सरबत खालसा की प्रासंगिकता
पंजाब में गरमपंथी उतरोत्तर नरमपंथियों पर भारी पडते जा रहे हैं। मंगलवार (दस नवंबर) को अमृतसर के निकट चब्बे गांव में आहुत सरबत खालसा में भारी संख्या में सिखों की उपस्थिति यही संकेत दे रही है। गरमपंथी सिख संगठनों द्वारा बुलाए गए इस सरबत खालसा को विफल करने की सारी कोशिशें ओर रुकावटें नाकाम साबित हुईं। सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने भी इस सरबत खालसा को अवैध करार दिया। एसजीपीसी का कहना था कि केवल वही सरबत खालसा बुलाने के लिए अधिकृत है। अकाल तख्त के जत्थेदार भी इस सरबत खालसा को नाकाम करने की कोशिश करते रहे। इसके बावजूद देश -विदेश से भारी संख्या से सिखों का सरबत खालसा में भाग लेना साफ-साफ संकेत दे रहा है कि पंजाब में बयार बादल द्वारा नियंत्रित एसजीपीसी के विरुद्ध बह रही है। 29 साल बाद बुलाए गए इस सरबत खालसा की लय पूरी तरह वैसी ही थी, जैसी 1986 में थी। लगभग वही प्रस्ताव पारित किए गए, जो 26 जनवरी 1986 के सरबत खालसा में पारित किए गए थे। 1986 के सरबत खालसा में भी इस बार की तरह तीनों जत्थेदारों को हटाया गया था। तब भी एसजीपीसी को भंग किया गया था। अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी गुरबचन सिंह को हटाकर उनकी जगह पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे जगतार सिंह हवारा को जत्थेदार नियुक्त करके गरमपंथियों ने साफ कर जताया है कि वे देश के कानून का कितना सम्मान करते हैं। सिखों में सरबत खालसा की अपनी गरिमा है। कौम के ज्वलंत धार्मिक मसलों पर चर्चा के लिए सरबत खालसा बुलाया जाता है ताकि महत्वपूर्ण मसलों पर संगत की राय ली जा सके। छोटे-मोटे मसलों के लिए सरबत खालसा बुलाने की रिवायत नहीं है। इस बात के दृष्टिगत , 10 नवंबर, 2015 को आहुत सरबत खालसा की प्रासंगिकता पर सवाल उठ सकता है। सिख कौम इस समय ऐसे किसी गंभीर धार्मिक संकट से नहीं गुजर रही है कि सरबत खालसा बुलाने की नौबत आ जाए। सरबत खालसा का इतिहास इस बात पर दृष्टि डाल सकता है। अधिकतर सरबत खालसा अठाहरवीं सदी में मुगल काल में आहुत किय गए थे। तब हिन्दू और सिख कौम भारी धार्मिक संकट से झूज रही थी। पहली बार गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1708 को सरबत खालसा बुलाया था। उस समय मुगल शासक बहादुर कौम सिखों पर तरह-तरह के जुल्म ढा रहे थे। इनका मुकाबला करने के लिए सरबत खालसा बुलाया गया था। उसके बाद 1723, 1726, 1733, 1745 और 1748 में सरबत खालसा बुलाए गए क्योंकि तब सिख कौम संकटग्रस्त थी। उसके बाद लगभग सवा दो सौ साल बाद 26 जनवरी 1986 को ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार के बाद आजाद भारत में पहली बार सरबत खालसा बुलाया गया था। इस सरबत खालसा में पांच सदस्यीय पंथक कमेटी ने बाकायदा खालिस्तान की घोषणा की थी। आजादी से पहले के हालात और आजादी के बाद के हालात में काफी अंतर है। पंजाब देश का