चुनाव की बेला पर लोक-लुभावने फैसलों से मतदाताओं को पटाना सियासी दलों की पुरानी फितरत है। सत्ता पाने के लिए सियासी दल “आसमान से तारे तोडने“ तक के वायदे करने से भी नहीं चूकते हैं। और भारत की भोली-भाली जनता उनके झांसे में आ जाती है। कर्नाटक में कांग्रेस सरकार का लिंगायत-वीरशैव लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने का प्रस्ताव इस समुदाय के मतदाताओं को लुभाने के लिए विशुद्ध राजनीतिक फैसला है। पांच साल तक सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस सरकार को लिंगायत समुदाय की सुध लेने की फुर्सत नहीं मिली मगर विधानसभा चुनाव समीप आते ही उसका “लिंगायत“ प्रेम जागा उठा। जाहिर है कांग्रेस सरकार यह सब भाजपा के मुख्यमंत्री उम्मीदवार और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा की लिंगायत समुदाय में ठोस पैठ में सेंध लगाने के लिए कर रही है। येदियुरप्पा खुद लिंगायत समुदाय से हैं और इस समुदाय के कद्दावर नेता माने जाते हैं। लिंगायत अर्से से अल्पसंख्यंक धर्मिक समुदाय की मांग करते रहे हैं। इसी मांग के चलते गत सोमवार को कर्नाटक में सत्तारूढ कांग्रेस सरकार ने लिंगायत-वीरशैव लिंगायत को धार्मिक अल्पसंख्यक (रिलीजियस माइनॉरॉटी) का दर्जा देने का कदम उठाया है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का यह “मास्टर स्ट्रोकः बताया जा रहा है। राज्य की कुल आबादी में लगभग 17 फीसदी आबादी लिंगायत की है। सौ विधानसभा हलकों में लिंगायत समुदाय की निर्णायक भूमिका रहती है। लिंगायत समुदाय को परंपरागत भाजपा समर्थक माना जाता है। इस समुदाय को अभी अन्य पिछडा वर्ग में शामिल किया गया है। 2008 में भाजपा को दक्षिण भारत में पहली बार सत्ता में लाने और 2013 में सत्ताच्युत करने में लिंगायत समुदाय की अहम भूमिका रही है। 2008 में बीएस येदियुरप्पा भाजपा में थे और 2013 में भाजपा छोडकर उहोंने अलग से अपनी पार्टी बनाकर विधानसभा चुनाव लडा था। भाजपा को इसी का खामियाजा भुगतना पडा था। कुछ लोगों को इस बात पर भी हैरानी है कि कांग्रेस सरकार ने वीरशैव को लिंगायत समुदाय से जोडकर एक नया कार्ड खेला है और यह उलटा भी पड सकता है। कांग्रेस सरकार ने विधान सभा चुनाव से ठीक पहले लिंगायत-वीरशैव लिंगायत को धर्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने की सिफारिश करके केन्द्र में सत्तारुढ भाजपा नीत राजग सरकार को दुविधा में डाल दिया है। अंतिम फैसला केन्द्र सरकार को ही करना है। इस मामले में राज्य सरकार सिर्फ केन्द्र से सिफारिश कर सकती है। मोदी सरकार के लिए विधानसभा चुनाव की बेला पर इस फैसले को अस्वीकार करना अथवा मान लेना दोनों ही चुनौतीपूर्ण है। कर्नाटक में भाजपा कांग्रेस सरकार के इस फैसले से पहल ही लाल-पीली हो रखी है। भाजपा का आरोप है कि कंाग्रेस की “डिवाइड एंड रुल“ की नीति ने पहले ही देश का बंटाधार कर रखा है और अब लोगों को धार्मिक तौर पर बांटने का प्रयास कर रही है। कांग्रेस पर लिंगायत को हिंदू धर्म से अलग करने का भी आरोप लगाया जा रहा है। वैैसे 2013 में ऑल इंडिया लिंगायत-वीरशैव महासभा ने इस समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक दर्जे के लिए संप्रग सरकार को जो ज्ञापन दिया था, उस पर बीएस येदियुरप्पा के भी हस्ताक्षर थे। अब भाजपा कह रही है कि उस समय येदियुरप्पा भाजपा में नहीं थे। कर्नाटक मे लिंगायत और वोक्कालिगा के बीच बराबर सत्ता संघर्ष रहा है। वोक्कालिगा की आबादी भी 16 फीसदी के आसपास बताई जाती है। पूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल(एस) के नेता एचडी देेवगौडा इसी समुदाय से हैं। अगर दोनों समुदाय एक हो जाएं तो कर्नाटक की राजनीति में बहुत बडा बदलाव आ सकता है। मगर इन दोनों का आपसी टकराव राज्य के विकास में बाधा डालता रहा है। कर्नाटक के तीव्र विकास के लिए न केवल इन दोनों समुदाय में एकता की दरकार है, अलबता राजनीतिक दलों को भी विकास के एजेंडे पर चुनाव लडने की जरुरत है। अब जनता को खुद ही फैसला करना होगा।
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