बुधवार, 18 नवंबर 2015

Returning Awards No Solution to Fight Intolerance

                                                    राष्ट्रपति  की नसीहत

बढती असहिष्णुता के विरोध में कलाकारों, साहित्यकारों, वैज्ञानियों और शिक्षाशास्त्रियों  की “सम्मान वापसी“  पर देश  के प्रथम नागरिक  राष्ट्रपति  प्रणब मुखर्जी का चिंतित होना स्वभाविक है। भारत में भेड चाल की बुरी रिवायत है। बस एक  शुरु किया तो उसकी देखा-देखी कई लोग पीछे चल पडेंगे।  बढती असहिष्णुता  का विरोध जताने के लिए सम्मान वापसी के मामले में भी यही हो रहा है।  राष्ट्रपति  ने विरोध करने वालों को नसीहत दी है कि सम्मान अथवा पुरस्कार लौटाने की बजाय  वे “असहमति“ पर चर्चा करे। आजादी से जुडे मुद्दों पर संवेदनशील व्यक्ति का विचलित होना स्वभाविक है मगर यह बात भी सच है कि बुद्धिजीवी भावनाओं में बहकर फैसले नहीं लेते हैं। नेशनल  प्रेस दिवस पर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के कार्यक्रम मेंराष्ट्रपति ने इस बात पर खास जोर दिया कि “भावनाओं को तर्क  पर हावी नहीं होन्र् देना चाहिए“। देश  बुद्धिजीवियों से यही उम्मीद रखता है कि वे भावनाओं में न बहें और अपने फैसले तर्क पर लें। “प्रेस दिवस“ देश  में “अभिव्यक्ति की आजादी“ को परिलक्षित करता है और  अगर इस अवसर पर देश  का प्रथम नागरिक  बढती असहिष्णुता  का  उल्लेख करता है, तो इसे हलके में नहीं लिया जा सकता। इस बात में दो राय नहीं हो सकती कि सम्मान लौटाने की बजाय बुद्धिजीवियों को “ बढती“ असहिष्णुता पर देश  व्यापी चर्चा   शुरु करनी चाहिए। सम्मान अथवा पुरुस्कार लौटाने से मूल मुद्दा पीछे छूट रहा है। सम्मान-पुरुस्कार शीर्षस्थ  लोगों को उनकी योग्यता, प्रतिभा और समाज और देश  के प्रति उल्लेखनीय योगदान के लिए दिए जाते हैं। ये किसी सरकार अथवा व्यक्ति विशेष  द्वारा नहीं दिए जाते हैं, अलबत्ता देश  की ओर से दिए जाते हैं। इस स्थिति में सम्मान लौटाने से विरोध  प्रदर्शन  की जगह देश  का अपमान ज्यादा हो रहा है। राष्ट्र  द्वारा दिए गए सम्मान अथवा पुरुस्कार को कुछ “सिरफिरों“ की अनर्गल बातों से नहीं जोडा जा सकता। कुल मिलाकर राष्ट्रपति  ने अपने संबोधन में  स्पष्ट संकेत दिए  हैं कि “असहिष्णुता “ का हर सूरत में विरोध किया जाना चाहिए मगर इस तरह से कि विरोध का असर दिखे और जो लोग देश  का माहौल खराब कर रहे हैं, उन्हें भी अपने किए पर शर्मिदंगी महसूस हो। विख्यात फिल्मकार श्याम  बेनेगल ने भी “सम्मान वापसी” को अनुचित बताया है। बेनेगल ने माना कि धार्मिक असहिष्णुता  के खिलाफ आवाज बुलंद की जानी चाहिए मगर इसके लिए राजनीतिक विकल्प ज्यादा असरदार हो सकता है। निसंदेह, चर्चा  और बहस से  “असहिष्णुता “ फैलाने वालों के खिलाफ जनमत तैयार करके काफी हद तक इसे रोका जा सकता है। लोकतंत्र की यही विशेषता  है कि जनमत से बडे से बडे तानाशाह और शक्तिशाली को भी पस्त किया जा सकता है। बुद्धिजीवियों के साथ-साथ सियासी नेताओं को भी  सकारात्मक आलोचना को खुले दिमाग से सराहना और स्वीकारना चाहिए। देश  की यही स्वस्थ परंपरा रही है। केन्द्र में भाजपा नीत राजग सरकार के सत्ता संभालने के बाद से  देश  में “असहिष्णुता “ बढी है और मोदी सरकार इसे रोकने में विफल रही है। विपक्ष के इन आरोपों में वजन है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विदेशों  में अपनी उदार छवि बनाने के लिए “असहिष्णुता “ की भर्त्सना करते हैं मगर स्वदेश  में इस विषय  पर मौन हो जाते हैं। यह जरुरी नहीं है कि देश  में हर समस्या का समाधान सरकार ही निकाले। “असहिष्णुता “ पूरे समाज को प्रभावित करती है और इसे बढाने वालों का सामाजिक स्तर पर मुकाबला किया जाना चाहिए। कलाकार, साहित्कार और शिक्षक इस मामले में सरकार से कहीं ज्यादा अहम भूमिका निभा सकते हैं। राष्ट्रपिता  महात्मा गांधी ने भी “असहिष्णुता  “ को सामाजिक चेतना से पस्त करने का विकल्प चुना था।  राष्ट्रपति   यही संदेश  देना चाहते थे।   कटटरपंथियों ने भारत में ही नहीं, बल्कि समूचे विश्व  में “असहिष्णुता “ से अशांति फैला रखी है। इसका मुकाबला हिंसक और उग्रता से नहीं किया जा सकता।