उबलता पंजाब
पंजाब में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी पर 13 अक्टूबर को कोटकपूरा से शुरु हुआ बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है। सोमवार को हालांकि बवाल काफी हद तक शांत होता नजर आया मगर गरमपंथी अभी भी बवाल को तूल देने पर आमादा हैं। बंद के कारण एक सप्ताह से अधिक समय से स्कूल-कॉलेज बंद पडे हैं। कारोबार भी खासा प्रभावित हुआ है। सोमवार को संत समाज के राज्य के हर जिले में सडकों को तीन घंटे के लिए जाम रखने के फैसले से लोगों को काफी राहत मिली। जनता को हो रही परेशांनियों के दृष्टिगत सिख तालमेल कमेटी ने दिन में सुबह 10 बजे से 1 बजे तक तीन घंटे के लिए सडकें जाम रखने का निर्णय लिया था। तीन हिस्सों में बंटे आंदोलनकारी सिख संगठन इस फैसले पर पूरी तरह से अमल नहीं कर पाए। जालंधर में पूरे दिन सडकें जाम रहीं। सिमरजीत सिह मान की अगुवाई वाले गरमपंथी अकाली दल (अमृतसर) और भाई मोहकम सिंह के यूनाइटेड अकाल दल पूरे दिन के बंद के पक्ष में है। दमदमी साहिब के पूर्व जत्थेदार ज्ञानी केवल सिंह, संत पंथप्रीत सिंह तथा भाई रंजीत सिंह ढडरिया की अगुवाई वाला गुट तीन घंटे जाम के पक्ष में है। इस गुट को सत्ताधारी शिरोमणि अकाली दल का समर्थक माना जाता है। दरअसल, राज्य के गरमपंथियों को गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी पर उठे बवाल में अपने सियासी मकसद पूरा करने का सुनहरा मौका नजर आ रहा है। पूरा मामला गु्ररु ग्रंथ साहिब की बेअदबी का न होकर सियासी बन गया है। बादल समर्थक पीछे हट गए हैं मगर गरमपंथी इस मौके को भुनाने की फिराक में है। गरमपंथी लंबे समय तक आतंक की पीडा झेल चुके पंजाब को अशांत करने की कई बार नाकाम कोशिशें कर चुके हैं मगर सफल नहीं हो पाए हैं। इस बार उन्हें लगता है कि गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी पर उठे बवाल को वे लंबा खींच सकते हैं। यह बात दीगर है कि जनता को परेशानी में डालकर आज तक कोई भी आंदोलन कामयाब नहीं हुआ है। बहरहाल, मौजूदा बवाल को लेकर आम आदमी के मन-मष्तिस्क में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि आखिर वे कौन लोग हैं, जो पंजाब में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की हिमाकत कर रहे हैं। पुलिस ने सोमवार को बेअदबी के लिए एक महिला समेत दो लोगों को गिरफ्तार किया है। फरीदकोट बरगडी में गुरुग्रंथ साहिब की बेअदबी का मामला भी सुलझा लिया गया है। दो भाईयों को गिरफ़्तार किया गया है। पुलिस का दावा है कि इस बवाल में विदेशी साजिश की "बू " आ रही है। इतना तो तय है कि बेअदबी करने वाले पंजाब के हितैशी नहीं है। पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाष सिंह बादल के इन आरोपों में काफी वजन है कि पूरा मामला सरकार के खिलाफ साजिष का हिस्सा है। निहित स्वार्थी सियासी लोग राज्य को अशांत करके शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन सरकार को नकारा साबित करना चाहते हैं। मौजूदा स्थिति यही बता रही है। लगभग 100 गांवों की पंचायतों ने अकाली नेताओं का बहिष्कार करने और उन्हें गांवों में प्रवेश नहीं देने का फैसला लिया है। सियासी दल अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। चार दशक पहले कांग्रेस ने पंजाब में शिरोमणि अकाली दल को मात देने के लिए संत जरनेल सिंह भिंडरावाले को आगे किया था। मगर बाद में हालात कांग्रेस के हाथ से इस कद्र फिसल गए कि इंदिरा गांधी सरकार को 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार की मदद से भिंडरावाले से निपटना पडा। इस त्रासदी को सिख आज तक भूल नहीं पाए हैं। इससे पहले अमृतसर में निरंकारियों और सिखों के बीच हुए खूनी संघर्ष में 13 लोग मारे गए थे। 1982 में अकाली दल के आनंदपुर साहिब प्रस्ताव को लागू करवाने के लिए “धर्म युद्ध मोर्चा शुरु किया गया था। इस आंदोलन को दबाने के लिए भी तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने बल का इस्तेमाल किया था । लगभग तीन माह के अंतराल में 30,000 से ज्यादा सिखों को गिरफ्तार किया गया था। मौजूदा स्थिति कुछ-कुछ उन परिस्थितियों का स्मरण करा रही है। पाकिस्तान ने अशांत पंजाब को और अशांत करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा । पंजाब के सभी सियासी दलों को पिछली घटनाओं से सबक लेना चाहिए। पाकिस्तान आज भी खालिस्तानी समर्थकों की पीठ थपथपा रहा है और मौका मिलते ही वह पंजाब को फिर अशांत कर सकता है। पंजाब के फिर से आतंक की आग में झुलसने से उसकी अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो सकती है।
