शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015

Need For Fast-track Justice

                                            त्वरित न्याय की दरकार

निर्दोष  लोगों के हत्यारों को सजा-ए-मौत ही मिलनी चाहिए। यही न्याय का तकाजा है। मुंबई की अदालत ने  2006 के मुंबई ट्रेन ब्लास्ट के पांच अभियुक्तों को सजा-ए-मौत दी है। सजा-ए-मौत से  हत्यारों को  कडा मैसेज  जाता है।  देर से सही मगर हादसे के शिकार लोगों के परिजनों के जख्मों पर मलहम-पट्टी हुई है। निर्दोष  लोगों की हत्या करने से बडा कोई जघन्य अपराध नहीं हो सकता।  मुंबई लोकल ट्रेन में 11 जुलाई 2006 को 11 मिनट के अंतराल में सात श्रृंखलाबद्ध धमाके कराकर आतंकियों ने 209 लोगों की हत्या की थी। इस हादसे में 700 से ज्यादा लोग घायल हो गए थे। बम धमाके प्रैशर कुकर का इस्तेमाल करके किए गए। हत्यारों का मकसद आतंक फैलाकर बदला लेना था। इस नरसंहार के लिए पुलिस ने लश्कर  के कथित कमांडर आजम चीमा उर्फ “बाबाजी“ समेत 13 लोगों को अभियुक्त बनाया था। चीमा आज तक पुलिस के हाथ नईं आया है। आतंकियों ने बाद में खुद माना था कि  श्रृंखलाबद्ध विस्फोट कराने में 16 लोगों का हाथ था। विस्फोट के 36 घंटों के भीतर पुलिस ने लगभग 350 लोगों को पूछताछ के लिए गिरफ्तार किया था। बाद में 12 को छोडकर सभी को रिहा कर दिया गया था। अदालत ने पांच प्रमुख अभियुक्तों  को फांसी की सजा सुनाई और सात को हत्यारों की मदद के लिए उम्र कैद। इस मामले की सुनवाई में भी नौ साल लग गए। नौ साल बहुत लंबा समय होता है। इस दौरान हादसे में मारे गए लोगों के परिजनों पर क्या गुजरी , नैसर्गिक न्याय भी उसकी भरपाई नहीं कर सकता। आतंक फैलाने वाले शैतान से भी बढकर होते हैं। शैतान को भी कभी-न-कभी अपने किए पर पछतावा होता है मगर आतंकी तो शैतान को भी मात दे गए हैं। बुधवार को अदालत लाए जाने पर अभियुक्त का व्यवहार एकदम ऐसा था मानो 209 की  हत्या करके उन्होंने “महान“ कार्य  किया हो। पांचों आरोपियों को अपने किए पर कोई पछतावा नहीं था। हत्यारे यह बात भली-भांति जानते हैं कि देश  की न्याय प्रकिया के तहत फांसी का फंदा आने तक लंबा समय लग सकता है। देश  की न्याय प्रकिया समय खपाऊ और अनावश्यक  रुप से जटिल है। माना हर अभियुक्त तब तक निर्दोष  है, जब तक उसका अपराध साबित नहीं हो जाता। मगर मुंबई नर संहार जैसे ( 26/11 हो या 11/2006) मामलों में त्वरित (फास्टट्रेक) न्याय होना चाहिए। न्याय प्रकिया की पेचदगियों का आतंकी बखूबी फायदा उठा रहे हैं। न्याय में विलंब से अपराधियों और आतंकियों के होसले  बुलंद हो रहे है़। सच यह है कि निर्दोष  लोगों की हत्या करने वाले और आतंक फैलाने वाले इस समय देश  के सबसे बडे दुश्मन है। आतंकियों से निपटना सरकार के लिए खासी सिरदर्द  साबित हो रही है। कश्मीर  से लेकर पूर्वोतर तक पडोसी मुल्कों की मदद से  आतंकियों का बडा नेटवर्क है। इसे नेस्तनाबूद करना सरकार के लिए सबसे बडी चुनौती है।  आतंकी हत्यारों को जल्द से जल्द सजा देकर, इस जाल को कुछ हद तक तोडा जा सकता है। आतंकियों की हरकतों के लिए देश  को बहुत बडी कीमत चुकानी पड रही है। आतंकियों द्वारा 1984 से अब तक करवाए गए 59 बम बिस्फोटों में 1889 निर्दोष  लोगों की जानें जा चुकी हैं। मगर इन विस्फोटों के लिए दोषी  अधिकांश  आतंकी पुलिस के हाथ तक नहीं आए हैं। इससे यह संदेश  जाता है कि देश  के दुश्मन आतंकी जब चाहें और जहां चाहें निर्दोष  लोगों को मार सकते हैं। और अगर त्वरित सजा  का  डर  न रहे, तो आतंकी घटनाएं बढना स्वभाविक है। न्याय त्वरित होना चाहिए।