शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

Jan Lokpal Bill: Kejriwal Scores Over Modi Govt

                                                       जनलोकपाल बिल

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने अततः जनलोकपाल बिल को मजूंरी देकर अपना चुनावी वायदा पूरा किया है। 2014 में त्रिशंकू जनादेश  से सत्ता में आई आप' सरकार जनलोकपाल बिल को विधानसभा से पारित नहीं करवा पाई थी और इसमें विफल रहने पर केजरीवाल सरकार ने इस्तीफा दे दिया था। उस वक्त अरविंद केजरीवाल सरकार के पास विधानसभा में स्पष्ट  बहुमत नहीं था और सरकार कांग्रेसी मदद की बैसाखियों के सहारे चल रही थी़। कांग्रेस ने विधानसभा में जनलोकपाल बिल विधेयक को पारित नहीं होने दिया। इस साल फरवरी में हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में तूफानी बहुमत से सत्ता में आई अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली “आप“ सरकार 2014 का अधूरा काम पूरा करने जा रही है। जनलोकपाल बिल को जल्द ही विधानसभा में पेश  किया जाएगा। इस बार कांग्रेस का दिल्ली विधानसभा में वजूद तक नहीं है। 70 सदस्यीय विधानसभा में केजरीवाल के पास 67 सदस्यों का प्रचंड बहुमत है। इस स्थिति में बिल को विधानसभा से पारित करवाने में कोई अडचन नहीं है। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष  सिसोदिया का दावा है कि मौजूदा बिल हूबहू 2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले आंदोलन के दौरान तैयार किए गए  मसौदे जैसा  है । जनलोकपाल की मांग को लेकर गांधीवादी अन्ना हजारे की अगुवाई में 2011 में  आंदोलन  शुरु किया गया था। अरविंद केजरीवाल और उनकी “आम आदमी पार्टी” इसी आंदोलन की उपज है। जनलोकपाल की स्थापना  आम आदमी पार्टी का प्रमुख चुनावी वायदा था।  बिल में मुख्यमंत्री को भी जनलोकपाल के दायरे में लाया गया है। बिल में प्रावधान है कि भ्रष्टाचार मामलों   की जांच छह माह के भीतर पूरी करनी होगी और मामले की सुनवाई भी छह माह के भीतर पूरी कर ली जाएगी। इस दौरान सरकार भ्रष्टाचारी  की संपति जब्त कर सकती है।  लोकपाल की नियुक्ति  में भी दिल्ली सरकार का कोई दखल नहीं होगा। बाकी सारे प्रावधान वही हैं, जो उतराखंड जनलोकपाल बिल में हैं। उतराखंड की ही तरह दिल्ली जनलोकपाल बिल में भी  शिकायतकर्ता  की पहचान गुप्त रखे जाने का प्रावधान है मगर गुमनाम शिकायत का संज्ञान नहीं लिया जाएगा। लोकपाल को आरोपी के घर-कार्यालय पर छापा मारने और घर की तलाशी  लेने का भी अधिकार होगा। कुल मिलाकर, केजरीवाल सरकार का जनलोकपाल सख्त प्रावधानों के साथ संसद द्वारा पारित लोकपाल बिल से कहीं ज्यादा असरदार है। लोकपाल की स्थापना का मामला लगभग साढे चार दशक से भी ज्यादा समय से लटका पडा है। 1963 में नामचीन वकील और तत्कालीन संसद सदस्य एल एम सिंघवी ने संसद  में चर्चा  के दौरान लोकपाल की परिकल्पना रखी थी। 1968 में पहली बार शांति भूषण  ने लोकसभा में लोकपाल बिल रखा था और 1969 में इसे सदन द्वारा पारित भी किया गया।  शांति भूषण  और उनके सुपुत्र प्रशांत भूषण  अन्ना हजारे के आंदोलन से जुडे रहे हैं और आप में भी थे। अन्ना हजारे के जनलोकपाल बिल को तैयार करने में  शांति भूषण  की अग्रणी भूमिका रही है। विडंबना है कि अब शांति भूषण  और  प्रशांत भूषण   “आप“ से बाहर हैं। 1969 में इससे पहले कि बिल राज्यसभा में पारित होता, लोकसभा भंग कर दी गई। तब से ससद में 11 बार लोकपाल बिल रखा गया और 2013 में कहीं जाकर लोकपाल बिल पारित हो  पाया। एक जववरी, 2014 को  राष्ट्रपति  की स्वीकृति मिलने के बाद 16 जनवरी, 2014 से लोकपाल अस्तित्व में आ चुका है। मगर अभी तक लोकपाल की नियुक्ति नहीं हो पाई है। लोकपाल की नियुक्ति में बिलंब के लिए संसदीय समिति ने मोदी सरकार को फटकार भी लगाई है। लोकपाल पर गठित संसदीय समिति को तीन बार एक्सटेंशन भी मिल चुकी है। 15 नवंबर तक इसकी रिपोर्ट  आनी थी, मगर आई नहीं। बहरहाल, अरविंद केजरीवाल का जनलोकपाल बिल केन्द्र के लोकपाल से कहीं ज्यादा सख्त है। केजरीवाल ने अपना वायदा निभाया है।