पंजाब में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी पर 13 अक्टूबर को कोटकपूरा से शुरु हुआ बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है। सोमवार को हालांकि बवाल काफी हद तक शांत होता नजर आया मगर गरमपंथी अभी भी बवाल को तूल देने पर आमादा हैं। बंद के कारण एक सप्ताह से अधिक समय से स्कूल-कॉलेज बंद पडे हैं। कारोबार भी खासा प्रभावित हुआ है। सोमवार को संत समाज के राज्य के हर जिले में सडकों को तीन घंटे के लिए जाम रखने के फैसले से लोगों को काफी राहत मिली। जनता को हो रही परेशांनियों के दृष्टिगत सिख तालमेल कमेटी ने दिन में सुबह 10 बजे से 1 बजे तक तीन घंटे के लिए सडकें जाम रखने का निर्णय लिया था। तीन हिस्सों में बंटे आंदोलनकारी सिख संगठन इस फैसले पर पूरी तरह से अमल नहीं कर पाए। जालंधर में पूरे दिन सडकें जाम रहीं। सिमरजीत सिह मान की अगुवाई वाले गरमपंथी अकाली दल (अमृतसर) और भाई मोहकम सिंह के यूनाइटेड अकाल दल पूरे दिन के बंद के पक्ष में है। दमदमी साहिब के पूर्व जत्थेदार ज्ञानी केवल सिंह, संत पंथप्रीत सिंह तथा भाई रंजीत सिंह ढडरिया की अगुवाई वाला गुट तीन घंटे जाम के पक्ष में है। इस गुट को सत्ताधारी शिरोमणि अकाली दल का समर्थक माना जाता है। दरअसल, राज्य के गरमपंथियों को गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी पर उठे बवाल में अपने सियासी मकसद पूरा करने का सुनहरा मौका नजर आ रहा है। पूरा मामला गु्ररु ग्रंथ साहिब की बेअदबी का न होकर सियासी बन गया है। बादल समर्थक पीछे हट गए हैं मगर गरमपंथी इस मौके को भुनाने की फिराक में है। गरमपंथी लंबे समय तक आतंक की पीडा झेल चुके पंजाब को अशांत करने की कई बार नाकाम कोशिशें कर चुके हैं मगर सफल नहीं हो पाए हैं। इस बार उन्हें लगता है कि गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी पर उठे बवाल को वे लंबा खींच सकते हैं। यह बात दीगर है कि जनता को परेशानी में डालकर आज तक कोई भी आंदोलन कामयाब नहीं हुआ है। बहरहाल, मौजूदा बवाल को लेकर आम आदमी के मन-मष्तिस्क में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि आखिर वे कौन लोग हैं, जो पंजाब में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की हिमाकत कर रहे हैं। पुलिस ने सोमवार को बेअदबी के लिए एक महिला समेत दो लोगों को गिरफ्तार किया है। फरीदकोट बरगडी में गुरुग्रंथ साहिब की बेअदबी का मामला भी सुलझा लिया गया है। दो भाईयों को गिरफ़्तार किया गया है। पुलिस का दावा है कि इस बवाल में विदेशी साजिश की "बू " आ रही है। इतना तो तय है कि बेअदबी करने वाले पंजाब के हितैशी नहीं है। पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाष सिंह बादल के इन आरोपों में काफी वजन है कि पूरा मामला सरकार के खिलाफ साजिष का हिस्सा है। निहित स्वार्थी सियासी लोग राज्य को अशांत करके शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन सरकार को नकारा साबित करना चाहते हैं। मौजूदा स्थिति यही बता रही है। लगभग 100 गांवों की पंचायतों ने अकाली नेताओं का बहिष्कार करने और उन्हें गांवों में प्रवेश नहीं देने का फैसला लिया है। सियासी दल अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। चार दशक पहले कांग्रेस ने पंजाब में शिरोमणि अकाली दल को मात देने के लिए संत जरनेल सिंह भिंडरावाले को आगे किया था। मगर बाद में हालात कांग्रेस के हाथ से इस कद्र फिसल गए कि इंदिरा गांधी सरकार को 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार की मदद से भिंडरावाले से निपटना पडा। इस त्रासदी को सिख आज तक भूल नहीं पाए हैं। इससे पहले अमृतसर में निरंकारियों और सिखों के बीच हुए खूनी संघर्ष में 13 लोग मारे गए थे। 1982 में अकाली दल के आनंदपुर साहिब प्रस्ताव को लागू करवाने के लिए “धर्म युद्ध मोर्चा शुरु किया गया था। इस आंदोलन को दबाने के लिए भी तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने बल का इस्तेमाल किया था । लगभग तीन माह के अंतराल में 30,000 से ज्यादा सिखों को गिरफ्तार किया गया था। मौजूदा स्थिति कुछ-कुछ उन परिस्थितियों का स्मरण करा रही है। पाकिस्तान ने अशांत पंजाब को और अशांत करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा । पंजाब के सभी सियासी दलों को पिछली घटनाओं से सबक लेना चाहिए। पाकिस्तान आज भी खालिस्तानी समर्थकों की पीठ थपथपा रहा है और मौका मिलते ही वह पंजाब को फिर अशांत कर सकता है। पंजाब के फिर से आतंक की आग में झुलसने से उसकी अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो सकती है।