समृद्धतम राज्य है। अस्सी के दशक में आतंक का दंष झेलने से पहले पंजाब खुशाहल और उन्नत प्रांत था और इसकी कोई सानी नहीं थी। आज भी पंजाब अन्न पैदा करने वाला देश का अग्रणी राज्य है। इस स्थिति में गरमपंथियों द्वारा 10 नवंबर को बुलाया गया सरबत खालसा धार्मिक मसलों पर चर्चा की अपेक्षा राजनीतिक ज्यादा लगता है। दरअसल, गरमपंथी लंबे समय से बादल परिवार की पार्टी शिरोमणि अकाली दल के वर्चस्व वाली एसजीपीसी पर कब्जा करने की फिराक में हैं मगर आज तक वे सिखों की इस सर्वोच्च धार्मिक संस्था को हथियाने में कामयाब नहीं हो पाए हैं । कुछ दिन पहले गरमपंथियों ने पंच प्यारों की मदद से एसजीपीसी पर हमला बोला था। इसके फलस्वरुप, एसजीपीसी ने पंच प्यारों को निलंबित भी कर दिया मगर बाद में संगत के दबाव पर उनका निलबंन वापस ले लिया गया। अब गरमपंथी सरबत खालसा के बरास्ता एसजीपीसी पर कब्जा करना चाहते हैं। इससे पंथ में गरमपंथी और नरमपंथियो के बीच टकराव बढने के पूरे आसार हैं। बुधवार दीवाली (बंदी छोड दिवस) पर इस टकराव की झलक भी दिखाई दी। बंदी छोड दिवस पर अकाल तख्त जत्थेदार के परंपरागत संबोधन के समय उनके खिलाफ नारे लगाए गए और उन्हें काले झंडे दिखाए गए। नजरबंद किए जाने के बावजूद सरबत खासला द्वारा नियुक्त्त कार्यकारी जत्थेदार पूर्व सांसद ध्यान सिंह मंड ने स्वर्ण मंदिर पहुंच कर अलग से अपना संबोधन पढा। तमाम परिस्थितियां पंजाब को और ज्यादा अशांत करने की तरफ इशारा कर रही है।
पंजाब में गरमपंथी उतरोत्तर नरमपंथियों पर भारी पडते जा रहे हैं। मंगलवार (दस नवंबर) को अमृतसर के निकट चब्बे गांव में आहुत सरबत खालसा में भारी संख्या में सिखों की उपस्थिति यही संकेत दे रही है। गरमपंथी सिख संगठनों द्वारा बुलाए गए इस सरबत खालसा को विफल करने की सारी कोशिशें ओर रुकावटें नाकाम साबित हुईं। सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने भी इस सरबत खालसा को अवैध करार दिया। एसजीपीसी का कहना था कि केवल वही सरबत खालसा बुलाने के लिए अधिकृत है। अकाल तख्त के जत्थेदार भी इस सरबत खालसा को नाकाम करने की कोशिश करते रहे। इसके बावजूद देश -विदेश से भारी संख्या से सिखों का सरबत खालसा में भाग लेना साफ-साफ संकेत दे रहा है कि पंजाब में बयार बादल द्वारा नियंत्रित एसजीपीसी के विरुद्ध बह रही है। 29 साल बाद बुलाए गए इस सरबत खालसा की लय पूरी तरह वैसी ही थी, जैसी 1986 में थी। लगभग वही प्रस्ताव पारित किए गए, जो 26 जनवरी 1986 के सरबत खालसा में पारित किए गए थे। 