अब हम अगेंजों से बडे
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तीन दिवसीय इग्लैंड यात्रा कई अर्थों में अहम है। गुजरात दंगों के चलते ब्रिटेन ने मानवाधिकारों के हनन का हवाला देकर एक दशक से अधिक समय तक नरेन्द्र मोदी को “अछूत“ मान रखा था और उनका बहिश्कार कर रखा था। और अब वही अग्रेंज उन्हें सिर -आंखों पर बिठा रहे हैं। वैसे लोकसभा चुनाव से कुछ समय पहले जैसे ही ब्रिटेन को लगने लगा कि नरेन्द्र मोदी भारत के अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं, अग्रेजों ने अक्टूबर 2012 से ही मोदी के दरबार में हाजिरी लगानी शुरु कर दी थी। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी अभी तक 30 से ज्यादा देशों की यात्रा कर चुके हैं मगर ब्रिटेन की यह उनकी पहली यात्रा है जबकि अंग्रेजों से भारत के बहुत पुराने रिश्ते हैं। ब्रिटेन में भारतीय मूल के 15 लाख से ज्यादा लोग है और इनमेंसे 10 सांसद है और 24 हाउस ऑफ लार्ड के सदस्य। भारत की टाटा मोटर्स ब्रिटेन की सबसे बडी रोजगार देने वाली कंपनी है। मोदी अपनी यात्रा के दौरान इस फैक्टरी का दौरा भी करेंगे। टाटा स्टील भी ब्रिटेन की बडी कंपनियों में शुमार है। कैमरून प्रधानमंत्री बनने के बाद अब तक तीन बार भारत की यात्रा कर चुके हैं। इन सब तथ्यों के दृषिगत अग्रेंजों को लग रहा था कि मोदी की उपेक्षा करके उन्होंने उनका जो अपमान किया था, प्रधानमंत्री संभवतय उसे भूल नहीं पाए हैं। इसी भूल को सुधारने के लिए ब्रितानवी की कंजरवेटिव पार्टी सरकार ने मोदी के सम्मान में कोई कसर नहीं छोडी है। इस तथ्य के बावजूद कि ब्रिटेन का उदारख्याली एवं मानवाधिकारी उन्मुख समाज मोदी को आज भी संदेह की दृष्टि से देखता है। भारत में हाल ही की असहिष्णुता की घटनाओं ने मानवाधिकार के लिए लडने वाले ब्रितानवी समाज को और ज्यादा विचलित किया है। इन घटनाओं से प्रधानमंत्री की छवि भी प्रभावित हुई है। मोदी की तीन दिवसीय यात्रा के पहले ही दिन उनके खिलाफ प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन भी किए गए और “ असहिष्णु भारत“ और प्रधानमंत्री के खिलाफ नारे भी लगाए गए। बुद्धिजीवियों और शिक्षाशास्त्रियों ने मोदी के खिलाफ मुहिम छेड रखी है। पत्रकारों ने उनसे “असहिष्णुता “ और दंगों को लेकर कई असहज सवाल भी किए मगर मोदी विचलित नहीं हुए और बडी निपुणता से हर सवाल का सटीक जबाव दिया। यह सब उनकी अमेरिका की पहली यात्रा के दौरान भी हुआ था। प्रधानमंत्री डैविड कैमरून इस सच्चाई से बखूबी वाकिफ हैं कि भारत से कहीं ज्यादा ब्रिटेन को दुनिया की इमरजिंग एवं विशाल भारतीय मार्केट की जरुरत है। भारत भी ब्रिटेन के साथ अंतरंग संबंध चाहता है। भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी यह बात भली-भांति जानते हैं कि अगर दुनिया को फतेह करना है, तो भारत को भी पश्चिम की तरह उदार और मानवाधिकार फ्रेंडली बनना होगा। इसीलिए, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यात्रा के पहले ही दिन “असहिष्णुता" पर देश की गहरी चिंता जताते हुए दुनिया को आश्वस्त किया कि उनकी सरकार हर व्यक्ति की आजादी की पूरी तरह से रक्षा करेगी। यात्रा के दूसरे दिन शुक्रवार को ब्रिटेन और भारत के बीच न्यूक्लियर संधि के अलावा, रक्षा और साइबर सिक्युरिटी पर नौ अरब पाउंड ( 92 हजार करोड रुपए) के करार हुए। प्रधानमंत्री ने लंदन की स्टॉक मार्केट में भारतीय मुद्रा में रेलवे बांड भी जारी किया। अमूमन, न्यूक्लियर बगैर दांव-पेच भिडाए और शर्तों के संभव नहीं हो पाता है। मगर सिविल न्यूक्लियर करार करके भारत और इग्ंलैड ने एक-दूसरे के प्रति गहरा विश्वास व्यक्त किया है। मोदी ने कैमरून से ब्रिटेन स्थित कुछ गुरुद्वारो में सिख खाडकूओं को भारत में आतंक फैलाने के लिए वित्तीय मदद देने का मुद्दा भी उठाया। कडे आव्रजन (इमीग्रेषन) कानून के चलते ब्रिटेन में भारतीय छात्रो की गिरती संख्या पर भी प्रधानमंत्री ने चिंता जताई। इंग्लैड सदियो से भारतीय छात्रों की पहली पसंद रहा है। मोदी के साथ सयुंक्त पत्रकार सम्मेलन में ब्रिटिश प्रधानमत्री ने सुरक्षा परिशद में भारत की स्थाई सदस्यता को भरपूर समर्थन देने का आश्वाशन दिया। शनिवार को यात्रा के समापन से कुछ और करार हो सकते हैं। प्रधानमंत्री की ब्रिटेन यात्रा से ब्रितानवी समाज में भी उनके बारे फैली भ्रांतियां दूर् हो सकती हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तीन दिवसीय इग्लैंड यात्रा कई अर्थों में अहम है। गुजरात दंगों के चलते ब्रिटेन ने मानवाधिकारों के हनन का हवाला देकर एक दशक से अधिक समय तक नरेन्द्र मोदी को “अछूत“ मान रखा था और उनका बहिश्कार कर रखा था। और अब वही अग्रेंज उन्हें सिर -आंखों पर बिठा रहे हैं। वैसे लोकसभा चुनाव से कुछ समय पहले जैसे ही ब्रिटेन को लगने लगा कि नरेन्द्र मोदी भारत के अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं, अग्रेजों ने अक्टूबर 2012 से ही मोदी के दरबार में हाजिरी लगानी शुरु कर दी थी। