इधर शांति वार्ता, उधर बमबारी
आतंक से कैसे निपटा जाए? क्या सीरिया और इराक में इस्लामिक स्टेट के प्रमुख ठिकानों को तहस-नहस करके दुनिया से आतंक का खात्मा किया जा सकता है? या आतंकियों के वित्तीय साधनों और मदद को जैसे-तैसे बंद करवाकर आतंकियों की कमर तोड दी जाए? विश्व नेताओं के समक्ष यह सबसे बडा सवाल है। पेरिस हमलों के बाद से दुनिया के ताकतवर अमेरिका और उसके मित्र देश भी सहमे हुए हैं। बम के डर से हवाई उडानें रद्द कर दी गई हैं। फ्रांस में तीन महीने के लिए इमरजेंसी लगा दी गई है। मंगलवार को जर्मनी और हालैंड के बीच फुटबाल मैच बम के डर से रद्द कर दिया गया। जर्मनी की चासंलर इस मैच को देखने आने वाली थी। फ्रांस में भी सभी स्पोर्टस आयोजनों को स्थगित कर दिया गया। आतंकियों को यह दिखाने के लिए कि विकसित देश पेरिस हमले डरे नहीं है, इग्लैंड और फ्रांस के बीव फ्रेंडली फुटबाल मैच भारी सुरक्षा बंदोबस्त में इग्लैंड में करवा गया। बदले की भावना से ग्रस्त फ्रांस सीरिया में आईएस के रक्का स्थित मुख्यालय के ठिकानों पर जबरदस्त बमबारी कर रहा है। ताजा सूचना के मुताबिक इन हमलों में 33 से ज्यादा आईएस आतंकी मारे जा चुके है। रुस ने भी सीरिया में बमबारी तेज कर दी है हालांकि वह सीरियाई सेना और राष्ट्रपति बसर-अल असद की पहले से ही मदद कर रहा है। सीरिया रुस की मदद के कारण ही पूरी तरह से इस्लामिक स्टेट के कब्जे में आने से बचा हुआ है। अमेरिका और उसके मित्र देश तो अब तक सीरिया में असद विरोधी ताकतों की मदद कर रहे हैं। और सच्चाई यह है कि दुनिया में आतंक और आतंकी संगठन अगर फले-फूले हैं , तो सिर्फ अमेरिका और उसके मित्र देशों की दोगली नीति से। अमेरिका यह जानते हुए भी कि पाकिस्तान दुनिया में आतंकियों का सबसे बडा केन्द्र है, सालों तक खुले हाथ से उसकी मदद करता रहा है। इसी तरह यह बात आज तक रहस्य बनी हुई है कि सीरिया में अमेरिका और उसके मित्र देश इस्लामिक स्टेट के आर्थिक ठिकानों को अब तक क्यों तहस-नहस कर नहीं कर पाए जबकि वे जानते हैं कि ऐसा करने से आईएस बेअसर हो सकता है। अमेरिका और उसके मित्र देश आतंकवाद को आज तक निहित राजनीतिक हितों के तराजू में तोलते रहे हैं। वर्ल्ड ट्रैड सेंटर पर अल कायदा के हमले से पहले तक अमेरिका आतंकियों की भी अप्रत्यक्ष तौर पर मदद करता रहा है और तब तक दुनिया का सबसे खूंखार आतंकी ओसामा बिन लादेन अमेरिका के लिए इतना खतरनाक नहीं था। 11 सितंबर, 2001 (9/11) को वर्ल्ड ट्रैड सेंटर पर हमले के बाद अमेरिका लादेन के पीछे पड गया और उसे पाकिस्तान में उसके घर में घुस कर मार डाला। तब से अमेरिका आतंक के खिलाफ लडने की बातें कर रहा है मगर जमीनी हकीकत यह है कि आतंक पर खाली बातें ही हो रही है, किसी ठोस कार्रवाई का खाका आज तक तैयार नहीं किया जा सका है। पेरिस हमले के तुरंत बाद जी-20 देशों के शिखर सम्मेलन में भी आतंक पर व्यापक चर्चा हुई। भारत ने आतंक पर वैश्वनिक रणनीति बनाने पर जोर दिया। विश्व नेताओं ने यह बात मानी भी कि आतंक से एकजुट होकर ही निपटा जा सकता है । इस पृष्ठभूमि में पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और रुस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ने गुफ्तगू भी की। मगर एक-दूसरे के प्रति अविश्वाश अभी भी कायम है। अमेरिका आईएस से मिलकर लडने के रुस के प्रस्ताव को पहले ही अस्वीकार कर चुका है। दुनिया से आतंक का खात्मा करना है तो सबसे पहले आतंकी संगठनों को वित्तीय मदद रोकनी होगी। बगैर वित्तीय साधन के आतंकी अमेरिका और फ्रांस पर हमले नहीं कर सकते। आईएस को लगभग 40 देशों से वित्तीय मदद मिलती है और इनमें कई जी-20 देश भी शामिल है। ताजा जानकारी के अनुसार आईएस के पास 13 खरब पाउंड के विशाल वित्तीय संसाधन उपलब्ध हैं और इसकी मदद से वह पश्चिम पर जब चाहे हमले कर सकता है। इनमें हर रोज एक अरब पाउंड तेल से आय और सालाना 30 अरब पाउंड की फिरौती शामिल है। अल कायदा के पास भी धन की कोई कमी नहीं है। आतंक के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र संघ संधि पत्र को अविलंब बनाने की जरुरत है। दुनिया से अगर आतंक का खात्मा करना है तो यह सब करना होगा। पर सवाल यही है कि क्या एक-दूसरे की काट करने वाले विश्व नेता ऐसा कर पाएंगें?
