मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

The Interview Sans Recruitment in Central Govt

                            साक्षात्कार बगैर चयन


केन्द्र सरकार में छोटे पदों की साक्षात्कार आधारित भर्ती को खत्म करने का फैसला क्रांतिकारी साबित हो सकता हैं बशर्ते इस पर संजीदगी से अमल किया जाए।  देश  में गरीब और असहाय तबकों को वास्तव में सरकारी नौकरी की सबसे ज्यादा जरुरत है।  प्रधानमंत्री ने रविवार को “मन की बात“ कार्यक्रम में इस आशय की घोषणा की। इस साल स्वत्रंतता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री ने संकेत दिए थे कि कुछ क्षेत्रों में घूसखोरी घर  कर गई  है और सरकारी नौकरियों में भर्ती की मौजूदा प्रकिया इन क्षेत्रों में प्रमुख है। प्रधानमंत्री के अनुसार भर्ती की आड में गरीब और छोटे तबके दलालों के हाथों लूटे जा रहे हैं। नौकरी पाने के लिए जरुरतमंद जैसे-तैसे पैसा जुटाकर दलाल को देता है मगर उसे न नौकरी मिलती है और न ही पैसा वापस मिलता है। यह बात सौ फीसदी सच है कि दुनिया में ऐसा कोई भी मनोविज्ञान नहीं है, जिसके बलबूते दो-एक मिनट में उम्मीदवार की योग्यता परखी जा सके। जाहिर है साक्षात्कार की आड में बेरोजगारों से खेल किया जा रहा है। इस चयन प्रकिया  में सिफारिश  और भाई-भतीजावाद का भी बोलबाला रहता है। बहरहाल, पहली जनवरी 2016 से केन्द्र सरकार के ग्रुप  ”बी“, ”सी“ और ”डी” श्रेणी के कर्मचारियों की भर्ती बगैर साक्षात्कार के ही की जाएगी। केन्द्र में हर साल इन श्रेणियों के एक लाख से ज्यादा पद भरे जाते हैं। निसंदेह, सरकार के इस फैसले से सरकारी नौकरियों की भर्ती में पारदर्शिता  और निष्पक्षता  आ सकती है। मगर सवाल यह है कि भीषण बेरोजगारी, गला काट प्रतियोगिता और सिफारिश  के इस जमाने में बगैर साक्षात्कार के योग्य उम्मीदवारों का निष्पक्ष  चयन कैसे सुनिश्चित  किया जाएगा? सरकार ने अभी तक साक्षात्कार रहित भर्ती की प्रकिया स्पष्ट नहीं  की है।  दिल्ली पुलिस ने हाल ही में सब-इंसपेटर्स  और ग्रुप सी के पदों के लिए बगैर साक्षात्कार के ही भर्ती के आदेश जारी किए हैं मगर  प्रक्रिया क्या होगी , यह अभी तक तय नहीं है । पुलिस एवं सुरक्षा बलों में बगैर साक्षात्कार के भर्ती करना सरल है क्योंकि इन महकमों में  शारीरिक योग्यता को ज्यादा महत्व दिया जाता है और इस मामले में किसी तरह के पक्षपात की कोई गुजांइश  नहीं रहती  है। मगर मिनिस्टिरियल और अन्य छोटे पदों की भर्ती में चयन प्रकिया तय करने में खासी दिक्कतें खडी हो सकती हैं। क्या चयन प्रकिया लिखित परीक्षा पर आधारित होगी अथवा शैक्षणिक योग्यता की मेरिट पर?  लिखित परीक्षा पर आधारित चयन प्रकिया से परीक्षाएं पास कराने  की गारंटी देने वाली कमर्शियल दुकानें शुरू  हो जाएंगी और गरीब फिर बाहर हो जाएगा। और अगर शैक्षणिक योग्यता को चयन का आधार बनाया जाता है तो भी पात्र  लोगों से अन्याय हो सकता है। न्यूनतम स्नातक योग्यता वाले पद पर पीएचडी,एम,एमफिल उम्मीदवारों को दरकिनार नहीं किया जा सकता। इस स्थिति में स्नातक की कोई अहमियत नहीं रह जाती है। ऐसे में गरीब स्नातक पास उम्मीदवार पिछड जाएगा। बढती बेरोजगारी के इस जमाने में चपरासी और लिपिक पदों के लिए  पीएचडी उम्मीदवारों द्वारा आवेदन करना आम है। सितंबर में उत्तर प्रदेश  सरकार में 365 चपरासी के पदों के लिए लगभग 23 लाख उम्मीदवारों ने आवेदन किया और इनमें कई पीएचडी, एमबीए और एम टैक डिग्री होल्डर थे। हर राज्य में यही हाल है। कुछ साल पहले मेडिकल और इंजीनियरिंग की एडमिशन बगैर पीएमटी के विशुद्ध मेरिट पर होती थी। सियासी लोगों को यह पद्धति रास नहीं आई क्योंकि इसके तहत पक्षपात अथवा हेराफेरी की कोई गुजाइंश  ही नहीं थी और यह पद्धति ग्रामीण एवं पिछडे तबकों के भी माफिक थे। दरअसल, सिफारिश  और भाई-भतीजावाद समकालीन सियासत की सबसे बडी फितरत है। यहां तक कि चुनावों में पार्टी के टिकटों का वितरण भी सिफारिश  और भाई-भतीजावाद को सामने रखकर किया जाता है।बीजेपी भी इससे अछूती नहीं है।  साक्षात्कार बगैर भर्ती में भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि यह सिफारिश  और भाई-भतीजावाद से मुक्त रहेगी। राज्यों में साक्षात्कार बगैर भर्ती प्रकिया लागू होने से “ अधीनस्थ सेवाएं चयन बोर्ड“ (एसएसएसएसबी) सफेद हाथी बन जाएंगे। इन बोर्डों का अधिकतर काम साक्षात्कार से भर्ती करना है।