सत्ता की भूख
दिल्ली में विधायकों के वेतन और भत्ते लगभग चार गुना बढाने के प्रस्ताव ने आम आदमी पार्टी की कलई खोल दी है। वित्तीय संसाधनों के संकट से जूझ रही दिल्ली विधानसभा की इस दरियादिली पर तीखी प्रतिक्रियाएं आना स्वभाविक है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने प्रस्तावित वृद्धि का मुखर विरोध किया है। और अगर दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने विधायकों की वेतन-भत्ते वृद्धि संबंधी सिफारिशें मान ली, तो यही माना जाएगा कि आम आदमी पार्टी भी सत्ता और सुविधाओं की भूखी है। दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति ने दिल्ली के विधायकों के वेतन एवं भत्तों में भारी वृद्धि की सिफारिश की है। और वृद्धि भी कम नहीं, बल्कि चार गुना से ज्यादा सुझाई गई है। विधायकों को इस समय दस हजार रु का मासिक बेसिक वेतन मिलता है। समिति ने इसे बढाकर पचास हजार रु कर दिया है। हलका भत्ता 18,000 से बढाकर 50,000 रु और वाहन भत्ता 6,000 से बढाकर 30,000 रु मासिक सुझाया गया है। अभी दिल्ली के विधायकों को वेतन-भत्ते मिलाकर 88,000 रु मिला करते हैं। समिति की सिफारिश के बाद यह बढकर 2.10 लाख रु हो जाएंगे। और भी कई भत्ते बढाए गए हैं। वाहन खरीदने के लिए अब 12 लाख रु तक का ऋण मिलेगा। पहले अधिकतम चार लाख रु मिला करते थे। 70 सदस्यीय दिल्ली विधानसभा में 67 सदस्य आम आदमी पार्टी के हैं। यानी आप के सदस्यों की मौंजा ही मौंजा हो जायेगी । वैसे पूर्व विधायकों की पेंशन भी दोगुना बढा दी गई है। इसके अलावा पहले कार्यकाल के बाद हर साल पर एक हजार की पेंशन वृद्धि दी गई है। यानी चार बार विधायक रहने पर मासिक तीस हजार की पेंशन मिला करेगी। सितंबर 2011 में शीला दीक्षित सरकार ने विधायकों के वेतन-भत्तों में सौ फीसदी वृद्धि की थी। अब मूल वेतन में चार सौ फीसदी वृद्धि से चार साल में पांच सौ फीसदी से ज्यादा का इजाफा अत्याधिक माना जा रहा है। आम आदमी पार्टी विधान सभा चुनाव से पहले सादगी और आम आदमी की तरह गुजर-बसर करने का दावा करती रही है। मगर सत्ता में आते ही केजरीवाल सरकार को भी औरों की तरह सुविधाओं और शान -ए-शौकत की हवा लग गई है। विपक्ष के इन आरोपों में काफी वजन है कि केजरीवाल सरकार की कथनी और करनी में भारी अंतर है। इस साल फरवरी में विधान सभा में प्रचंड बहुमत मिलने के बाद से आम आदमी पार्टी सिवा बिखरने के कुछ भी ठोस नहीं कर पाई है। राष्ट्रीय स्तर पर आप बहुत पहले टूट चुकी है। ”इंडिया अंगेस्ट करप्शन “ के जमाने से केजरीवाल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले नामचीन वकील प्रशांत भूषण को दिल्ली चुनाव के तुरंत बाद केजरीवाल ने योगेन्द्र यादव के साथ पार्टी से बाहर कर दिया। महाराष्ट्र यूनिट को भंग कर दिया गया है और पंजाब में पार्टी पूरी तरह से बिखर चुकी है। पार्टी के चार सांसदों मेंसे दो को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को पंजाब में ही एकमात्र सफलता मिली थी और इस राज्य से चार सांसद चुने गए थे। पंजाब में भारी जनसमर्थन मिलने के बावजूद बगावत ने पार्टी को तहस-नहस कर दिया है। हिमाचल प्रदेश में पार्टी की लुटिया बनने से पहले ही डूब चुकी थी। केजरीवाल के गृह राज्य हरियाणा में भी पार्टी का नाममात्र का अस्तित्व रह गया है। सबसे अहम बात यह है कि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी ने जो विश्वास व्यक्त किया था, वह काफी हद तक काफूर हो चुका है। केजरीवाल और उनकी पार्टी को जनमानस ने औरों से अलग माना था। समकालीन विश्वासघाती , घाघ और काइंया नेताओं की जमात में केजरीवाल की कार्यशैली में आम आदमी को उम्मीद की किरण नजर आई थी। वे औरो से अलग लग रहे थे पर विधानसभा चुनाव के बाद उनकी कार्यशैली में एकदम बदलाव आ गया है। केजरीवाल भी वही परंपरागत नेताओं की जमात में शामिल हो गए हैं। 1977 की तरह एक बार फिर आंदोलन से उपजे नेताओं ने जनता को निराश किया है।
