पाक से आई गीता का संदेश
आठ साल की कच्ची उमर में भारत से पाकिस्तान जा रही ट्रेन में एक गूंगी-बहरी लडकी सरहद लांघ कर उस पार चली जाती है। इस बेनाम बच्ची को कराची स्थित इधी फाउंडेश न के सुपुर्द किया जाता है। 15 साल तक यह फाउंडेशन सगी संतान की तरह इस लडकी का हिंदू विधि-विधान से परवरिश करती है। वह भारत से आई थी, इसलिए उसका नाम गीता रखा जाता है। यह कोई “बजरंगी भाईजान“ की तरह फिल्मी कहानी नहीं है, बल्कि हकीकत है। फर्क सिर्फ“ इतना है कि "बजरंगी भाईजान" में भारतीय परिवार अपनी संतान की तरह पाकिस्तानी बालिका का लालन-पालन करता है। गीता के मामले में पाकिस्तान ऐसा करता है। इसके केवल एक ही मायने है। भारत और पाकिस्तान के बीच आज भी “आपसी भाईचारे और सदभाव“ का माहौल बरकरार है और दोनों देशों के कट्टरपंथी लाख कोशिशों के बावजूद सात दशक में भी इस भाईचारे को खत्म नहीं कर पाए हैं। सोमवार को 23 साल की गीता को जब स्वदेश भारत लाया गया तब देश में व्याप्त माहौल साफ-साफ कह रहा था कि भारत और पाकिस्तान में “भरत मिलाप“ संभव है। गीता को भारत को सौंपने के बावजूद इधी फाउंडेशन ने गीता से जुडे रहने का संकल्प दोहराया है। फाउंडेशन का कहना है कि सरहदें अतंरंग रिश्तों को अलग नहीं कर सकती। यही एक सच है जो भारत और पाकिस्तान की अवाम को आज भी आपस में जोडे हुए है। दोनों मुल्कों के सियासी और कट्टरपंथी नेता अवाम को बांटने की कितनी भी कोशिश कर लें , सदियों के भाईचारे को खत्म नहीं किया जा सकता है। गीता के मामले ने इस सच्चाई का अहसास कराया है कि भारत और पाकिस्तान आपस में लड-झगडने की बजाय प्रेमपूर्वक साथ-साथ रह सकते हैं। सरहद पर छोटी-मोटी झडपों और कश्मीर जैसे द्धिपक्षीय मसलों को सौहार्दपूर्ण संबंधों के आडे नहीं आने देना चाहिए। हर परिवार में अक्सर छोटी-मोटी बातों पर नोंक-झोंक होती रहती है मगर इसका यह कतई मतलब नहीं है कि इनसे परिवार ही टूट जाए। इस बात में दो राय नहीं है कि दिल्ली में मोदी सरकार के आने के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच द्धिपक्षीय संबंध बिगडे हैं और दोनों देशों के कट्टरपंथी माहौल को और अधिक बिगाडने में कोई कसर नहीं छोड रहे हैं। मगर पूरी दुनिया में यही हो रहा है। कटटरपंथी और अलगाववादी हर मुल्क को छिन्न-बिन करने में लगे है। कट्टरपंथियों ने समूचे मध्य-पूर्व एशिया को युद्ध की भठ्ठी में झोंक रखा है। सीरिया और इराक भीषण गृह युद्ध की चपेट में है। सीरिया से अब तक (अप्रैल 2015 तक) 40 लाख से ज्यादा लोग पलायन कर चुके हैं और दो लाख के करीब लोग गृह युद्ध में मारे जा चुके हैं। इस्लामिक स्टेट और इराकी सेना के बीच जारी युद्ध ने इस मुल्क को तहस-नहस कर डाला है। और इराक में युद्ध विभीशिका नब्बे के दशक से सदाम हुसैन की हकूमत के खिलाफ अमेरिका और उसके मित्र देशों के आक्रमण से लेकर आज तक बदस्तूर जारी है। 1975 से 1990 के बीच गृह युद्ध से पीडित लेबनान में 12 लाख लोग मारे गए थे। 1989 के तैफ करार के बावजूद शिया-मुसलमानों में झडपें आज भी जारी है। दरअसल, पूरा अरब शिया-सुन्नी मुसलमानों के बीच वर्चस्व की जंग है और यह आगे भी जारी रहेगा। पाकिस्तान के आंतरिक हालात भी सामान्य नहीं है। उत्तर-पश्चिम पाकिस्तान (वजीरिस्तान) में 2004 से सेना और तालिबान एवं अलगाववादी संगठनों के बीच भीषण युद्ध जारी है। शिया और सुन्नी मुस्लमानों के बीच जारी टकराव में 1987 से अब तक छह हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। बिगडते आंतरिक हालात से ध्यान बंटाने के लिए पाकिस्तान जब-तब भारत से युद्ध करने और कश्मीर मुद्दे को उछालता रहता है। पाकिस्तान को गीता के मामले से सबक लेना चाहिए। भारत में “गीतोपदेष “ का अपना महत्व है और पाकिस्तान भी इस सच्चाई को बखूबी जानता है। संयोगवश, पाकिस्तान में गीता के नामकरण और कराची में उसके भारतीय लालन-पालन में भी गीतोपदेश का मर्म छिपा है। इसे यूंही जाया नहीं किया जाना चाहिए। इस मर्म की पृश्ठभूमि भारत और पाकिस्तान के बीच द्धिपक्षीय संबंधों को मधुर बनाने के काम आ सकती है।