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी अभी तक 30 से ज्यादा देशों की यात्रा कर चुके हैं मगर ब्रिटेन की यह उनकी पहली यात्रा है जबकि अंग्रेजों से भारत के बहुत पुराने रिश्ते हैं। ब्रिटेन में भारतीय मूल के 15 लाख से ज्यादा लोग है और इनमेंसे 10 सांसद है और 24 हाउस ऑफ लार्ड के सदस्य। भारत की टाटा मोटर्स ब्रिटेन की सबसे बडी रोजगार देने वाली कंपनी है। मोदी अपनी यात्रा के दौरान इस फैक्टरी का दौरा भी करेंगे। टाटा स्टील भी ब्रिटेन की बडी कंपनियों में शुमार है। कैमरून प्रधानमंत्री बनने के बाद अब तक तीन बार भारत की यात्रा कर चुके हैं। इन सब तथ्यों के दृषिगत अग्रेंजों को लग रहा था कि मोदी की उपेक्षा करके उन्होंने उनका जो अपमान किया था, प्रधानमंत्री संभवतय उसे भूल नहीं पाए हैं। इसी भूल को सुधारने के लिए ब्रितानवी की कंजरवेटिव पार्टी सरकार ने मोदी के सम्मान में कोई कसर नहीं छोडी है। इस तथ्य के बावजूद कि ब्रिटेन का उदारख्याली एवं मानवाधिकारी उन्मुख समाज मोदी को आज भी संदेह की दृष्टि से देखता है। भारत में हाल ही की असहिष्णुता की घटनाओं ने मानवाधिकार के लिए लडने वाले ब्रितानवी समाज को और ज्यादा विचलित किया है। इन घटनाओं से प्रधानमंत्री की छवि भी प्रभावित हुई है। मोदी की तीन दिवसीय यात्रा के पहले ही दिन उनके खिलाफ प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन भी किए गए और “ असहिष्णु भारत“ और प्रधानमंत्री के खिलाफ नारे भी लगाए गए। बुद्धिजीवियों और शिक्षाशास्त्रियों ने मोदी के खिलाफ मुहिम छेड रखी है। पत्रकारों ने उनसे “असहिष्णुता “ और दंगों को लेकर कई असहज सवाल भी किए मगर मोदी विचलित नहीं हुए और बडी निपुणता से हर सवाल का सटीक जबाव दिया। यह सब उनकी अमेरिका की पहली यात्रा के दौरान भी हुआ था। प्रधानमंत्री डैविड कैमरून इस सच्चाई से बखूबी वाकिफ हैं कि भारत से कहीं ज्यादा ब्रिटेन को दुनिया की इमरजिंग एवं विशाल भारतीय मार्केट की जरुरत है। भारत भी ब्रिटेन के साथ अंतरंग संबंध चाहता है। भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी यह बात भली-भांति जानते हैं कि अगर दुनिया को फतेह करना है, तो भारत को भी पश्चिम की तरह उदार और मानवाधिकार फ्रेंडली बनना होगा। इसीलिए, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यात्रा के पहले ही दिन “असहिष्णुता" पर देश की गहरी चिंता जताते हुए दुनिया को आश्वस्त किया कि उनकी सरकार हर व्यक्ति की आजादी की पूरी तरह से रक्षा करेगी। यात्रा के दूसरे दिन शुक्रवार को ब्रिटेन और भारत के बीच न्यूक्लियर संधि के अलावा, रक्षा और साइबर सिक्युरिटी पर नौ अरब पाउंड ( 92 हजार करोड रुपए) के करार हुए। प्रधानमंत्री ने लंदन की स्टॉक मार्केट में भारतीय मुद्रा में रेलवे बांड भी जारी किया। अमूमन, न्यूक्लियर बगैर दांव-पेच भिडाए और शर्तों के संभव नहीं हो पाता है। मगर सिविल न्यूक्लियर करार करके भारत और इग्ंलैड ने एक-दूसरे के प्रति गहरा विश्वास व्यक्त किया है। मोदी ने कैमरून से ब्रिटेन स्थित कुछ गुरुद्वारो में सिख खाडकूओं को भारत में आतंक फैलाने के लिए वित्तीय मदद देने का मुद्दा भी उठाया। कडे आव्रजन (इमीग्रेषन) कानून के चलते ब्रिटेन में भारतीय छात्रो की गिरती संख्या पर भी प्रधानमंत्री ने चिंता जताई। इंग्लैड सदियो से भारतीय छात्रों की पहली पसंद रहा है। मोदी के साथ सयुंक्त पत्रकार सम्मेलन में ब्रिटिश प्रधानमत्री ने सुरक्षा परिशद में भारत की स्थाई सदस्यता को भरपूर समर्थन देने का आश्वाशन दिया। शनिवार को यात्रा के समापन से कुछ और करार हो सकते हैं। प्रधानमंत्री की ब्रिटेन यात्रा से ब्रितानवी समाज में भी उनके बारे फैली भ्रांतियां दूर् हो सकती हैं।






