बुधवार, 7 मार्च 2018

दीपक से कमल तक का सफर

भारतीय जनता पार्टी की पूर्वज जनसंघ के जमाने में कांग्रेस का नारा हुआ करता था,“ दीपक में तेल नहीं, सरकार चलाना खेल नहीं़“। तब जनसंघ का चुनाव चिंह दीपक हुआ करता था। जमाना कांग्रेस का था। उत्तर हो या दक्षिण, पूर्व हो या पश्चिम , हर तरफ  में कांग्रेस की ही दुन्दुभि बजती थी। वह जमाना पिछली सदी के अंत में ही लद गया था और इक्कीसवी सदी के दूसरे दशक में कांग्रेस का आलम  यह है कि  ग्रांड ओल्ड पार्टी  मात्र चार राज्यों-कर्नाटक, पंजाब , मिजोरम और पुडुचेरी-  तक सिमट कर रह गई है। और जिस पार्टी पर कांग्रेस तंज कसा करती थी कि सरकार चलाना उसके बूते का खेल नहीं है, वही पार्टी आज केन्द्र और 21 राज्यों में शान से सरकार चला रही है। भाजपा का “दीपक“ (जनसंघ) से कमल (भाजपा) तक का सफर अनुकरणीय है। आजादी के बाद केन्द्र और राज्यों में सता पाने के बाद कांग्रेस ने सिर्फ अवसरों को गंवाया है और पार्टी चुनौतियों भागती रही है। वहीं दूसरी ओर, राष्ट्रीय  स्वंय सेवक द्वारा पोषित भाजपा और उसकी पूर्वज जनसंघ ने कोई अवसर नहीं गंवाया और हर चुनौती का डटकर सामना किया। पुरानी कहावत है  जंग में अपने  दुश्मन  और राजनीति में अपने विरोधी को कभी कम नहीं आंकना चाहिए। मगर कांग्रेस ने यही गलती की। सता के नशे  में पार्टी इस कद्र चूर हो गई कि कांग्रेसी विरोधियों की ताकत का सही-सही आकलन नहीं कर पाए। कांग्रेस अब इसी का खमियाजा भुगत रही है। त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय के विधानसभा चुनाव में  भाजपा के  प्रदर्शन  से विपक्ष हत-प्रत हैं। बंगाल मूल आबादी बहुल वाले त्रिपुरा में  25 साल से सत्ता में काबिज वामफ्ंथी सरकार को बेदखल करके भाजपा ने इतिहास रचा है। 2013 में भाजपा ने 50 सीटों पर चुनाव लडा था। पार्टी को मात्र 1.5 फीसदी वोट मिले थे और उसके 49 उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई थी।  पांच साल बाद 2018 में भाजपा ने 43 फीसदी वोट हासिल करके 35 सीटें जीती हैं। भाजपा की गठबंधन सहयोगी पार्टी आईपीएफटी को 8 सीटें मिली हैं। पहली बार भाजपा ने वाम दलों को चुनाव में परास्त किया है। भाजपा की ताजा जीत इसलिए भी काबिलेगौर है कि भगवा पार्टी को अब तक हिंदी भाशी क्षेत्र (कॉउ बेल्ट) की पार्टी माना जाता था मगर त्रिपुरा और नगालैंड में भाजपा के षानदार प्रदर्षन ने इस भ्रम को भी तोड दिया है। नगालैंड मूलतः ईसाई आबादी बहुल वाला राज्य है और इस राज्य में अब तक कांग्रेस अथवा क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व रहा है मगर यहां भी भाजपा नीत सरकार का बनना तय है। देष के राजनीतिक इतिहास में लगभग पांच दषक बाद पूर्वोतर के सात में चार राज्यों में भाजपा नीत सरकार है।  भाजपा का 25 साल पहले का“ आज 4 प्रदेष, कल सारा देष“ का सपना साकार होता नजर आ रहा है। त्रिपुरा में भाजपा की प्रचंड जीत पार्टी को पष्चिम बंगाल में अपने पांव जमाने में सहायक हो सकती है। इस राज्य में भी वामपंथी ममता बनर्जी की लोकप्रियता को चुनौती देने में अब तक नाकाम साबित हुए हैं और इस राज्य में भी भाजपा तेजी से अपने पांव पसार रही है। भाजपा का इस बात से उत्साहित होना स्वभाविक है कि अगर त्रिपुरा में पार्टी 5 साल में 1.5 फीसदी से 43 फीसदी वोट हासिल करने में सफल हो सकती है, तो पष्चिम बंगाल में क्यों नहीं? पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को पष्चिम बंगाल में 16 फीसदी वोट मिले थे मगर हाल ही में सपन्न उलुबेरिया लोकसभाई और नोपारा विधान सभा उप-चुनाव में भाजपा ने षानदार प्रदर्षन किया है और पार्टी उम्मीदवार वाम दलों को पीछे छोडते हुए दूसरे नंबर पर रहे है। कांग्रेस समेत विरोधी दलों की मौजूदा दुर्दषा से लगता नहीं है कि कोई भी दल भाजपा के विजय रथ को रोकने की स्थिति में है। बहरहाल,  पूर्वोतर  भारत का भगवाकरण के बाद अब दक्षिण भारत की बारी है।