आठ साल की कच्ची उमर में भारत से पाकिस्तान जा रही ट्रेन में एक गूंगी-बहरी लडकी सरहद लांघ कर उस पार चली जाती है। इस बेनाम बच्ची को कराची स्थित इधी फाउंडेश न के सुपुर्द किया जाता है। 15 साल तक यह फाउंडेशन सगी संतान की तरह इस लडकी का हिंदू विधि-विधान से परवरिश करती है। वह भारत से आई थी, इसलिए उसका नाम गीता रखा जाता है। यह कोई “बजरंगी भाईजान“ की तरह फिल्मी कहानी नहीं है, बल्कि हकीकत है। फर्क सिर्फ“ इतना है कि "बजरंगी भाईजान" में भारतीय परिवार अपनी संतान की तरह पाकिस्तानी बालिका का लालन-पालन करता है। गीता के मामले में पाकिस्तान ऐसा करता है। इसके केवल एक ही मायने है। भारत और पाकिस्तान के बीच आज भी “आपसी भाईचारे और सदभाव“ का माहौल बरकरार है और दोनों देशों के कट्टरपंथी लाख कोशिशों के बावजूद सात दशक में भी इस भाईचारे को खत्म नहीं कर पाए हैं। सोमवार को 23 साल की गीता को जब स्वदेश भारत लाया गया तब देश में व्याप्त माहौल साफ-साफ कह रहा था कि भारत और पाकिस्तान में “भरत मिलाप“ संभव है। गीता को भारत को सौंपने के बावजूद इधी फाउंडेशन ने गीता से जुडे रहने का संकल्प दोहराया है। फाउंडेशन का कहना है कि सरहदें अतंरंग रिश्तों को अलग नहीं कर सकती। यही एक सच है जो भारत और पाकिस्तान की अवाम को आज भी आपस में जोडे हुए है। दोनों मुल्कों के सियासी और कट्टरपंथी नेता अवाम को बांटने की कितनी भी कोशिश कर लें , सदियों के भाईचारे को खत्म नहीं किया जा सकता है। गीता के मामले ने इस सच्चाई का अहसास कराया है कि भारत और पाकिस्तान आपस में लड-झगडने की बजाय प्रेमपूर्वक साथ-साथ रह सकते हैं। सरहद पर छोटी-मोटी झडपों और कश्मीर जैसे द्धिपक्षीय मसलों को सौहार्दपूर्ण संबंधों के आडे नहीं आने देना चाहिए। हर परिवार में अक्सर छोटी-मोटी बातों पर नोंक-झोंक होती रहती है मगर इसका यह कतई मतलब नहीं है कि इनसे परिवार ही टूट जाए। इस बात में दो राय नहीं है कि दिल्ली में मोदी सरकार के आने के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच द्धिपक्षीय संबंध बिगडे हैं और दोनों देशों के कट्टरपंथी माहौल को और अधिक बिगाडने में कोई कसर नहीं छोड रहे हैं। मगर पूरी दुनिया में यही हो रहा है। कटटरपंथी और अलगाववादी हर मुल्क को छिन्न-बिन करने में लगे है। कट्टरपंथियों ने समूचे मध्य-पूर्व एशिया को युद्ध की भठ्ठी में झोंक रखा है। सीरिया और इराक भीषण गृह युद्ध की चपेट में है। सीरिया से अब तक (अप्रैल 2015 तक) 40 लाख से ज्यादा लोग पलायन कर चुके हैं और दो लाख के करीब लोग गृह युद्ध में मारे जा चुके हैं। इस्लामिक स्टेट और इराकी सेना के बीच जारी युद्ध ने इस मुल्क को तहस-नहस कर डाला है। और इराक में युद्ध विभीशिका नब्बे के दशक से सदाम हुसैन की हकूमत के खिलाफ अमेरिका और उसके मित्र देशों के आक्रमण से लेकर आज तक बदस्तूर जारी है। 1975 से 1990 के बीच गृह युद्ध से पीडित लेबनान में 12 लाख लोग मारे गए थे। 1989 के तैफ करार के बावजूद शिया-मुसलमानों में झडपें आज भी जारी है। दरअसल, पूरा अरब शिया-सुन्नी मुसलमानों के बीच वर्चस्व की जंग है और यह आगे भी जारी रहेगा। पाकिस्तान के आंतरिक हालात भी सामान्य नहीं है। उत्तर-पश्चिम पाकिस्तान (वजीरिस्तान) में 2004 से सेना और तालिबान एवं अलगाववादी संगठनों के बीच भीषण युद्ध जारी है। शिया और सुन्नी मुस्लमानों के बीच जारी टकराव में 1987 से अब तक छह हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। बिगडते आंतरिक हालात से ध्यान बंटाने के लिए पाकिस्तान जब-तब भारत से युद्ध करने और कश्मीर मुद्दे को उछालता रहता है। पाकिस्तान को गीता के मामले से सबक लेना चाहिए। भारत में “गीतोपदेष “ का अपना महत्व है और पाकिस्तान भी इस सच्चाई को बखूबी जानता है। संयोगवश, पाकिस्तान में गीता के नामकरण और कराची में उसके भारतीय लालन-पालन में भी गीतोपदेश का मर्म छिपा है। इसे यूंही जाया नहीं किया जाना चाहिए। इस मर्म की पृश्ठभूमि भारत और पाकिस्तान के बीच द्धिपक्षीय संबंधों को मधुर बनाने के काम आ सकती है।






