चलते-चलते पत्थर हो गए पैर, पांव में पडे छाले नासूर बन गए; हाय री किस्मत, किसी को हम नजर नहीं आए“, किसान की यह दुर्दशा हुक्मरानों को व्यथित नहीं करती है। और न ही बडे शहरों में बसे लोगों को । महाराष्ट्र के किसानों का आंदोलन इसकी ताजा मिसाल है । मुंबई में वातानुकूलित कमरों में “थोथी“ योजनाएं बना रहे शासकों को जगाने के लिए लगातार पांच दिन तक 180 किलोमीटर की पैदल यात्रा मेनस्ट्रीम मीडिया तक को भी नजर नहीं आई और न ही किसानों के फफोले नजर नहीं आए। मगर आंदोलनकारी किसानों की दरियादिली देखिए कि परीक्षारत छात्रों को कोई असुविधा न हो, इसलिए वे रात भर पैदल यात्रा कर मुबई पहुंचे। किसान का दिल जितना बडा है, उससे भी बडा देश का अन्न भंडार भरने में उसका योगदान है। भारत कृषि प्रधान देश है और किसान अन्न दाता है, स्कूलों में आज भी यह पाठ पढाया जाता है। और यही अन्नदाता और कृषि प्रधान देश का नायक आजादी के सात दशक भी उसी तरह बेहाल है, जिस तरह वह फिरंगी शासन के जमाने में हुआ करता था। शहरों में आज भी किसानों की छवि “गंवार“ और बैक्वर्ड वाली ही है। मिट्टी-गोबर से सने हाथ और पसीने की “बू“, शहरियों को तो छोडिए, उनके नुमाइंदों को भी रास नहीं आती है। समकालीन “निहित स्वार्थी राजनीति“ में किसानों की समस्याओं को भी “वोट“ भुनाने का जरिया बना लिया गया है और इसी नजरिए से उनकी समस्याओं का समाधान निकाला जाता है। विपक्षी पार्टियां किसानों के लिए आसमान से तारे तोडने का झांसा देते-देते नहीं अघाती हैं मगर पॉवर में आते ही “ वित्तीय संसाधनों“ की कमी का रोना रोती है। मंत्रियों, सांसदों, विधायकों के वेतन-भत्ते, पेंशन बढाने और शाही सुविधाएं जुटाने के लिए कभी भी संसाधनों की कमी आडे नहीं आती है मगर किसान, मजदूर और शोषित तबकों के लिए सामाजिक सुरक्षा देने में भी कंजूसी दिखाई जाती है। किसानों की बदहाली का आलम यह है कि 1997 से अब तक दो लाख से ज्यादा किसान आत्मह्त्या कर चुके हैं। महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में सबसे ज्यादा हर साल 4000 से ज्यादा किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं और यह सिला उतरोत्तर बढता जा रहा है। छत्तीसगढ जैसे राज्य में 2000 तक किसान आत्मह्त्या का एक भी मामला नहीं था, मगर 2007 में एक साल में ही 1500 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्याएं की थी। कृषि उत्पादों की बढती लागत और इसकी तुलना में गिरते दाम किसानों को साल-दर-साल कर्जदार बना रहे हैं। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के तहत मुक्त व्यापार के लिए भारत की मंडियां खुलने से सबसे ज्यादा नुकसान किसानों को उठाना पडा है। विश्व व्यापार संगठन के कृषि उत्पाद संबंधी नियम असल में मात्र डंपिंग को बढावा देते हैं। समृद्ध देश अपने यहां एग्री -बिजनेस को और ज्यादा सबसिडी दे रहे हैं मगर विकसित देशों को ऐसा करने से रोक रहे हैं। अमेरिका में कपास उत्पादको को हर साल चार अरब डॉलर की सब्सिडी दी जाती है। अंतरराष्ट्रीय दाम कम रहने से अमेरिका का कॉटन मार्केट पर एकाधिकार स्थापित हो चुका है और बुर्किना फासो और माली जैसे गरीब मुल्को को भारी नुकसान उठाना पड रहा है। डब्ल्यूटीओ के अस्तित्व में आने के बाद से कृषि उत्पाद के दाम निरंतर गिर रहे हैं। पास्ता में प्रयोग होने वाले कनाडा की डुरुम गेंहू के दाम पिछले साल 45 फीसदी की गिरावट के साथ छह साल के न्यूनतम स्तर पर थे। कॉर्न और सोयाबीन के दाम इस समय दस साल के निम्नतम स्तर पर पहुंच चुके हैं। भारत में हालांकि रबी और खरीफ फसलों के लिए न्यूनतम खरीद मूल्य तय किया जाता है मगर इसे लागत से नहीं जोडा जाता है। इस साल के बजट में केन्द्र सरकार ने किसानों को उनकी फसल का लागत से डेढ गुना ज्यादा कीमत देने का वायदा किया है। किसानों को कृषि उत्पादों का लाभदायक मूल्य ही उनकी समस्याओं का स्थाई समाधान हो सकता है।
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