मंगलवार, 6 अक्टूबर 2015

Truckers' Strike: Why Should Public Suffer?

                                                            जनता क्यों भुगते खामियाजा?


हडताल करके जनमानस को परेशान करना देश  में आम बात हो गई है। किसी को इस बात की चिंता नही है कि इससे देश  को कितना नुकसान हो रहा है। न्यायपालिका कई बार हडताल को अवैध बता चुकी है मगर इसका भी कोई असर नहीं पडा है। पिछले पांच दिन से  ट्रांसपोर्टर्स   देशव्यापी हडताल पर है। इससे देश  के विभिन्न भागों में फल-सब्जियां महंगी हो गई हैं हालांकि  ट्रक ऑपरेटर्स  ने सब्जियों, दूध और दवाओं की ढुलाई को  हडताल से बाहर रखा है। अब हडताली  ट्रांसपोर्टर्स ने धमकी दी है कि अगर जल्द उनकी मांगें नहीं मानी गई तो दूध, सब्जी और दवाओं की  ढुलाई भी रोक दी जाएगी। ऑल इंडिया मोटर्स  ट्रांसपोर्ट कांग्रेस (एआईएमटीसी) के आहवान पर जारी इस हडताल से अब तक  ट्रांसपोर्टर्स को 7500 करोड रु का नुकसान हो चुका है। हडताल से अर्थव्यवस्था को 50,000 करोड रु से ज्यादा का नुकसान हो चुका है। जैसे-जैसे हडताल जारी रहेगी, नुकसान बढता जाएगा। एआईएमटीसी का दावा है कि 90 लाख ट्रक और 50 लाख बस ऑपरेटर्स  उसके सदस्य हैं और सभी हडताल पर हैं। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश  और चंडीगढ के लगभग दो लाख ट्रक इस हडताल में शामिल है। हडताल से लुधियाना के स्क्रैप डीलर्स  का हजारों टन स्क्रैप  ढुलाई नहीं होने से रुका पडा है। पानीपत के हैडलूम निर्यातकों पर आर्डर रदद होने का  खतरा मंडरा रहा है।  अगर हडताल दो-एक दिन में खत्म नहीं हो जाती, रीजन के उद्योग बंद हो सकते हैं।  सबसे ज्यादा नुकसान लुधियाना और जालंधर के उधोगों को हो रहा है। लुधियाना से होजरी, हैंडटूल्स, साइकिल और ऑटो पार्टस का निर्यात रुका पडा है। हडताल की वजह टोल टैक्स व्यवस्था है।   ट्रांसपोर्टर्स (एआईएमटीसी) इस व्यवस्था को समाप्त करने की मांग कर रहे है़।  एआईएमटीसी का आरोप है कि टोल टैक्स व्यवस्था से उन्हें प्रताडित किया जा रहा है।  ट्रांसपोर्टर्स की इस शिकायत को दूर करने के लिए सरकार ने दिसंबर से ई-टोल टैक्स व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया है। पर  ट्रांसपोर्टर्स को यह भी स्वीकार नहीं है। उनकी मांग है कि टोल-टैक्स को पूरी तरह खत्म करके रोड टैक्स की तरह इसे भी एकमुश्त  वसूला जाए।  सरकार कहती है कि यह मुमकिन नहीं है। देश  में करीब 325 टोल हैं और इनमेंसे 50 फीसदी निजी सेक्टर ने अपना पैसा लगाकर बनवा रखे हैं। निजी क्षेत्र ने इन टोलस को इस षर्त पर बनाया था कि बाद में टोल टैक्स एकत्र करके वे अपना पैसा वसूल कर लेंगे। इस स्थिति में मौजूदा टोल व्यवस्था को समाप्त नहीं किया जा सकता है। अगर ऐसा किया जाता है तो सरकार को टोल बनवाने वालों को भारी हर्जाना देना पड सकता है। बहरहाल, स्थिति विकट है। सरकार की अपनी विवशता है, इसीलिए शनिवार को दोनों पक्षों में वार्ता किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई। वैसे ट्रांसपोर्टर्स की इस मांग में वजन है कि रोड टैक्स की तरह टोल टैक्स भी एकमुश्त एकत्र किया जाना चाहिए। इससे न केवल सरकार, अलबत्ता ट्रक ऑपरेर्टस को भी तरह-तरह के झंझटों से मुक्ति मिल सकती है। एकत्रित टोल टैक्स से सरकार निजी क्षेत्र का निवेश  लौटा सकती है। एक और विकल्प यह है कि ट्रांसपोर्टर्स को टोल टैक्स  में  शामिल किया जा सकता है। 90 लाख सदस्य वाले  एआईएमटीसी के लिए यह काम मुश्किल  नहीं है। वैसे भी देश  में टोल टैक्स व्यवस्था आम जनता पर भारी पड रही है। अपने वाहन में सफर करने वालों को सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है। चंडीगढ से पठानकोट-जम्मू तक के निजी वाहन से आने-जाने पर छह सौ रु से ज्यादा का टोल टैक्स देना पडता है। यह आम आदमी की लूट-खसोट की पराकाष्ठा  है। किसी भी देश  में इस तरह अपने वाहन में सफर करने वालों का शोषण  नहीं किया जाता। सरकार को ट्रक ऑपरेटर्स  से वातचीत करके हडताल को तुरंत खत्म कराना चाहिए। लोगों को बार-बार हडताल का खामियाजा क्यों भुगतना पडता है।