शानदार जीत, जबरदस्त डिफ्टि....
बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम अभूतपूर्व और ऐतिहासिक हैं। नीतिश कुमार-लालू प्रसाद यादव के महागठबंधन की “शानदार जीत, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा नीत गठबंधन की जबरदस्त डिफ्टि सिर्फ और सिर्फ एक ही संदेश देती हैः “लोकतंत्र जिंदाबाद“। विधनसभा चुनाव नीतिश कुमार की स्वच्छ छवि और सुशासन के कारण जीते गए अथवा लालू प्रसाद के प्रति “सहानुभूति“ के चलते, कारण कुछ भी रहें हों, एक बात एकदम साफ है कि अन्तोगत्वा बिहार में लोकतंत्र जीता है। विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले अगस्त, 2015 में प्रधानमंत्री द्वारा बिहार को दिया गया 1.25 लाख करोड का विशेष आर्थिक पैकेज भी भाजपा के काम नहीं आया और न ही राजग मुखिया लालू प्रसाद के कार्यकाल को “जंगल राज“ बताने की उग्र बातें। गाय, हिंन्दुत्व और “महागठबंधन जीतेगा तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे“ (भाजपा अध्यक्ष अमित षाह के बोल) जैसे नारे भी मतदाताओं का ध्रुवीकरण नहीं करा पाए। प्रधानमंत्री का उग्र प्रचार और तीस जनसभाएं भी नीतिश -लालू के महागठबंधन में सेंध नहीं लगा पाई। 30 केन्द्रीय मंत्री और भारी-भरकम चुनावी लाव-लश्कर भी क्षत्रपों की लोकप्रियता को मात नहीं दे पाए। इसके क्या मायने लगाए जाएं? क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति जनता का मोहभंग हो गया है? अथवा मोदी के पास अब लोक-लुभावनी नारें का टोटा पड गया है। जुमां-जुमां डेढ साल पहले लोकसभा चुनाव में बिहार की जनता ने भाजपा नीत राजग को प्रचंड जनादेश (40 मेंसे 31 सीटें) दिया था। डेढ साल के दौरान ऐसा क्या हो गया कि उसी जनता ने भाजपा का करीब-करीब सुपडा ही साफ कर दिया। चुनाव परिणाम जनता का सुस्पष्ट जनादेश है कि “ अगर आप हमारे लिए अच्छे दिन नहीं ला सकते, तो हम आपके लिए भी नहीं लाएंगे“। प्रधानमंत्री ने बिहार के मतदाताओं को लुभाने के हरसंभव प्रयास की मगर बिहार की जनता बेहद परिपक्व निकली। बिहारियों ने पूरे देश को दिखा दिया है कि विधानसभा चुनाव में जनादेश किन-किन बातों को सामने रखकर दिया जाता है और लोकतंत्र को कैसे मजबूत किया जाता है। बिहार के मतदाताओं ने सभी राजनीतिक दलों को धैर्य से सुना, जांचा-परखा और फिर अपना फैसला सुनाया । और जैसा कि आज तक होता रहा है, जनता ने बलवान और अहंकारी को नकार कर “प्रताडित“ को चुना। इस बार के विधानसभा चुनाव में जनता ने लालू प्रसाद और नीतिश कुमार को प्रताडित माना और मोदी और भाजपा को बलवान। लोकसभा चुनाव में जनता के लिए मोदी और भाजपा प्रताडित थे और नीतिश कुमार बलवान। बार-बार मुंह की खाने के बावजूद समकालीन सियासी दल अक्सर भूल जाते हैं कि देश की जनता हमेशा बलवान को नकारती रही है और प्रताडित को अपना आषीर्वाद देती रही है। लालू प्रसाद यादव के शासन को “जंगल राज“ कहकर प्रधानमंत्री ने पिछडों और गरीब तबकों के अहं को ललकारा था। ये तबके लालू प्रसाद को चारा घोटाले में फंसाना भी एक गहरी साजिश का हिस्सा मानते हैं। विधानसभा चुनाव में लालू पर तीखे आक्रमण करके भाजपा ने लालू को “नायक“ से “महानायक“ बना दिया। यही वजह है कि विधानसभा चुनाव में लालू की पार्टी को सबसे ज्यादा 80 सीटें मिली हैं। कांग्रेस का प्रदर्शन और भी बेहतर रहा है। पार्टी ने नीतिश -लालू के साथ मिलकर 41 सीटें लडीं और 27 पर जीत हासिल की है। लालू का यादव और मुसलमानों और पिछडे तबकों में पक्का जनाधार है। लोकसभा चुनाव में भी लालू के राजद को 20 फीसदी से ज्यादा ज्यादा वोट मिले थे। नीतिश कुमार के जनता दल (यू) को 15.80 फीसदी। भाजपा को लोकसभा चुनाव में 29. 40 फीसदी वोट मिले थे। विधानसभा चुनाव में भाजपा नीत राजग को 34 फीसदी वोट मिले मगर सीटें सिर्फ 58 ही मिल पाईं। नीतिश कुमार और लालू प्रसाद के महागठबंधन को 42 फीसदी वोट से 178 सीटें मिलीं है। चुनावी गणित साफ-साफ बताता है कि एकता ने बहुत बडी भूमिका निभाई है। और यही गणित अब राश्ट्रीय स्तर पर बडा बदलाव ला सकता है।
बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम अभूतपूर्व और ऐतिहासिक हैं। नीतिश कुमार-लालू प्रसाद यादव के महागठबंधन की “शानदार जीत, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा नीत गठबंधन की जबरदस्त डिफ्टि सिर्फ और सिर्फ एक ही संदेश देती हैः “लोकतंत्र जिंदाबाद“। विधनसभा चुनाव नीतिश कुमार की स्वच्छ छवि और सुशासन के कारण जीते गए अथवा लालू प्रसाद के प्रति “सहानुभूति“ के चलते, कारण कुछ भी रहें हों, एक बात एकदम साफ है कि अन्तोगत्वा बिहार में लोकतंत्र जीता है। विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले अगस्त, 2015 में प्रधानमंत्री द्वारा बिहार को दिया गया 1.25 लाख करोड का विशेष आर्थिक पैकेज भी भाजपा के काम नहीं आया और न ही राजग मुखिया लालू प्रसाद के कार्यकाल को “जंगल राज“ बताने की उग्र बातें। गाय, हिंन्दुत्व और “महागठबंधन जीतेगा तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे“ (भाजपा अध्यक्ष अमित षाह के बोल) जैसे नारे भी मतदाताओं का ध्रुवीकरण नहीं करा पाए। प्रधानमंत्री का उग्र प्रचार और तीस जनसभाएं भी नीतिश -लालू के महागठबंधन में सेंध नहीं लगा पाई। 30 केन्द्रीय मंत्री और भारी-भरकम चुनावी लाव-लश्कर भी क्षत्रपों की लोकप्रियता को मात नहीं दे पाए। इसके क्या मायने लगाए जाएं? क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति जनता का मोहभंग हो गया है? अथवा मोदी के पास अब लोक-लुभावनी नारें का टोटा पड गया है। जुमां-जुमां डेढ साल पहले लोकसभा चुनाव में बिहार की जनता ने भाजपा नीत राजग को प्रचंड जनादेश (40 मेंसे 31 सीटें) दिया था। डेढ साल के दौरान ऐसा क्या हो गया कि उसी जनता ने भाजपा का करीब-करीब सुपडा ही साफ कर दिया। चुनाव परिणाम जनता का सुस्पष्ट जनादेश है कि “ अगर आप हमारे लिए अच्छे दिन नहीं ला सकते, तो हम आपके लिए भी नहीं लाएंगे“। प्रधानमंत्री ने बिहार के मतदाताओं को लुभाने के हरसंभव प्रयास की मगर बिहार की जनता बेहद परिपक्व निकली। बिहारियों ने पूरे देश को दिखा दिया है कि विधानसभा चुनाव में जनादेश किन-किन बातों को सामने रखकर दिया जाता है और लोकतंत्र को कैसे मजबूत किया जाता है। बिहार के मतदाताओं ने सभी राजनीतिक दलों को धैर्य से सुना, जांचा-परखा और फिर अपना फैसला सुनाया । और जैसा कि आज तक होता रहा है, जनता ने बलवान और अहंकारी को नकार कर “प्रताडित“ को चुना। इस बार के विधानसभा चुनाव में जनता ने लालू प्रसाद और नीतिश कुमार को प्रताडित माना और मोदी और भाजपा को बलवान। लोकसभा चुनाव में जनता के लिए मोदी और भाजपा प्रताडित थे और नीतिश कुमार बलवान। बार-बार मुंह की खाने के बावजूद समकालीन सियासी दल अक्सर भूल जाते हैं कि देश की जनता हमेशा बलवान को नकारती रही है और प्रताडित को अपना आषीर्वाद देती रही है। लालू प्रसाद यादव के शासन को “जंगल राज“ कहकर प्रधानमंत्री ने पिछडों और गरीब तबकों के अहं को ललकारा था। ये तबके लालू प्रसाद को चारा घोटाले में फंसाना भी एक गहरी साजिश का हिस्सा मानते हैं। विधानसभा चुनाव में लालू पर तीखे आक्रमण करके भाजपा ने लालू को “नायक“ से “महानायक“ बना दिया। यही वजह है कि विधानसभा चुनाव में लालू की पार्टी को सबसे ज्यादा 80 सीटें मिली हैं। कांग्रेस का प्रदर्शन और भी बेहतर रहा है। पार्टी ने नीतिश -लालू के साथ मिलकर 41 सीटें लडीं और 27 पर जीत हासिल की है। लालू का यादव और मुसलमानों और पिछडे तबकों में पक्का जनाधार है। लोकसभा चुनाव में भी लालू के राजद को 20 फीसदी से ज्यादा ज्यादा वोट मिले थे। नीतिश कुमार के जनता दल (यू) को 15.80 फीसदी। भाजपा को लोकसभा चुनाव में 29. 40 फीसदी वोट मिले थे। विधानसभा चुनाव में भाजपा नीत राजग को 34 फीसदी वोट मिले मगर सीटें सिर्फ 58 ही मिल पाईं। नीतिश कुमार और लालू प्रसाद के महागठबंधन को 42 फीसदी वोट से 178 सीटें मिलीं है। चुनावी गणित साफ-साफ बताता है कि एकता ने बहुत बडी भूमिका निभाई है। और यही गणित अब राश्ट्रीय स्तर पर बडा बदलाव ला सकता है।






