बापू के गुण अपनाएं
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 146वीं जयंती पर शुक्रवार को हमने वही किया जो हम साल-दर-साल कर रहें हैं। हर साल की तरह इस बार भी देश में जगह-जगह उन्हें स्मरण किया गया। राजघाट जाकर प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने बापू को नमन किया और उन्हें अपना सबसे बडा प्रेरणा स्त्रोत बताया। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी राजघाट गईं और महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि दी। पूरे देश में यही क्रम चलता रहा। बस इससे ज्यादा कुछ नहीं। आजादी के बाद से आज तक यही हो रहा है। साल में दो बार गांधी जयंती दो अक्टूबर और उनकी पुण्य तिथि 30 जनवरी को हम राष्ट्रपिता को याद करते हैं। उनके सिद्धांतो पर चलने की कसमें खाते हैं और फिर सारे साल उन्हें भूल जाते हैं। पिछले साल गांधी जयंती पर प्रधानमंत्री ने देशव्यापी “स्वच्छता अभियान“ शुरु किया था। “स्वच्छ भारत“ महात्मा गांधी का सपना था। पिछले साल जब “स्वच्छ भारत“ शुरु किया गया था, तब बापू के इस सपने को साकार करने का संकल्प लिया गया था। एक साल में यह संकल्प रफूचक्कर हो गया है। जगह-जगह फैली गंदगी इस अभियान के हश्र को बयां करती है। देश के सबसे “खुबसूरत शहर“ चंडीगढ तक को सरकार स्वच्छ नहीं बना पाई जबकि यह काम इतना कठिन नहीं था। चंडीगढ के पडोसी पंचकूला में इस अभियान का कोई नामोनिशान तक नहीं है। इस बार प्रधानमंत्री गांधी जयंती पर बिहार में चुनावी जनसभाओं को संबोधित करने में व्यस्त रहे। वहां प्रधानमंत्री ने “पर्यावरण“ को गांधी से जोडकर एक नया संकल्प लिया। पिछले साल शुरु किए गए “स्वच्छ अभियान“ की समीक्षा तक नहीं की गई। टवीटर पर प्रधानमंत्री ने लोगों से इस अभियान को सफल बनाने का आहवान करके इतिश्री कर ली। सच कहा जाए तो आजादी के बाद से आज तक राष्ट्रपिता मात्र “वोट भुनाने“ का जरिया बनकर रह गए हैं। लंबे समय तक कांग्रेस ने बापू को “वोट“ के लिए भुनाया और अब भाजपा महात्मा के नाम को भुना रही है। दिल्ली के वरिश्ठ भाजपा नेता विजय गोयल ने तो हद ही कर दी है। अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की महात्मा गांधी से तुलना की है। महात्मा गांधी साधारण शख्सियत नहीं थे। वे महामानव थे। हम सब उनके समक्ष बौने नजर आते है। वे सत्ता से कोसों दूर थे। अपने जमाने में उनकी सोच सबसे अलग थी। महात्मा गांधी ने वह कर दिखाया जिसकी हम कल्पना तक नहीं कर सकते। अहिंसक आंदोलनों से महाशक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य को परास्त करने की मिसाल इतिहास में ढूंढे नहीं मिलती है। महात्मा गांधी सबसे अलग थे। उनकी कोई सानी नहीं कर सकता। एक जमाने में दक्षिणपंथी जनसंघ (भाजपा की पूर्वज) महात्मा गांधी से घृणा करती थी और उन्हें देश की ज्वलंत समस्याओं का मूल कारण मानते थे। मगर भाजपा के नए अवतार में अस्सी के दशक में पार्टी को महात्मा गांधी याद आए और भाजपा ने “गांधीवादी समाजवाद“ को भुनाने की कोशिश की। अब गांधी के उन कार्यक्रमों को अपनाया जा रहा है, जिन्हें कांग्रेस पहले ही भुना चुकी है। भाजपा का “स्वदेशी नारा“ भी महात्मा गांधी के “स्वदेशी आंदोलन “ की नकल है। पिछले सात दशक से यही सिलसिला चल रहा है। महात्मा गांधी सियासी नेताओं के लिए कितने अहम है, इसका पता इस बात से चलता है कि महात्मा गांधी को आज तक “राष्ट्रपिता “ के अधिकृत सम्मान से नवाजा तक नहीं गया है। भारत को आज महात्मा गांधी के दिखाए मार्ग पर चलने की सख्त जरुरत है। सत्य, सादगी, अहिंसा और सहिष्णुता में बापू का अटल विश्वास था। उनके सपनों के भारत का निर्माण करने के लिए इन्हीं गुणों को अपनाने की जरुरत है। यही बापू के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।