1986 के सरबत खालसा में भी इस बार की तरह तीनों जत्थेदारों को हटाया गया था। तब भी एसजीपीसी को भंग किया गया था। अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी गुरबचन सिंह को हटाकर उनकी जगह पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे जगतार सिंह हवारा को जत्थेदार नियुक्त करके गरमपंथियों ने साफ कर जताया है कि वे देश के कानून का कितना सम्मान करते हैं। सिखों में सरबत खालसा की अपनी गरिमा है। कौम के ज्वलंत धार्मिक मसलों पर चर्चा के लिए सरबत खालसा बुलाया जाता है ताकि महत्वपूर्ण मसलों पर संगत की राय ली जा सके। छोटे-मोटे मसलों के लिए सरबत खालसा बुलाने की रिवायत नहीं है। इस बात के दृष्टिगत , 10 नवंबर, 2015 को आहुत सरबत खालसा की प्रासंगिकता पर सवाल उठ सकता है। सिख कौम इस समय ऐसे किसी गंभीर धार्मिक संकट से नहीं गुजर रही है कि सरबत खालसा बुलाने की नौबत आ जाए। सरबत खालसा का इतिहास इस बात पर दृष्टि डाल सकता है। अधिकतर सरबत खालसा अठाहरवीं सदी में मुगल काल में आहुत किय गए थे। तब हिन्दू और सिख कौम भारी धार्मिक संकट से झूज रही थी। पहली बार गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1708 को सरबत खालसा बुलाया था। उस समय मुगल शासक बहादुर कौम सिखों पर तरह-तरह के जुल्म ढा रहे थे। इनका मुकाबला करने के लिए सरबत खालसा बुलाया गया था। उसके बाद 1723, 1726, 1733, 1745 और 1748 में सरबत खालसा बुलाए गए क्योंकि तब सिख कौम संकटग्रस्त थी। उसके बाद लगभग सवा दो सौ साल बाद 26 जनवरी 1986 को ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार के बाद आजाद भारत में पहली बार सरबत खालसा बुलाया गया था। इस सरबत खालसा में पांच सदस्यीय पंथक कमेटी ने बाकायदा खालिस्तान की घोषणा की थी। आजादी से पहले के हालात और आजादी के बाद के हालात में काफी अंतर है। पंजाब देश का समृद्धतम राज्य है। अस्सी के दशक में आतंक का दंष झेलने से पहले पंजाब खुशाहल और उन्नत प्रांत था और इसकी कोई सानी नहीं थी। आज भी पंजाब अन्न पैदा करने वाला देश का अग्रणी राज्य है। इस स्थिति में गरमपंथियों द्वारा 10 नवंबर को बुलाया गया सरबत खालसा धार्मिक मसलों पर चर्चा की अपेक्षा राजनीतिक ज्यादा लगता है। दरअसल, गरमपंथी लंबे समय से बादल परिवार की पार्टी शिरोमणि अकाली दल के वर्चस्व वाली एसजीपीसी पर कब्जा करने की फिराक में हैं मगर आज तक वे सिखों की इस सर्वोच्च धार्मिक संस्था को हथियाने में कामयाब नहीं हो पाए हैं । कुछ दिन पहले गरमपंथियों ने पंच प्यारों की मदद से एसजीपीसी पर हमला बोला था। इसके फलस्वरुप, एसजीपीसी ने पंच प्यारों को निलंबित भी कर दिया मगर बाद में संगत के दबाव पर उनका निलबंन वापस ले लिया गया। अब गरमपंथी सरबत खालसा के बरास्ता एसजीपीसी पर कब्जा करना चाहते हैं। इससे पंथ में गरमपंथी और नरमपंथियो के बीच टकराव बढने के पूरे आसार हैं। बुधवार दीवाली (बंदी छोड दिवस) पर इस टकराव की झलक भी दिखाई दी। बंदी छोड दिवस पर अकाल तख्त जत्थेदार के परंपरागत संबोधन के समय उनके खिलाफ नारे लगाए गए और उन्हें काले झंडे दिखाए गए। नजरबंद किए जाने के बावजूद सरबत खासला द्वारा नियुक्त्त कार्यकारी जत्थेदार पूर्व सांसद ध्यान सिंह मंड ने स्वर्ण मंदिर पहुंच कर अलग से अपना संबोधन पढा। तमाम परिस्थितियां पंजाब को और ज्यादा अशांत करने की तरफ इशारा कर रही है।