दिल्ली में विधायकों के वेतन और भत्ते लगभग चार गुना बढाने के प्रस्ताव ने आम आदमी पार्टी की कलई खोल दी है। वित्तीय संसाधनों के संकट से जूझ रही दिल्ली विधानसभा की इस दरियादिली पर तीखी प्रतिक्रियाएं आना स्वभाविक है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने प्रस्तावित वृद्धि का मुखर विरोध किया है। और अगर दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने विधायकों की वेतन-भत्ते वृद्धि संबंधी सिफारिशें मान ली, तो यही माना जाएगा कि आम आदमी पार्टी भी सत्ता और सुविधाओं की भूखी है। दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति ने दिल्ली के विधायकों के वेतन एवं भत्तों में भारी वृद्धि की सिफारिश की है। और वृद्धि भी कम नहीं, बल्कि चार गुना से ज्यादा सुझाई गई है। विधायकों को इस समय दस हजार रु का मासिक बेसिक वेतन मिलता है। समिति ने इसे बढाकर पचास हजार रु कर दिया है। हलका भत्ता 18,000 से बढाकर 50,000 रु और वाहन भत्ता 6,000 से बढाकर 30,000 रु मासिक सुझाया गया है। अभी दिल्ली के विधायकों को वेतन-भत्ते मिलाकर 88,000 रु मिला करते हैं। समिति की सिफारिश के बाद यह बढकर 2.10 लाख रु हो जाएंगे। और भी कई भत्ते बढाए गए हैं। वाहन खरीदने के लिए अब 12 लाख रु तक का ऋण मिलेगा। पहले अधिकतम चार लाख रु मिला करते थे। 70 सदस्यीय दिल्ली विधानसभा में 67 सदस्य आम आदमी पार्टी के हैं। यानी आप के सदस्यों की मौंजा ही मौंजा हो जायेगी । वैसे पूर्व विधायकों की पेंशन भी दोगुना बढा दी गई है। इसके अलावा पहले कार्यकाल के बाद हर साल पर एक हजार की पेंशन वृद्धि दी गई है। यानी चार बार विधायक रहने पर मासिक तीस हजार की पेंशन मिला करेगी। सितंबर 2011 में शीला दीक्षित सरकार ने विधायकों के वेतन-भत्तों में सौ फीसदी वृद्धि की थी। अब मूल वेतन में चार सौ फीसदी वृद्धि से चार साल में पांच सौ फीसदी से ज्यादा का इजाफा अत्याधिक माना जा रहा है। आम आदमी पार्टी विधान सभा चुनाव से पहले सादगी और आम आदमी की तरह गुजर-बसर करने का दावा करती रही है। मगर सत्ता में आते ही केजरीवाल सरकार को भी औरों की तरह सुविधाओं और शान -ए-शौकत की हवा लग गई है। विपक्ष के इन आरोपों में काफी वजन है कि केजरीवाल सरकार की कथनी और करनी में भारी अंतर है। इस साल फरवरी में विधान सभा में प्रचंड बहुमत मिलने के बाद से आम आदमी पार्टी सिवा बिखरने के कुछ भी ठोस नहीं कर पाई है। राष्ट्रीय स्तर पर आप बहुत पहले टूट चुकी है। ”इंडिया अंगेस्ट करप्शन “ के जमाने से केजरीवाल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले नामचीन वकील प्रशांत भूषण को दिल्ली चुनाव के तुरंत बाद केजरीवाल ने योगेन्द्र यादव के साथ पार्टी से बाहर कर दिया। महाराष्ट्र यूनिट को भंग कर दिया गया है और पंजाब में पार्टी पूरी तरह से बिखर चुकी है। पार्टी के चार सांसदों मेंसे दो को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को पंजाब में ही एकमात्र सफलता मिली थी और इस राज्य से चार सांसद चुने गए थे। पंजाब में भारी जनसमर्थन मिलने के बावजूद बगावत ने पार्टी को तहस-नहस कर दिया है। हिमाचल प्रदेश में पार्टी की लुटिया बनने से पहले ही डूब चुकी थी। केजरीवाल के गृह राज्य हरियाणा में भी पार्टी का नाममात्र का अस्तित्व रह गया है। सबसे अहम बात यह है कि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी ने जो विश्वास व्यक्त किया था, वह काफी हद तक काफूर हो चुका है। केजरीवाल और उनकी पार्टी को जनमानस ने औरों से अलग माना था। समकालीन विश्वासघाती , घाघ और काइंया नेताओं की जमात में केजरीवाल की कार्यशैली में आम आदमी को उम्मीद की किरण नजर आई थी। वे औरो से अलग लग रहे थे पर विधानसभा चुनाव के बाद उनकी कार्यशैली में एकदम बदलाव आ गया है। केजरीवाल भी वही परंपरागत नेताओं की जमात में शामिल हो गए हैं। 1977 की तरह एक बार फिर आंदोलन से उपजे नेताओं ने जनता को निराश किया है।






