खट्टर सरकार का खट्टा -मीठा एक साल
हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का एक साल का कार्यकाल “ठोस काम“ की बजाय विवादों में ज्यादा घिरा रहा है। विवाद-दर-विवाद में उलझी खट्टर सरकार का आलम यह है कि एक साल का कार्यकाल पूरा करने से चंद रोज पहले मुख्यमंत्री को “बीफ“ पर बयान देने के लिए प्रधानमंत्री और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से डांट खानी पडी है। इस घटना से पता चलता है कि राज्य में पहली बार अपने बूते सत्तारूढ हुई भाजपा सरकार की दिशा और दशा क्या है। मुख्यमंत्री संवैधानिक पद है और देश का संविधान “धर्मनिरपेक्ष“ है, “धर्मसापेक्ष नहीं। संविधान में देश के हर नागरिक को अपना धर्म चुनने और उसी मुताबिक खान-पान तय करने का अधिकार है। और अगर संवैधानिक पद पर आसीन मुख्यमंत्री कहे कि मुसलमानों को भारत में रहने के लिए गोमांस का सेवन बंद करना पडेगा, यह उनकी मान-मर्यादा के विपरीत ही नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारियों का उल्लघंन है। मगर खट्टर ही क्यों, उनके मंत्रिमंडल सहयोगी भी विवादास्पद बयान देने में पीछे नहीं रहे हैं। कृषि मंत्री ओपी धनखड आत्महत्याओं पर विवादास्पद बयान देकर किसानों की नाराजगी मोल ले चुके हैं। शिक्षा मंत्री राम बिलास शर्मा देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु पर विवादस्पद बयान देकर पार्टी और सरकार को सांसत में डाल चुके हैं। स्वास्थय मंत्री अनिल विज के तो कहने ही क्या? आए दिन बेबाक बयानबाजी करने के अलावा विज जासूसी का आरोप लगाकर अपनी ही सरकार का चिठ्ठा खोल चुके हैं। मंत्री गण ही नहीं, कुरुक्षेत्र के सांसद राज कुमार सैनी और करनाल के सांसद अश्विन चोपडा जब-तब विवादास्पद बयान जारी करके सरकार और पार्टी की मिट्टी पलीत कर रहे हैं। केन्द्रीय मंत्री राव बीरेन्द्र सिंह भी “सत्य वचन“ बोलकर खट्टर सरकार की खाट खडी करने में लगे हुए हैं। पिछले एक साल के दौरान यही होता रहा है। शीर्ष नेता एक-दूसरे की टांग खींच रहे हैं और राष्ट्रीय स्वंय सेवक को खुश करने के लिए कट्टरपंथी बातें करके राज्य के सांप्रदायिक माहौल पर प्रहार कर रहे हैं। जनता से चुनाव के समय किए गए वायदे तो पूरे नहीं किए जा रहे हैं, अलबत्ता भगवा एजेंडे पर संजीदगी से काम चल रहा है। राज्य में शिक्षा के भगवाकरण के लिए खट्टर सरकार ने राष्ट्रीय स्वंय सेवक (आरएसएस) से जुडे दीनानाथ बत्रा को नई “शिक्षा नीति“ तैयार करने का जिम्मा सौंपा गया है और योग गुरु बाबा रामदेव को ब्रांड एम्बेसडर बनाया गया है। भगवत गीता के श्लोकों और योगा को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। पूरे साल भगवा एजेंडे पर काम होता रहा है। नतीजतन, राज्य में दलितों और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के मामले बढे हैं। दबंगों ने सोमवार की आधी रात को देश की राजधानी दिल्ली से सटे फरीदाबद के सनपेड गांव में दलित परिवार के दो मासूमों को जिंदा जला डाला। इस जघन्य हत्याकांड पर पूरे देश में थू-थू हो रही है और इससे राज्य का नाम खराब हुआ है। मुख्यमंत्री मनोहर लाल खटटर लंबे समय तक आरएसएस के प्रचारक रहे हैं और उन्हें मुख्यमंत्री बनाने में आरएसएस की अहम भूमिका रही है। इस बात के द्दृष्टिगत् स्वभाविक है कि भगवा एजेंडे को लागू करना खट्टर सरकार की पहली प्राथमिक है। बहरहाल, एक बात के लिए खट्टर सरकार की तारीफ की जानी चाहिए। भ्रष्टाचार पर उसकी जीरो टोलरेंस की नीति रंग दिखा रही है। आधार से जुडे बायोमैट्रिक अटेडेंस सिस्ट्म के भी सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। फाइलों की ई-ट्रेकिंग से बेलगाम नौकरशाही की कार्यशैली में सुधार आया है। सरकारी नौकरियों की भर्तियों में साक्षात्कार के अंक घटाकर सरकार ने भाई-भतीजावाद को कम करने और पारदर्शिता लाने का प्रयास किया है। और भी कुछ अच्छे काम हुए हैं। मगर कहते हैं एक बुरा काम सौ अच्छे कामों पर पानी फेर देता है। खट्टर सरकार को इन बातों का ख्याल रखना होगा। जनता भाजपा सरकार से बदलाव और अच्छे दिन की उम्मीद करती है।






