शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

Reservation Killing The Talent

                                                    आरक्षण का जिन्न

सर्वोच्च न्यायालय ने इस सप्ताह कुछ अहम फैसले सुनाए हैं। मंगलवार को न्यायालय ने  केन्द्र और राज्यों की सरकारों को निर्देश  दिए हैं कि मेडिकल के सुपर स्पेशलिस्ट कोर्सेस  में आरक्षण को फौरन बंद किया जाए। न्यायालय को शिकायतें मिलीं थीं कि कुछ राज्यों द्वारा सुपर  स्पेशलिस्ट मेडिकल कोर्सेस में भी  आरक्षण दिया जा रहा है। आंध्र प्रदेश , तेलगांना और तमिल नाडु में   स्पेशलिस्ट मेडिकल कोर्सेस की एडमिशन में स्थानीय उम्मीदवारों को आरक्षण दिए जाने के खिलाफ एमबीबीएस डॉक्टरों ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लाई थी। न्यायालय का कहना है कि उच्च  शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण ने प्रतिभा को मार डाला है। यह किसी भी सूरत में देशहित में नहीं है। आम  आदमी भी यही मानता है। सियासी नेता अपने राजनीतिक स्वार्थों की खातिर प्रतिभा का गला घोंट रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट  के ताजा फैसले ने फिर इस सच्चाई को उजागर किया है कि महत्वपूर्ण  मामलों में भी सियासी दल देशहित को नजरांदाज करके सिर्फ “वोट“ की राजनीति कर रहे हैं। राज्यों की सरकारों को इस बात की कोई परवाह नहीं है कि देश -प्रदेश  का हित प्रतिभा को बढाने में  है न कि प्रतिभा को दबाने में। बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र और राज्यों को  स्पष्ट  निर्देष दिए हैं कि सुपर  स्पेशलिस्ट  कोर्सेस की एडमिशन में मेरिट को ही आधार माना जाए। न्यायालय के इस फैसले से अब देश  को योग्यतम  सुपर  स्पेशलिस्ट  डाक्टर्स  मिलने की उम्मीद की जा सकती है। बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय ने एक और अहम फैसले में दीपावली पर रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक पटाखें फोडने पर लगाए गए प्रतिबंध को और ज्यादा बढाने से साफ मना कर दिया। न्यायालय ने कहा वह लोगों से यह नहीं कह सकता कि पटाखें नहीं चलाएं अथवा कहीं और चलाएं। इस तरह के आदेश  क्योंकि लोगों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ है, इसलिए न्यायालय ने यह व्यवस्था दी। सुप्रीम कोर्ट  2005 में पटाखे फोडने के लिए गाइडलाइंस जारी कर चुका है। अब यह काम सरकार का है कि इन गाइडलाइंस पर सख्ती से अमल करवाया जाए। जाहिर है कार्यपालिका का काम न्यायपालिका नहीं कर सकती। अगर आदेशों पर अमल भी न्यायपालिका को ही करवाना है, तो कार्यपालिका की कोई बुकत नहीं रह जाएगा। वैसे भी न्यायपालिका पिछले कुछ समय से काफी सक्रिय है और ऐसे कई मामलों में न्यायपालिका को दखल देना पडा है, जो कार्यपालिका को करने थे। उदाहरण के लिए, वाहन चलाते समय सीट बेल्ट लगाना  कानूनन अनिवार्य  है और इसका सख्ती से पालन करवाना  प्रशासन  और पुलिस का काम है। इसी तरह वाहनों में पूरी तरह से काली फिल्में लगाना भी गैर-कानूनी है। पुलिस और प्रशासन तो इसे रोक नहीं पाई, अततः सर्वोच्च न्यायालय को दखल देना पडा। कुछ समय के लिए इस पर रोक लगाई भी गई मगर अब फिर वही पुराना ढर्रा चल पडा है। वाहनों पर लाल और नीली बत्ती लगाकर और सायरन बजाते लोगों पर रौब झाडना देश  में सियासी लोगों का शौक   है।  सुप्रीम कोर्ट  ने इस पर प्रतिबंध लगा रखा है। मगर इस पर भी आज तक संजीदगी से अमल न हो पाया है। अभी भी ऐरा-गैरा लाल बती लगाकर और सायरन बजाते सरेआम घूमते हैं। और खुदा-न-खास्ता पुलिस के हत्थे चढ भी जाएं, घूस देकर फौरन छूट जाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय संसद और विधानसभाओं को आपराधिक पृष्टभूमि  वाले नेताओं से मुक्त करने के लिए भी व्यवस्था दे चुका है मगर इससे भी सियासी दलों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी है। देश की सबसे बडी त्रासदी यही है कि कायदे-कानून को लागू करने वाले इस कद्र भ्रष्ट  हो चुके हैं लि कानून हर मुकाम पर बौना और लाचार नजर आता है। देश  की कार्यपालिका बहुत पहले अपनी विश्वसनीयता   खो चुकी है। संसद और विधानसभाओं की कार्यवाही को धडल्ले से बाधित किया जा रहा है और  कानून बनने के बावजूद आपराधिक पृश्ठभूमि वाले नेता संसद और विधाासभाओं में चुनकर आ रहे हैं, इससे उतरोतर विधायिका की विश्वसनीयता   में भी गिरावट आ रही है।  इन हालात में न्यायपालिका की सक्रियता भी देश  को गर्त में जाने से नहीं बचा सकती है।