बुधवार, 21 मार्च 2018

उम्मीदें दफन, लौटे कफन

इराक में अगवा किए गए 39 भारतीयों को इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) के आतंकियों ने बहुत पहले  ही  मार दिया था। चार साल से सरकार इस बात से अनभिज्ञ थी।   लोकसभा में अततः मंगलवार को विदेश  मंत्री सुषमा स्वराज ने यह  शोकभरी सूचना दी। जून 2014 में इराक के मोसुल  से 40 भारतीयों को  आईएसआईएस ने अगवा कर लिया था। अगवा किए गए भारतीयों मेंसे 27 पंजाब, 4 हिमाचल प्रदेश , 6 बिहार और 2 पश्चिम  बंगाल के थे । इनमेंसे एक हरजीत मसीह आतंकियों के चगुंल से बच निकला था। भारत लौटने पर हरजीत ने भी बताया था कि उसने 39 भारतीयों को मरते देखा था। सरकार ने हरजीत के इस दावे को सही नहीं माना। इससे  परिजनों में अगवा किए गए 39 युवकों के सुरक्षित लौटने की झूठी उम्मीदें जगी रहीं।  हरजीत मसीह ने मंगलवार को फिर मीडिया से कहा है कि उसने 39 लोगों के जिंदा देखे जाने की सूचना कभी नहीं दी। इसके विपरीत वह शुरु से यही कह रहा है कि सभी 39 भारतीयों को उसके सामने ही मार दिया गया था। मंगलवार को परिजनों की रही-सही उम्मीदें भी जाती रही है। चार साल से अपनों को जिंदा देखने के सपने संजोए परिजनों पर इस जानकारी से कितनी पीडा हुआ है, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। दिसंबर, 2017 में लापता भारतीयों और उनके परिजनों के डीएनए टेस्ट हुए थे। मार्च, 2018 में  डीनए मैच होने के बाद  39 भारतीयों के मारे जाने की  पुष्टि  हुई । जून, 2017 में मोसुल के  आईएसआईएस के कब्जे से मुक्त कराए जाने के बाद, जुलाई में विदेश  राज्य मंत्री जनरल (सेवा निवृत) वीके सिंह इन लापता भारतीयों की तलाश  में इराक के इरबिल  गए थे। तब सरकार की ओर से कहा गया था कि लापता भारतीय संभवतय मोसुल के निकट बदूुश  जेल में बंद हैं। इस जानकारी के बाद भारतीय मीडिया ने बंदूश  जाकर इस बात का खुलासा किया था कि जेल चूंकि बमबारी से पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी थी, इस स्थिति में लापता भारतीयों के जिंदा मिलने की कोई उम्मीद नहीं है। इसके बाद लापता भारतीयों के परिजनों के डीएनए सैंपल लेकर लाशों  से मैच करवाए  गए । लाशों  के ढेर से डीएनए का मैच करवाना आसान नहीं था।  विदेश  राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह और उनकी टीम को एक पहाड के बारे में बताया गया। इस पहाड में लाशों  को दफनाया गया था। पूरा पहाड खुदवाया गया और तब शवों   का पता चला। कुछ शवों में लंबे बाल और कडे मिले और आईडी कार्डस भी मिले।  इन 39 भारतीयों की हत्या पर एक ओर जहां पूरा दे षोकाकुल है, वहीं इस पर जमकर सियासत हो रही है। कांग्रेस ने इस सूचना पर संसद में खूब हंगामा किया और मोदी सरकार पर चार साल तक देष को गुमराह करने का आरोप लगाया है। कांग्रेस हरजीत मसीह के बयान को ढाल बनाकर मोदी सरकार को आडे हाथ ले रही है। बहरहाल, 39 भारतीयों की बेरहम हत्या पर सियासत करने की बजाए इस जमीनी हकीकत पर गहन मंथन की जरुरत है कि रोजी-रोटी तलाष में विदेषों में मारे-मारे फिरते भारतीयों के लिए कैसे इस तरह के हादसों से सुरक्षित रखा जाए। मध्य-पूर्व के कई देषों, खासकर कतर, सऊदी अरबिया, ओमान, कुवैत में भारतीय कामगार काफी असुरक्षित हैं। 2012 से 2017 के बीच अकेले कतर में 1787 भारतीय कामगार बेमौत मारे जा चुके हैं।  अमेरिका और यूरोप की तुलना में भारतीय कामगार मध्य-पूर्व मुल्कों में 90 फीसदी ज्यादा असुरक्षित हैं। सभी राजनीतिक दलों को मिल-बैठकर इन सब बातों का समाधान निकालना चाहिए। जनता की भलाई लोकतंत्र में जनता के नुमाइंदों का प्रमुख दायित्व होता है। हर छोटी-बडी घटना पर राजनीतिक रोटियां सेंकने से जनता का कोई भला नहीं होने जा रहा है।