शुक्रवार, 30 मार्च 2018

Supreme Court Landmark Judgement

देर से मिला न्याय, न मिलने जैसा होता है (जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड) और अगर यह  न्यायपालिका की तकनीकी  प्रकिया में उलझ कर रह जाए, तो और भी कष्टदायक  जाता है। हर छोटे-बडे मामले में अदालत से “स्टे“ लेकर न्याय में विलंब डालना अब तक मुकदमे  का अहम हिस्सा रहा है। भारत की अदालतों में सालों मामले लटकते रहते हैं, इसलिए अक्सर अंतिम फैसला आने तक अभियुक्त त्वरित न्याय से महरुम रह जाता है। मगर अब ऐसा नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट  ने बुधवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए अदालती “स्टे“ की अधिकतम सीमा छह माह तय कर दी है। यानी किसी भी मुकदमे में अदालती “स्टे“ छह माह पूरा होते ही निरस्त हो जाएगा। बुधवार से ही सुप्रीम कोर्ट  की यह व्यवस्था लागू हो गई है और सभी पुराने मामलों पर लागू मानी जाएगी। शीर्ष  अदालत ने यह व्यवस्था भी दी है कि अगर जज को लगता है कि किसी मामले में “स्टे“ छह माह के बाद भी याय के लिए जरुरी  है, तो इसके लिए लिखित में कारण बताने होंगे। छह माह पूरा होते ही स्टे स्वतः निरस्त हो जाएगा और मामले की सुनवाई फिर से  शुरू  हो जाएगी। 2016 में विधि मंत्रालय द्वारा कराए गए एक अध्ययन का  निष्कर्ष  था कि अदालती स्टे के कारण सुनवाई में औसतन 6.5 साल का विलंब हो जाता है।  सुप्रीम कोर्ट  के इस फैसले से “स्टे“ के कारण अदालतो में सालों से लंबित पडे लाखों मामलों की सुनवाई में तेजी आ सकती है। सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने लैंडमार्क फैसला लगभग दो दशक पहले  दिल्ली में सडक निर्माण घोटाले पर सुनाया है। इस मामले में निचली अदालत ने आरोपियों को भ्रष्ट  तौर-तरीकों में  दोषी  पाए जाने पर सजा सुनाई थी मगर आरोपी हाई कोर्ट चले गए और अदालत ने सजा को स्थगित कर दिया। फिर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया और इस तरह अदालत में भ्रश्टाचार के दोशी पाए जाने के बावजूद आरोपी दो दशक से भी ज्यादा समय तक सजा से बचते रहे।  अदालत ने माना कि इस तरह के कानूनी दाव-पेंच लडाकर न्याय में विलंब को रोकने के लिए अविलंब कारगर उपाय की जरुरत है। 2015-16 में भारतीय न्यायपालिका की वार्षिक  रिपोर्ट  में बताया गया था कि देश  की विभिन्न अदालतों में लगभग 3 करोड मामले सुनवाई के लिए लंबित पडे थे। निचली अदालतों मे 25 फीसदी मामले पांच साल से ज्यादा समय से लंबित पडे थे और इनमे 16 फीसदी आपराधिक मामले थे। ्हालांकि इसके लिए अदालतों में जजों की भारी कमी को जिम्मेदार ठहराया गया था मगर विधि विशेषज्ञ  भी मानते हैं कि “अदालती स्टे के कारण भी काफी मामले लटक जाते हैं। भारत में न्याय प्रकिया वैसे भी समय खपाऊ और महंगी मानी जाती है। कानून के प्रावधानों की बाहें मरोडकर सजा से बचना भारत में आम बात है। इसी कारण अक्सर अपराधी बच निकलते हैं। आपराधिक मामलों में न्याय की लंबी प्रकिया भी “त्चरित समयबद्ध न्याय “ मे, बाधा डालती है। भारत की जेलों में बंद केदियों में 68 फीसदी अंडरट्रायल होते हैं और सालों उन्हें न्याय नहीं मिलता। 60 फीसदी से ज्यादा अंडरट्रायल निर्दोष पाए जाते हैं और उन्हें खामख्वाह सजा भुगतनी पडती है।  आंकडों के अनुसार देश  में पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए 60 फीसदी अभियुक्त निर्दोष  होते हैं और उनकी गिरफ्तारी अकारण की जाती है। कानून में अंडरट्रायल तब तक निर्दोष  माना जाता है जब तक अदालत द्वारा  सजा नहीं दी जाती। न्याय व्यवस्था त्वरित और नैसर्गिक न्याय पर आधारित है। देर से मिले न्याय की कोई प्रासंगिकता नहीं रह जाती है। भारत में न्याय व्यवस्था मे अभी भी क्रांतिकारी सुधारों की जरुरत है। सुप्रीम कोर्ट  का ताजा फैसला, निसंदेह, क्रांतिकारी व्यवस्था है।