इतिहास खुद को दोहरा रहा है। उत्तर प्रदेश में गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा हलकों के उप चुनाव गैर-भाजपाई दलों की एकता के चमत्कारी नतीजे यही दर्शाते र्हैं। सपा-बसपा के गठजोड ने उत्तर प्रदेश में भाजपा को चारों खाने चित कर दिया है। बिहार की अररिया लोकसभा सीट भी भाजपा पूरी ताकत लगाने के बावजूद राष्ट्रीय जनता दल से छीन नहीं पाई है। जनता दल (यू) से चुनावी गठजोड भी भाजपा के काम नहीं आया और न ही मुख्यमंत्री नीतिश कुमार का धुआंधार चुनाव प्रचार। जूनियर लालू नीतिश ज्यादा सयाने निकले ।हाल ही में भाजपा को उत्तर प्रदेश , बिहार और राजस्थान में पांच मेंसे चार लोकसभा उपचुनाव में हार का सामना करना पडा है। मध्य प्रदेश में फरवरी में दो सीटों के लिए हुए विधानसभा उपचुनाव भी भाजपा हार गई थी जबकि राज्य में 15 साल से भाजपा की सरकार है। 2019 के लोकसभा उपचुनाव से पहले एक के बाद दूसरी हार भाजपा के लिए शुभ नहीं है। गोरखपुर लोकसभा सीट की पराजय भाजपा को सबसे बडा धक्का है। यह सीट योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने पर खाली हुई थी और योगी 1998 से लगातार इस सीट पर जीत रहे थे। फूलपुर लोकसभा सीट पर 2014 में उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य जीते थे। इस उपचुनाव में भाजपा यह सीट भारी मतों के अंतर से हार गई है। बहुजन समाज पार्टी के समर्थन से दोनों सीटें समाजवादी पार्टी ने जीती है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी माना है कि सपा-बसपा के गठबंधन के कारण भाजपा हारी है। भाजपा के नेता भी इस बात को मानते हैं कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी गठजोड भाजपा से भी अधिक ताकतवर गठबंधन है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के 42.63 फीसदी वोट की तुलना में समाजवादी, बसपा और कांग्रेस को 49.83ः फीसदी वोट मिले थे। स्पष्ट है अगर 2014 के लोकसभा चुनाव मे तीनों का चुनावी गठबंधन होता, तो चुनाव परिणाम कुछ और ही होते। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत गिरकर 39.6 रह गया था जबकि बसपा, सपा और कांग्रेस को 50.3 फीसदी (बसपा 22.23, सपा को 21.82 और कांग्रेस को 6.25 फीसदी) वोट मिले थे। इससे पता चलता है कि अगर विधनसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ-साथ सपा का बसपा से भी गठबंधन होता, भाजपा को प्रचंड बहुमत मिलना लगभग असंभव होता। चुनावी इतिहास इस बात का गवाह है कि एकजुट विपक्ष सतारूढ दल को चुनावी पटखनी देने में पूृरी तरह से सक्षम है। एक जमाने में कांग्रेस को हराने के लिए भाजपा समेत विपक्षी दल साझा मोर्चा खडा करने के लिए दिन रात हाथ-पांव मारा करते थे। उस समय चुनावी गणित साझा विपक्ष के पक्ष में होते हुए भी कांग्रेस मत विभाजन का फायदा उठा कर सत्ता पर काबिज हो जाती थी। गैर-कांग्रेस दलों के पास कांग्रेस से ज्यादा वोट होने के बावजूद कांग्रेस को बहुमत मिल जाता। 1977 में गैर कांग्रेसी दलों ने साझा मोर्चा बनाया और कांग्रेस का उत्तर भारत में सुपडा साफ हो गया। 1989 में फिर साझा विपक्ष ने कांग्रेस को सता से बेदखल कर दिया और दूसरी बार केन्द्र में भाजपा के समर्थन से गैर-कांग्रेस सरकार बनी। 70 और 80 के दशक में भाजपा समेत तत्कालीन विपक्षी दलों को जिस स्थिति का सामना करना पडता था, ठीक उसी तरह की स्थिति का सामना अब कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को करना पड रहा है।, गैर-भाजपाई दलों में चुनावी गठबंधन आसान नहीं है। राजनीतिक दलों और उनके नेताओं की महत्वाकांक्षाएं हर बाार एकता में बाधा डालती रही है। उत्तर प्रदेश उपचुनाव के नतीजे आने के बाद बसपा प्रमुख सुश्री मायावती ने सबसे मुखर प्रहार कांग्रेस पर किया है। बहरहाल, दो दिन पहले संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी के रात्रि भोज में सपा, बसपा, राकांपा समेत 20 विपक्षी दलों की उपस्थिति विपक्षी एकता के लिए शु भ संकेत हैं। इसी साल के अंत में मध्य प्रदेश , राजस्थान , छतीसगढ और मई में कर्नाटक के विधानसभा चुनाव के दौरान विपक्षी एकता का पता चल जाएगा।
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