शुक्रवार, 9 मार्च 2018

प्रतिमाएं तोडने से क्या होगा?

त्रिपुरा में भाजपा-नीत दक्षिणपंथी सरकार के सता में आते ही पूरे देश  में “ असहिष्णुता और   बदले" की  राजनीति"  ने सिर उठाना  शुरु कर दिया है। वाम सरकार के अपदस्थ होते ही  त्रिपुरा में रुसी क्रांति के नायक ब्लादिमीर लेनिन की प्रतिमाएं तोड दी गई हैं। इतना ही नहीं भाजपा के एक विधायक ने यहां तक कह दिया है कि त्रिपुरा में लेनिन, स्टालिन और मार्क्स सबको जाना होगा। प्रतिमाएं उखाड दी जाएंगी और इनके नाम वाली सडकें भी नहीं रहेंगी। किताबों में  लेनिन, स्टालिन और मार्क्स के बारे जो भी लिखा गया है, वह सब हटा दिया जाएगा क्योंकि यह सब भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं है। हाल ही तक लेनिनग्रेड माना जाना वाला त्रिपुरा धीरे-धीरे लेनिन मुक्त हो रहा है। दक्षिण त्रिपुरा के बेलोनिया कालेज स्कवायर में रविवार को लेनिन की मूर्ति को बुलडोजर चढाकर ढहा दिया गया। सोमवार को अगरतला से 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सबरूम में लेनिन की मूर्ति तोड दी गई। भाजपा के  वरिष्ठ  नेता हेमंत बिस्वा सरमा ने तो पूर्व मुख्यमंत्री माणिक सरकार को पश्चिम  बंगाल, केरल अथवा पडोसी देश  बांग्ला देश  में शरण लेने की नसीहत तक दे डाली है। इसे उपहासपूर्ण  बयान नहीं माना जा सकता, अलबत्ता यह दक्षिणपंथियों की सोच को उजागर करता है। माणिक सरकार बंगाली है, इसीलिए उन्हें पश्चिम बंगाल अथवा बांग्ला देश  में  शरण लेने की बात कहकर अपमानित किया गया है। चुनावी जीत-हार  लोकतंत्र का अहम हिस्सा होता है लेकिन चुनावोपरांत हिंसा का माहौल लोकतंत्र का मजाक है। एक जमाने में भाजपा वाम दलों को पश्चिम  बंगाल में “हिंसा की राजनीति“ करने के लिए कोसा करती थी। अब भाजपा खुद वही कर रही है।  प्रतिमाएं तोडने का यह सिला मंगलवार को अन्य राज्यों में भी फैल गया। मंगलवार को तमिल नाडु के वेल्लूर जिले में दक्षिणपंथियों ने तमिल नाडु के लोकप्रिय नेता पेरियार की प्रतिमा को नुकसान पहुंचाया। इस घटना से पहले भाजपा के एक नेता ने फेसबुक पर चेताया था कि जिस तरह त्रिपुरा में लेनिन की प्रतिमाएं तोडी गईं है, उसी तरह तमिल नाडु में पेरियार की प्रतिमाएं तोडी जाएंगी। मंगलवार को फेसबुक पर यह पोस्ट आया और रात को पेरियार की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर दिया गया। समाज सुधारक पेरियार जाति प्रथा के घुर विरोधी थे। उन्हें तमिल नाडु में ब्राहृमणवाद के प्रभुत्व को ललकारने और ”आत्म सम्मान आंदोलन“ चलाने के लिए जाना जाता है। कोलकता में कुछ लोगों ने भारतीय जनता पार्टी की पूर्वज जनसंघ के संस्थापक डाक्टर  श्यामा  प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा को तोड डाला। उत्तर प्रदेश  के मेरठ में षरारती तत्व ने मंगलवार रात को संविधान निर्माता डाक्टर भीम राव अंबेडकर की प्रतिमा को नुकसान पंहुचाया। ताजा मामले मैं केरल मैं  महात्मा  गाँधी की प्रतिमा को नुकसान पहुंचाया गया है ।  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री राजनाथ सिंह और भाजपा के  राष्ट्रीय  अध्यक्ष अमित  शाह ने प्रतिमाएं खंडित करने और तोडने की घटनाओं की भर्त्सना करते हुए राज्यों को शरारती तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश  दिए हैं। मगर भाजपा से संबंधित  शासक विजयोन्माद भगवा कार्यकर्ताओं को रोकने की गंभीर कोशिश  करेंगे , इस पर संदेह हो रहा है। गृह मंत्री के निर्देश  के बावजूद त्रिपुरा के राज्यपाल जिस चतुराई से हिंसा को जायज ठहरा रहे हैं, उसके  मद्देनजर  लगता नहीं है, हिंसा रुक पाएगी। “ईंट का जवाब पत्थर से देना“ दक्षिणपंथियों की कार्यशैली का अहम हिस्सा रहा है। इससे पहले भगवा संगठनों ने गोहत्या, गोमांस सेवन, कट्टरवादी राष्ट्रवादी सोच और “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता“ को लेकर असहिष्णुता का माहौल बनाया था। इस सच्चाई से भी मुंह नहीं मोडा जा सकता है कि चुनाव जीतने के लिए हिंसक और नफरत की भाशा का इस्तेमाल करने और हिंसक प्रवृति को उकसाने वाले नेताओं से “प्रेम और सहिष्णुता“ की उम्मीद नहीं की जा सकती। प्रतिमाएं तोडने से विचारधारा को नही तोडा जा सकता और न ही ऐसा करके सामाजिक-आर्थिक उन्नति की जा सकती है। इससे सिर्फ नफरत और बंटवारे की दीवार खडी होती है।