गुरुवार, 1 मार्च 2018

यहां हार तो, वहां जीत!

मध्य प्रदेश  विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले 15 साल से लगातार राज्य में सतारूढ भारतीय जनता पार्टी को बडा झटका लगा है पर त्रिपुरा और मेघालय में भगवा पार्टी की जीत के पूर्वानुमान पार्टी को कुछ राहत प्रदान कर रहा है। मध्य प्रदेश  में 24 फ्ररवरी को हुए विधानसभा उपचुनाव में भाजपा जी-जान की कोशिशों  के बावजूद मुंगावली और कोलारस सीट कांग्रेस से छीन नहीं पाई है। 2013 के विधानसभा चुनाव में दोनों सीटें कांग्रेस ने जीती थीं। मुंगावली विधानसभा हलके का अपना अनूठा रिकार्ड है। 1985 से 2013 तक कोई भी पार्टी यहां दोबारा चुनाव नहीं जीत पाई। सात बार चुनाव हुए और चार मर्तबा कांग्रेस, तीन बार भाजपा जीती। पहली बार कांग्रेस ने यह सीट दूसरी बार जीती है। कोलारस कांग्रेस की परंपरागत सीट मानी जाती है। 15 साल में भाजपा कांग्रेस को इस हलके से बेदखल नहीं कर पाई है। इस उप चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों की प्रतिष्ठा  दांव पर लगी हुई थी। दोनों विधानसभाई हलके गुना लोकसभाई हलके का हिस्सा है और कांग्रेस के संभावित  मुख्यमंत्री चेहरा ज्योतिरादित्य सिंधिया इस हलके के सांसद हैं। कांग्रेस के दोनों प्रत्याशी   ज्योतिरादित्य के करीबी हैं। नामांकन पर्चा भरने से लेकर चुनाव प्रचार के अंतिम दिन तक  ज्योतिरादित्य बराबर मौजूद रहे। उन्होंने दोनों हलकों में 75 जनसभाओं और 15   रैलियों को संबोधित किया है। भाजपा ने  भी उपचुनाव में पूरी ताकत झोंक दी थी।  ज्योतिरादित्य के मुकाबले भाजपा ने उनकी  बुआ यशोधरा राजे सिंधिया को चुनाव प्रचार में उतारा था। मुख्यमंत्री  शिवराज चौहान ने 45 जनसभाएं कीं। पिछले साल चित्रकूट विधानसभा उपचुनाव में भी कांग्रेस ने भाजपा को करारी  शिकस्त दी थी। विधानसभा चुनाव से पहले दोनों सीटों के हार जाने से मुख्यमंत्री  शिवराज चौहान की लीडरषिप को चुनौती मिल सकती है। कांग्रेस की जीत से ज्योतिरादित्य सिंधिया का मुख्यमंत्री पद का दावा और मजबूत हुआ है। मध्य प्रदेश , राजस्थान और छतीसगढ में इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन तीनों राज्यों में भाजपा सत्ता में है। मध्य प्रदेश  के उपचुनाव नतीजे विधानसभा चुनाव से पहले मतदाताओं के रुझान माने जा रहे हैं। ओडीशा   की बीजेपुर विधानसभा सीट पर भाजपा का प्रदर्शन  कांग्रेस से अपेक्षाकृत बेहतर रहा है। यह सीट हालांकि बीजू जनता दल ने भारी मतों के अंतर से जीती हैं मगर भाजपा का दूसरे स्थान पर आना और कांग्रेस प्रत्याशी  की जमानत जब्त हो जाना पार्टी के लिए  शुभ संकेत है। भाजपा के लिए त्रिपुरा  से भी अच्छी खबर है। ताजा चुनाव सर्वेक्षणों के अनुसार भाजपा इस पूर्वोतर राज्य में वामपंथी किले को ढहाने की स्थिति में है। भाजपा ने चुनाव के लिए जनजातीयों की नुमाइंदगी करने वाली क्षेत्रीय पार्टी आईपीएफटी से गठबंधन कर रखा है। राज्य की 20 सीटें जनजातीयों के लिए आरक्षित है। इससे त्रिपुरा की 20 सीटों पर कांटे की टक्कर है। इन मेंसे 9 सीटें भाजपा और 11 सीटें  आईपीएफटी लड रही है।  त्रिपुरा में 70 फीसदी आबादी बंगालियों की है। इसीलिए पश्चिम  बंगाल की तरह इस राज्य में वामपंथी दलों का दबदबा रहा है। मगर राज्य की 28 फीसदी आबादी जनजातीयों की है।  आईपीएफटी जनजातीयों के लिए बंगालियों से अलग राज्य की मांग करती रही है। भाजपा इस मामले में चुप्पी साधे हुए हैं। आईपीएफटी से चुनावी गठबंधन के कारण  20 सीटों पर भाजपा को एडवांटेज मिल सकती है। अगर इनमेंसे 10-12 सीटें भी गठबंधन को मिल जाती है तो चुनाव के बाद सियासी समीकरण बदल सकते हैं।  मगर  आईपीएफटी के साथ गठबंधन के कारण बंगाली आबादी बहुल हलकों में मतदाता पार्टी  से छिटक सकते हैं। इससे वामपंथी दलों को फायदा हो सकता है। बहरहाल, पूर्वोतर भारत में भगवा पार्टी का सत्ता में आना  क्या रंग लाता है, समय ही इसका जवाब दे सकता है।