अनुच्छेद 370ः भाजपा को झटका
जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली संवैधानिक व्यवस्था पर उच्च न्यायालय के अहम फैसले से अनुच्छेद 370 का मुखर विरोध करने वालों को करारा झटका लगा है। उच्च न्यायालय की व्यवस्था के बाद इस अनुच्छेद का विरोध करना भगवा पार्टी को महंगा पड सकता है। मगर लाख टके का सवाल यह है कि भाजपा क्या अनुच्छेद 370 का विरोध करना छोड देगी? उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि अनुच्छेद 370 स्थायी संवैधानिक व्यवस्था है, लिहाजा इसे न तो हटाया जा सकता है और न ही निरस्त किया जा सकता है। अनुच्छेद 370 को भले ही संविधान के “अस्थायी, परिवर्तित और विशेष प्रावधान“ वाले भाग 21 में रखा गया है, मगर इसके बावजूद यह संविधान में स्थायी तौर पर शामिल है। इसे निरस्त करने का अधिकार केवल संवैधानिक सभा (कांस्टिटयूनल असेंबली) को था मगर 1957 में भंग होने से पहले असेंबली ने राष्ट्र्पति से इस अनुच्छेद को भंग करने की कोई सिफारिश नहीं की थी। अब इस अनुच्छेद को निरस्त नहीं किया जा सकता है। यानी देश की संसद भी इसे निरस्त नहीं कर सकती है। भाजपा जम्मू में बार-बार यही कहती रही है कि संसद में दो-तिहाई बहुमत मिलते ही वह अनुच्छेद 370 को निरस्त कर देगी। उच्च न्यायालय के मुताबिक संविधान का अनुच्छेद 35ए जम्मू-कश्मीर के लिए लागू कायदे-कानूनों और 1954 के बाद राज्य विधानसभा द्वारा पारित कानूनों को संरक्षण प्रदान करता है। उच्च न्यायालय ने फैसले में उन परिस्थितियों का भी उल्लेख किया है जिनके तहत आजादी मिलने पर तत्कालीन जम्मू-कश्मीर रियासत का विलय भारत के साथ किया गया था। न्यायालय ने कहा है कि जम्मू-कश्मीर रियासत ने अन्य रियासतों की तरह भारत के साथ स्वतः विलय नहीं किया था। विलय के समय राज्य के मुसलमान बहुल क्षेत्र को बनाए रखना तय हुआ था। भारत में मुसलमान बहुल आबादी वाला यह एकमात्र राज्य है। जम्मू-कश्मीर की संप्रभुता सीमित है, इसीलिए इसे विशेष दर्जा दिया गया। जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने की एक खास वजह भी है। विलय के समय इस रियासत का शासक हिंदू था मगर आबादी मुसलमानों की ज्यादा थी। विलय के समय मुसलमानों को इस बात की आशंका थी कि हिंदू बहुल देश में विलय के बाद उतरोत्तर जम्मू-कश्मीर में भी अन्य प्रांतों के हिंदू स्थायी तौर पर बस सकते हैं। इससे अन्तोगत्वा मुसलमान राज्य में अल्पसंख्यंक हो सकते हैं। मुसलमानों की यह आशंका बेजा नही थी। इसी बात का ख्याल करते हुए जम्मू-कश्मीर को संवैधानिक विशेष दर्जा दिया गया। हिंदुवादी तत्कालीन जनसंघ और अब भाजपा को यह बात गवारा नहीं है। भाजपा शुरु से अनुच्छेद 370 का इसलिए मुखर विरोध कर रही है क्योंकि मुसलमान बहुल राज्य में उसकी दाल गलने से रही। भाजपा को आज भी मुसलमान विरोधी माना जाता है। और पार्टी के भगवा नेता आए दिन मुसलमान विरोधी आग उगल कर पार्टी के इस चरित्र को सार्वजनिक तौर पर उजागर करने में कोई कसर भी नहीं छोडते है। पिछले साल विधानसभा चुनाव के समय भी भाजपा ने जम्मू संभाग में स्थानीय नेताओं ने अनुच्छेद 370 को हटाने का मुद्दा उछाला था हालांकि पार्टी ने अधिकृत तौर पर इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखी। नतीजतन, विधानसभा चुनाव में भाजपा को जहां जम्मू में भारी जनादेश मिला, वहीं कश्मीर और जम्मू संभाग की मुसलमान बहुल हलकों में पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। कश्मीर घाटी के कई हलकों में तो भाजपा प्रत्याशियों की जमानत तक जब्त हो गई। बहरहाल, जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 का विरोध करना भगवा पार्टी की सामरिक विवशता है। यही एक मुद्दा है जिसके बलबूते जम्मू में अब तक भगवा पार्टी अपना जनाधार संभाले हुए है। अगर भाजपा अनुच्छेद 370 का विरोध करना छोड देती है, तो जम्मू में भी पार्टी का जनाधार खिसक सकता है। भगवा पार्टी ऐसा कभी नहीं होने देगी। न्याय का तकाजा तो यही है कि भगवा पार्टी उच्च न्यायालय के फैसले के बाद अनुच्छेद 370 का विरोध करना छोड दे मगर पार्टी ऐसा करेगी, इस पर संदेह है।






