दुनिया की सबसे महत्वाकांक्षी रोजगार सुरक्षा योजना-मनरेगा- अपने मूल मकसद को संजीदगी से हासिल नहीं कर पा रही है। ग्रामीण सुधार और हर परिवार को साल में कम-से-कम सौ दिन का रोजगार मुहैया कराने के मकसद से शुरु की गई इस योजना को भी भ्रष्टाचार का घुन लग चुका है। अप्रैल, 2006 को नरेगा ( नेशनल रूरल रोजगार गारंटी एक्ट) के नाम से देश के 200 जिलों में इस योजना को शुरु किया गया था। अप्रैल, 2008 से इस योजना को पूरे देश में लागू किया गया और इसका नाम बदल कर महात्मा गांधी नेशनल रूरल रोजगार गारंटी एक्ट (मनरेगा) रखा गया। इस एक्ट के तहत देश में पहली बार ग्रामीण क्षेत्रों में “रोजगार का हक“ प्रदान किया गया और हर परिवार के एक सदस्य को सौ दिन के रोजगार की गारंटी दी गई। पूरी दुनिया में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार द्वारा शुरु की गई इस योजना को सराहा गया। वर्ल्ड बैंक ने 2014 में मनरेगा को “ग्रामीण क्षेत्रों के समग्र विकास का स्तंभ“ बताया है। मोदी सरकार ने भी इस योजना को जारी रखा है। 2012 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा जारी समीक्षा रिपोर्ट में बताया गया है कि इस योजना के तहत 1200 करोड लोगों को रोजगार दिया जा चुका है और तब तक मनरेगा पर 1 लाख 10 हजार करोड खर्च किया जा चुका था। मनरेगा के अलावा दुनिया में कहीं भी इतनी बडी योजना नहीं है। मनरेगा की दो प्रमुख विशेषताएं हैं। योजना के तहत विकास कार्यों को पंचायत द्वारा कार्यान्वनित किया जाता है। ठेकेदारों को मनरेगा से दूर रखा गया है। मनरेगा के तहत बाढ, सूखे और अन्य आपदाओं से निपटने और इंफरास्ट्रक्चर से जुडे के कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जाती है। मनरेगा के कार्यन्वयन और प्रबंधन के लिए पुख्ता नियम बनाए गए हैं। विकास कार्यों के लिए बाकायदा दिशा -निर्देश तय हैं और कार्यन्वयन की मांनिटरिंग तथा मूल्यांकन के लिए भी संहिता बनाई गई है। महाराष्ट्र देश का पहला ऐसा राज्य है जहां सतहर के दशक में ही रोजगार गारंटी योजना शुरु की गई थी। तब मराठवाडा और विदर्भ में लगातार सूखे की स्थिति से लोगों के भूखों मरने की नौबत आ गई थी। महाराष्ट्र की तत्कालीन वसंतराव नाइक सरकार ने पहली बार रोजगार गारंटी योजना शुरू की और इससे सूखा पीडितों को खासी राहत मिली। बाद में योजना आयोग ने इस योजना को अपनाकर इसे पूरे देश में लागू किया। तब से देश में रोजगार के नाम पर कई योजनाएं चलाईं गई। इनमें फूड फॉर वर्क प्रोग्राम“, “जवाहर रोजगार योजना“, “इम्पलॉयमेंट एसोयोरेंस स्कीम“, “जवाहर ग्रामीण समृद्धि योजना“, और “सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना“ प्रमुख है। इन सभी योजानाओं का मकसद भी ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सृजित करना था। मगर इन सभी योजनाओं के कार्यन्वयन में भयंकर खामियां रही हैं और बडे पैमाने पर फैले भ्रष्टाचार ने इन रोजगार योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक पहुंचने ही नहीं दिया। 1973 से 2004 के दरम्यान शुरु की गई विभिन्न योजनाओं पर तीन लाख करोड रु से ज्यादा का व्यय हो चुका है मगर इस दौरान गरीब रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वालों की संख्या बढी है, घटी नहीं है। सवाल उठता है कि रोजगार गारंटी योजनाओं का पैसा आखिर गया कहां ? योजना आयोग (मौजूदा नीति आयोग) द्वारा करवाए गए मूल्यांकन में पाया गया है कि नौकरशाही-ठेकेदारों के भ्रष्ट गठजोड ने ग्रामीण क्षेत्रों की अधिकांश योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक पहुंचने ही नहीं दिया। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सार्वजनिक तौर पर माना था कि विकास की योजनाओं का 90 फीसदी पैसा बिचौलियों द्वारा बीच में हजम कर दिया जाता है। देश का प्रधानमंत्री अगर यह बात कहता है तो इससे सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि सरकारी योजनाओं का क्या हश्र होता है। पिछले अनुभव से सीख लेकर मनरेगा को फुलप्रूफ बनाया गया है मगर इतना सब किए जाने के बावजूद भ्रष्टाचार ने इस योजना को भी जकड लिया है। दुखद स्थिति यह है कि मनरेगा जैसी रोजगार योजनाओं से भ्रष्टाचार निचले स्तर तक पांव पसार चुका है। यधपि मनरेगा कार्यों में ठेकेदारों को बाहर रखा गया है पर पंचायत पदाधिकारी खुद ठेकेदार बनकर कार्य कर रहे हैं। वैसे भी ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत के अधिकतर पदाधिकारी अब तक ठेकेदारी का काम करते रहे हैं। मनरेगा को इन सब बातों से बचना होगा।
मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015
MNREGA: World's Largest Employment Guarantee Program Need Close Monitoring
Posted on 12:19 pm by mnfaindia.blogspot.com/






