मंगलवार, 20 मार्च 2018

सीमा पर “ना“पाक हरकतें

जम्मू-कश्मीर  में  सीमा पर पाकिस्तानी सेना द्वारा संघर्ष  विराम (सीज फायर) उल्लंघन का सिलसिला बद्स्तूर जारी रहना कोई नई घटना नहीं है। 1971  और 1999 में मुंह की खाने के बाद से पाकिस्तान की “नापाक“ हरकतें उत्तरोतर बढती ही जा रही हैं। रविवार को पुंछ जिले में पाकिस्तान की ओर से संघर्ष  विराम उल्लंघन में तीन बच्चों समेत पांच लोग मारे गए और दो किशोरियां गंभीर रुप से घायल हो गईं। पाकिस्तान सेना सीमा पर नागरिकों को खास तौर निशाना बना रही हैं। पाकिस्तानी सेना नियंत्रण रेखा से तीन-चार किलोमीटर तक की दूरी पर स्थिति आबादी को भी निशाना बना रही है। पाकिस्तान ने भी भारत पर सीज फायर उल्लघंन का आरोप लगाते हुए कहा है कि पाक अधिकृत कश्मीर  में भारतीय सेना की गोलीबारी से दो किशोरियों समेत नौ लोग घायल हुए हैं। आतंक फैलाकर और सीमा से सटे आबादी वाले इलाकों में निरंतर निर्दोष  लोगों को मार कर पाकिस्तान  जम्मू-कश्मीर  के लोगों को डराने-धमकाने से बाज नहीं आ रहा है और न ही सबक सिखाए बगैर बाज आने वाला है। भारत अब तक पाकिस्तान को उसकी बेजा हरकतों से रोक नहीं पाया है।  इससे पकिस्तान में भारत विरोधी आतंकी संगठनों का हौसला बढ रहा है। भारत-पाकिस्तान सीमा कश्मीर -पंजाब से राजस्थान-गुजरात तक की लगभग 2900 किलोमीटर तक फैली हुई हैं। भारत-पाकिस्तान सीमा को दुनिया की सबसे खतरनाक बॉर्डर माना जाता है। भारत ने इस सीमा पर दिन -रात चौकसी के लिए  लगभग डेढ लाख फल्ड लाइटस लगा रखी है और 50 हजार पोल्स गाड  रखे हैं। गुजरात- सिंध और पंजाब  के साथ लगती सीमा को तो अंतरराष्ट्रीय  मान्यता है। कश्मीर  की सीमा पर 1972 में  शिमला संमझौते के बाद नियंत्रण रेखा (लाइन ऑफ कंट्रोल ) लागू है। पाकिस्तान ने आज तक इस नियंत्रण रेखा का और न ही 2003 के सीज फायर का सम्मान किया है। शिमला समझौते के लगातार उल्लघंन के बाद 2003 में दोनों मुल्कों के बीच संघर्ष   विराम पर सहमति बनी थी मगर यह सहमति भी कबकी मृतप्रायः हो चुकी है। 2017 में पाकिस्तान ने 777 बार संघर्ष  विराम का उल्लघंन किया है। पाकिस्तान का आरोप है कि भारत ने 2017 में 1300 बार संघर्ष   विराम को तोडा है। बहरहाल, विभाजन से आज तक पाकिस्तान और भारत में तीन बार (1965, 1971, 1999) जंग हो चुकी है। बांग्ला दे श  पाकिस्तान से अलग हो चुका है और अलग बलूचिस्तान की मांग साल-दर-साल और ज्यादा मुखर हो रही है। अफगानिस्तान और ईरान के बीच बंटा बलूचिस्तान पाकिस्तान के लिए सामरिक  दृष्टि  से काफी मह्तवपूर्ण है। बलूचिस्तान का अपना ऐतिहासिक महत्व है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि बलूची ही असल में सिंधु घाटी के मूल लोग हैं।  फिरंगी  शासन ने 1944 में बलूचिस्तान को स्वतंत्र मुल्क बनाने पर विचार भी किया था मगर कम आबादी  के कारण बात नहीं बन पाई। बलूची लोग अब पूरी ताकत से पाकिस्तान से अलग होने की मांग कर रहे हैं। इस्लामाबाद को इसमें भारत का हाथ नजर आ रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त को अपने भाषण में बलूचिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर  की आजादी की मांग का उल्लेख भी किया था।  पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर   में भी पाकिस्तानी सेना की दमनकारी नीतियों से लोग-बाग आजिज आ चुके हैं और अलग होने की मांग कर रहे है।  पाकिस्तान इन सब घटनाओं से खासा परेशान है। आंतरिक हालात संभलते नहीं बन पा रहे हैं और न ही अंतरराष्ट्रीय  हालात नियंत्रण में है। आतंकियों को पालने-पोसने के लिए पाकिस्तान अलग-थलग पड चुका है। अवाम को भटकाने और गुमराह करने के लिए पाकिस्तान के पास भारत के खिलाफ आग उगलने और सघंर्ष  विराम का उल्लघंन  करने के सिवा कोई विकल्प नहीं बचा है।