शनिवार, 24 मार्च 2018

राज्यसभा चुनाव और दल-बदल

राजनीति में न तो कोई स्थाई मित्र होता है और न ही  शत्रु। और भारत की समकालीन राजनीति तो चलती ही दल-बदल पर है। राज्यसभा के चुनाव हो या लोकसभा अथवा विधानसभा चुनाव, दल-बदल चरम पर रहता है और हर राजनीतिक पार्टी इसे शह देती है। 2017 में गुजरात में राज्यसभा की एक सीट के लिए जिस तरह से दल-बदल (क्रॉस वोटिंग) को बढावा दिया गया, 2018 के मौजूदा राज्यसभा चुनाव में उसकी पुनरावृति हुई है। 16 राज्यों के 59 राज्यसभा सदस्यों का कार्यकाल अप्रैल-मई में समाप्त हो रहा है, इसलिए इन सीटों के लिए चुनाव कराए जा रहे हैं। अब तक 10 राज्यों से 33 राज्यसभा सदस्य निर्विरोध चुने जा चुके हैं। इनमें 17 भाजपा के, 4 कांग्रेस और बाकी अन्य दलों के हैं। 25 सीटों के लिए मतदान कराया जा रहा है। इनमें उत्तर प्रदेश   की दस सीटें भी शा मिल हैं। इस चुनाव के बाद राज्यसभा में भाजपा सबसे बडी पार्टी बन सकती है। 1980 में अस्तित्व में आने के बाद से भाजपा का यह सर्वश्रेष्ठ  प्रदर्शन   होगा। विधानसभा में मौजूदा स्थिति के अनुसार भाजपा के 8 और समाजवादी पार्टी का एक सदस्य चुना जाना तय था। इसलिए  दसवीं  सीट के लिए एक-एक विधायक का समर्थन पाने के लिए भाजपा और विपक्ष में मारी-मारी हो रही थी। इस सीट पर बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार और भाजपा उम्मीदवार में कांटे की टक्कर थी। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने बसपा उम्मीदवार का समर्थन किया। सपा और बसपा  के एक-एक विधायक ने क्रॉस-वोटिग करके बसपा उम्मीदवार को संकट में डाल दिया था। अब नजरें  निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैयापर थी। दोनों उम्मीदवारों ने राजा भैया का वोट हासिल करने के लिए एडी-चोटी का जोर लगाया। राजा भैया समाजवादी पार्टी नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश  यादव के करीबी माने जाते हैं मगर वे मौके की नजाकत को बखूबी समझते हैं।  राजा भैया का उत्तर प्रदेश  के कुंडा विधानसभा हलके में डंका बजता है और वे अथवा  उनका परिवार 1993 से लगातार इस हलके से चुनाव जीत रहा है। राजा भैया के दादा बजरंग बहादुर सिंह भद्री 1958 से 1963 तक हिमाचल प्रदेश  के उप-राज्यपाल रहे चुके हैं। हिमाचल प्रदेश  तब केन्द्रीय  शासित क्षेत्र हुआ करता था। मतदान से पहले राजा भैया ने पहले अखिलेश  यादव से मुलाकात की और फिर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से। उनकी इस मुलाकात से यही कयास लगाए गए कि उन्होंने बसपा की बजाए भाजपा के पक्ष में वोट डाले। सीट जीतने के लिए भाजपा को 6 और बसपा को चार विधायकों के समर्थन की दरकार थी। भाजपा का वुनाव प्रबंधन बसपा-सपा-कांग्रेस से कहीं ज्यादा कारगर साबित हुआ। इससे पहले 2017 में गुजरात से राज्यसभा चुनाव में भी कांग्रेस को राज्य के कद्दावर नेता अहमद पटेल को जिताने के लिए एडी-चोटी का जोर लगाना पडा था। पार्टी के 44 विधायकों को भाजपा की छीना-झपटी से बचाने के लिए कई दिन तक गुजरात से बाहर बंगलुरु में छिपा कर रखना पडा था। 2016 में हरियाण से राज्यसभा के चुनाव में चुनाव अधिकारी द्वारा कांग्रेस के “स्याही विवाद“ के कारण 12 विधायकों के वोट रदद  किए जाने पर भी भारी बवाल मचा था। उस समय निर्वाचन आयोग ने हरियाणा विधनसभा के सचिव को फटकार भी लगाई थी।  बहरहाल, लोकतंत्र की जडों को खोखला करने वाला राजनीतिक असूचिता का यह खेला कब तक चलता रहेगा? त्रासदी यह है कि राजनीतिक दल विपक्ष में रहते हुए राजनीतिक सूचिता के प्रबल पैरवीकार बन जाते हैं मगर सत्ता में आते ही इसे भूलकर दल-बदल को बढावा देते हैं। भाजपा आज वही कर रही है जो कांग्रेस सत्ता में रहते हुए करती थी। इस तरह के आचरण से राजनीतिक दल लोकतंत्र को कमजोर कर रहे हैं। अब बहुत हो गया। “अर्त्यात्मा की आवाज “ की आड में दल-बदल का यह  खेल कानूनन प्रतिबंधित होना चाहिए।