समाज आज भी उन्हें सेक्स की ही नजर से देखता है। भला, यह भी कोई बात हुई कि भगवान के घर में महिलाओं की ताक-झांक की जाए और यह देखा जाए कि वे क्या पहन कर मंदिर आती हैं। पश्चिम  में महिलाओं को पूरी आजादी है और शॉर्ट  ड्रेस पहनना उनकी पहचान है। भारतीय युवा पीढी भी उदारख्याली है और उन पर धार्मिक  बंदिशें नहीं चल सकती। काशी  विश्व्नाथ  मंदिर प्रशासन ने ड्रेस कोड निर्धारित कर फिर यही प्रमाणित किया है देवस्थल भी धार्मिक असहिष्णुता से पीडित हैं। असहिष्णुता भारतीय समाज और सस्कृति की “अनेकता (विविधता) में एकता“ की मूल भावना को नष्ट  कर सकती है।