शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

Sink Political Differences And Let Parliament Pass GST Bill

                                          जीएसटी बिल को पारित होने दें


संसद के  शीतकालीन सत्र में क्या विपक्ष सरकारी कामकाज के निपटान में मदद करेगी? असहिष्णुता  को लेकर देश  में सत्तारूढ और विपक्ष के बीच टकराव एवं अविष्वास  के माहौल में  यह बहुत बडा सवाल है।  राज्यसभा में गुडस एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) बिल को पारित करवाना  मोदी सरकार के समक्ष सबसे बडी चुनौती है। लोकसभा तो इस बिल को पारित कर चुकी है मगर राज्यसभा में  स्पष्ट बहुमत नहीं होने की वजह से जीएसटी बिल अब तक पारित नहीं हो पाया है। जीएसटी संवैधानिक संशोधन बिल है, इसलिए इस बिल को पारित करवाने के लिए सरकार को राज्यसभा में भी दो-तिहाई बहुमत की  जरूरत  है। कांग्रेस  के समर्थन बगैर जीएसटी बिल राज्यसभा में पारित नहीं हो सकता। और अगर यह बिल मौजूदा सत्र में परित नहीं होता है, अप्रैल, 2016 से इसे लागू करना संभव नहीं हो पाएगा। जीएसटी बिल के पारित होने से केन्द्र और राज्यों द्वारा लगाए जा रहे विभिन्न कर और शुल्क निरस्त होकर इनका जीएसटी में समावेश  हो जाएगा। इससे  देश  में कॉमन मार्केट अस्तित्व में आ जाएगी। जीएसटी के अस्तित्व में आने से केन्द्र और राज्यों के राजस्व में खासा इजाफा होगा। अनुमान है कि जीएसटी के लागू होने से अन्तोगत्वा  देश  का सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) 2 फीसदी से भी ज्यादा बढ सकता है। कांग्रेस इस स्थिति से बखूबी परिचित है, इसलिए भाव दिखा रही है। भूमि अधिग्रहण बिल पर कांग्रेस से मुंह की खाने के बाद मोदी सरकार के लिए जीएसटी बिल पारित करवाना प्रतिष्ठा  का सवाल बन गया है। देश  में विदेशी  निवेश  को आकर्षित  करने के लिए उधोग फ्रेंडली भूमि अधिग्रहण व्यवस्था की आज भी दरकार है। 2013 में मनमोहन सिंह सरकार द्वारा संशोधित भूमि अधिग्रहण बिल के कारण बडे उधोग स्थापित करने के लिए भूमि का अधिग्रहण करना अथवा खरीदना लगभग असंभव हो गया है। मौजूदा कानून में प्रावधान है कि जब तक कम-से-कम अस्सी फीसदी किसान अथवा भूमि मालिक अधिग्रहण अथवा जमीन बेचने के लिए राजी नहीं हो जाते, तब तक भूमि खरीदी या अधिग्रहीत  नहीं की जा सकती। मोदी सरकार इस कानून में कुछ बदलाव करके इसे उधोग फ्रेंडली बनाना चाहती थी मगर कांग्रेस समेत विपक्ष और भाजपा के सहयोगी दलों ने ऐसा नहीं होना दिया। भूमि अधिग्रहण पर तीन बार अध्यादेश  जारी होने के बावजूद मोदी सरकार को अततः इसे वापस लेना पडा। भूमि अधिग्रहण बिल की ही तरह कांग्रेस जीएसटी बिल से भी अपनी “राजनीतिक रोटियां“ सेंकना चाहती हैं। इसलिए, पार्टी मोदी सरकार पर इस बिल को पारित करवाने में मदद के लिए मोल-तोल कर रही है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने इस बिल पर पार्टी के समर्थन के लिए मोदी सरकार के समक्ष तीन  शर्तें रखी हैं। पहली और सबसे महत्वपूृर्ण शर्त है कि मैन्युफेक्चर्र  (उत्पादकों) पर एक फीसदी कर न लगाया जाए। जीएसटी बिल में अंतरराज्यीय (इंटर-स्टेट) गुडस और सर्विस पर एक फीसदी अतिरिक्त कर लगाने का प्रस्ताव है। देश  का उधोग और व्यापार जगत इसका पहले ही मुखर विरोध कर रहा है। अब कांग्रेस उनकी पैरवी कर रही है। उधोग एवं व्यापार जगत का कहना है कि अगर जीएसटी में भी अतिरिक्त कर लगाना है, तो इस व्यवस्था का क्या मतलब? कांग्रेस जीएसटी रेट की अधिकतम सीमा 18 फीसदी की संवैधानिक व्यवस्था के पक्ष में है। पार्टी  जीएसटी से संबंधित मामलों के निपटान के लिए स्वायत व्यवस्था की भी मांग कर रही है। कांग्रेस की तीनों मांगें पूरा करना  मोदी सरकार के लिए मुश्किल  नहीं है। ताजा संकेत यही है कि सरकार इन मांगों पर विचार कर सकती है। वैसे जीएसटी बिल पर कांग्रेस अलग-थलग पड चुकी है। अधिकतर विपक्षी दल बिल को मौजूदा सत्र में ही पारित होने देने के पक्ष में है। इस मामले में पहले ही बहुत देर हो चुकी है। अब और ज्यादा नहीं। जीएसटी बिल को पारित करवाना देश  हित में है।