शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

The "Panj Pyaras" And SGPC

                                               पंच प्यारों का निलबंन

सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था षिरोमणि गुरुद्धारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) और अकाल तख्त के पंच प्यारों के बीच का टकराव राज्य में किसी भी सूरत में कौम के हित में नहीं है। एसजीपीसी के इतिहास में पहली बार बुधवार को पंच प्यारों ने सिंह साहिबानों को तलब करने की हिमाकत की। पंच प्यारों की इस कार्रवाई से क्षुब्ध  अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी गुरबचन सिंह, तख्त श्री दमदमा साहिब के जत्थेदार ज्ञानी गुरुमुख सिंह, तख्त श्री पटना साहिब के ज्त्थेदार ज्ञानी इकबाल सिंह, तख्त श्री केसरगढ़ साहिब के जत्थेदार ज्ञानी मल्ल सिंह और तख्त श्री हजूर साहिब के जत्थेदार ज्ञानी राम सिंह ने शाम  होते- होते पंज प्यारों को ही उनके पदों से निलंबित कर दिया। एसजीपीसी के इतिहास में ऐसा भी पहली बार हुआ है। पंच प्यारों को एसजीपीसी द्वारा डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम इसां को माफी दिया जाना रास नहीं आया है। इसी का स्पष्टीकरण  लेने के लिए “पंच प्यारों“ ने सिंह साहिबानों को 23 अक्टूबर को तलब किया है। सिंह साहिबानों का कथन है कि “पंच प्यारों“ को उनके खिलाफ कार्रवाई करने का कोई अधिकार नही है और न ही ऐसी कोई परंपरा है। एसजीपीसी में पंजाब के मुख्यमंत्री की पार्टी  शिरोमणि अकाली दल का बोलबाला है और सिखों की इस धार्मिक संस्था पर बादल की जबरदस्त पकड है। पांचों सिंह साहिबानों को  शिरोमणि गुरुद्धारा प्रबंधक कमेटी द्वारा नियुक्त किया जाता है। एसजीपीसी पर क्योंकि बादल का वर्चस्व है, इसलिए पांचों सिंह साहिबानों की नियुक्ति में अकाली दल का खासा दखल रहता है। इस स्थिति का ख्याल करते हुए एसजीपीसी को धार्मिक कम, राजनीतिक संस्था ज्यादा माना जाता है। इसीलिए गरमपंथी एसजीपीसी को ज्यादा महत्व नहीं देते हैं और इस पर कब्जा करने की फिराक में रहते है। गरमपंथियों का मानना है कि डेरामुखी को माफी दिलवाने में मुख्यमंत्री बादल ने अहम भूमिका निभाई है। एसजीपीसी वही करती है जैसा बादल उससे करवाना चाहते हैं। माना जा रहा है कि इसी बात के दृष्टिगत  गरमपंथियों और सिख विद्धानों के दबाव में “पंच प्यारों“ ने सिंह साहिबानों को तलब करने का असाधारण निर्णय लिया। सिखों में “पंच प्यारों“ के प्रति एसजीपीसी से कहीं ज्यादा गहरी आस्था है। खालसा पंथ की नींव रखते समय गुरु गोबिंद सिंह ने “पंच प्यारों“ को नियुक्त करने की परंपरा शुरु की थी। पंच प्यारों को कौम का सरक्षक माना जाता है। पंजाब के हर गांव में आज भी “पंच प्यारों“ को नियुक्त करने की परंपरा है।  “पंच प्यारों“ का विशेष  महत्व है। गुरु गोबिंद सिंह द्वारा नियुक्त “पंच प्यारों की अपनी-अपनी अहम भूमिका रही है। भाई दया सिंह दया और अनुकंपा के प्रतीक थे। भाई धर्म  सिंह- धर्म  और सच्चाई के, भाई हिम्मत सिंह साहस के, भाई मोहकम सिंह अनुशासन एवं परिश्रम और भाई साहिब सिंह सरदारी एवं संप्रभुता के प्रतीक थे। यही परंपरा आज भी बरकरार है और मौजूदा “पंच प्यारों“ से भी सिख पंथ यही उम्मीद रखता है। गुरु ने “पंच प्यारों“ की नियुक्ति में पंथ के सभी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व दिया था और पांच प्यारों में तीन तत्कालीन पिछडी जाति के थे। मौजूदा एसजीपीसी ने यह सब ध्वस्त कर डाला है। महजबी सिखों को एसजीपीसी से बाहर रखा गया है। बहरहाल, अकाल तख्त और “पंच प्यारों“ के बीच का टकराव राज्य के हित में नहीं है। पवित्र ग्रंथ को अपवित्र करने की घटना से राज्य उबल रहा है।   अस्सी के दशक में संत जरनेल सिंह भिंडरावाले की अगुवाई वाले गरमपंथियों और एसजीपीसी के बीच भी इसी तरह के मुद्दों पर टकराव शुरु हुआ था। यह टकराव बाद में बढते-बढते राज्य को अलगाववाद और आतंक के मार्ग  पर ले गया था। सिख बहादुर कौम है और किसी भी तरह के त्याग के लिए हमेषा तत्पर रहती है, उसकी इसी खासियत का  देश  के दुश्मन  फायदा उठाते रहे हैं और आगे भी उठा सकते हैं। सिखों को इस बात का ख्याल रखना होगा।