आतंक से कैसे निपटा जाए? क्या सीरिया और इराक में इस्लामिक स्टेट के प्रमुख ठिकानों को तहस-नहस करके दुनिया से आतंक का खात्मा किया जा सकता है? या आतंकियों के वित्तीय साधनों और मदद को जैसे-तैसे बंद करवाकर आतंकियों की कमर तोड दी जाए? विश्व नेताओं के समक्ष यह सबसे बडा सवाल है। पेरिस हमलों के बाद से दुनिया के ताकतवर अमेरिका और उसके मित्र देश भी सहमे हुए हैं। बम के डर से हवाई उडानें रद्द कर दी गई हैं। फ्रांस में तीन महीने के लिए इमरजेंसी लगा दी गई है। मंगलवार को जर्मनी और हालैंड के बीच फुटबाल मैच बम के डर से रद्द कर दिया गया। जर्मनी की चासंलर इस मैच को देखने आने वाली थी। फ्रांस में भी सभी स्पोर्टस आयोजनों को स्थगित कर दिया गया। आतंकियों को यह दिखाने के लिए कि विकसित देश पेरिस हमले डरे नहीं है, इग्लैंड और फ्रांस के बीव फ्रेंडली फुटबाल मैच भारी सुरक्षा बंदोबस्त में इग्लैंड में करवा गया। बदले की भावना से ग्रस्त फ्रांस सीरिया में आईएस के रक्का स्थित मुख्यालय के ठिकानों पर जबरदस्त बमबारी कर रहा है। ताजा सूचना के मुताबिक इन हमलों में 33 से ज्यादा आईएस आतंकी मारे जा चुके है। रुस ने भी सीरिया में बमबारी तेज कर दी है हालांकि वह सीरियाई सेना और राष्ट्रपति बसर-अल असद की पहले से ही मदद कर रहा है। सीरिया रुस की मदद के कारण ही पूरी तरह से इस्लामिक स्टेट के कब्जे में आने से बचा हुआ है। अमेरिका और उसके मित्र देश तो अब तक सीरिया में असद विरोधी ताकतों की मदद कर रहे हैं। और सच्चाई यह है कि दुनिया में आतंक और आतंकी संगठन अगर फले-फूले हैं , तो सिर्फ अमेरिका और उसके मित्र देशों की दोगली नीति से। अमेरिका यह जानते हुए भी कि पाकिस्तान दुनिया में आतंकियों का सबसे बडा केन्द्र है, सालों तक खुले हाथ से उसकी मदद करता रहा है। इसी तरह यह बात आज तक रहस्य बनी हुई है कि सीरिया में अमेरिका और उसके मित्र देश इस्लामिक स्टेट के आर्थिक ठिकानों को अब तक क्यों तहस-नहस कर नहीं कर पाए जबकि वे जानते हैं कि ऐसा करने से आईएस बेअसर हो सकता है। अमेरिका और उसके मित्र देश आतंकवाद को आज तक निहित राजनीतिक हितों के तराजू में तोलते रहे हैं। वर्ल्ड ट्रैड सेंटर पर अल कायदा के हमले से पहले तक अमेरिका आतंकियों की भी अप्रत्यक्ष तौर पर मदद करता रहा है और तब तक दुनिया का सबसे खूंखार आतंकी ओसामा बिन लादेन अमेरिका के लिए इतना खतरनाक नहीं था। 11 सितंबर, 2001 (9/11) को वर्ल्ड ट्रैड सेंटर पर हमले के बाद अमेरिका लादेन के पीछे पड गया और उसे पाकिस्तान में उसके घर में घुस कर मार डाला। तब से अमेरिका आतंक के खिलाफ लडने की बातें कर रहा है मगर जमीनी हकीकत यह है कि आतंक पर खाली बातें ही हो रही है, किसी ठोस कार्रवाई का खाका आज तक तैयार नहीं किया जा सका है। पेरिस हमले के तुरंत बाद जी-20 देशों के शिखर सम्मेलन में भी आतंक पर व्यापक चर्चा हुई। भारत ने आतंक पर वैश्वनिक रणनीति बनाने पर जोर दिया। विश्व नेताओं ने यह बात मानी भी कि आतंक से एकजुट होकर ही निपटा जा सकता है । इस पृष्ठभूमि में पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और रुस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ने गुफ्तगू भी की। मगर एक-दूसरे के प्रति अविश्वाश अभी भी कायम है। अमेरिका आईएस से मिलकर लडने के रुस के प्रस्ताव को पहले ही अस्वीकार कर चुका है। दुनिया से आतंक का खात्मा करना है तो सबसे पहले आतंकी संगठनों को वित्तीय मदद रोकनी होगी। बगैर वित्तीय साधन के आतंकी अमेरिका और फ्रांस पर हमले नहीं कर सकते। आईएस को लगभग 40 देशों से वित्तीय मदद मिलती है और इनमें कई जी-20 देश भी शामिल है। ताजा जानकारी के अनुसार आईएस के पास 13 खरब पाउंड के विशाल वित्तीय संसाधन उपलब्ध हैं और इसकी मदद से वह पश्चिम पर जब चाहे हमले कर सकता है। इनमें हर रोज एक अरब पाउंड तेल से आय और सालाना 30 अरब पाउंड की फिरौती शामिल है। अल कायदा के पास भी धन की कोई कमी नहीं है। आतंक के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र संघ संधि पत्र को अविलंब बनाने की जरुरत है। दुनिया से अगर आतंक का खात्मा करना है तो यह सब करना होगा। पर सवाल यही है कि क्या एक-दूसरे की काट करने वाले विश्व नेता ऐसा कर पाएंगें?






