शनिवार, 10 मार्च 2018

यूथेनेशिया-इच्छा मृत्यु

सुप्रीम कोर्ट  ने अतंतः  इच्छा मृत्यु की अनुमति दे दी है। शुक्रवार को शीर्ष   अदालत की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने “लिंविग विल“ यानी इच्छा मृत्यु की इजाजत देते हुए व्यवस्था दी कि हर इंसान को गरिमापूर्ण  मृत्यु का अधिकार है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट  ने 42 साल से कोमा में रही अरुणा शानबाग को इच्छा मृत्यु की अनुमति नहीं दी थी। अरुणा मुंबई के केईएम अस्पताल में बलात्कार का शिकार होने के बाद कोमा में चली गई थी। अदालत ने “पैसिव यूथेनेशिया“ की अनुमति देते हुए इसके लिए दिशा -निर्देश  भी जारी किए हैं। रोगी जब गंभीर बीमारी से पीडित होने पर मौत जैसी स्थिति से गुजरता है, तब इच्छा मृत्यु मांगता है।   यूथेनेशिया में दो तरह की स्थितियां होती है-एक्टिव और पैसिव। दोनों में काफी अंतर है। एक्टिव यूथेनेशिया में रोगी की मृत्यु के लिए डाक्टरों की मदद ली जाती है।  पैसिव यूथेनेशिया में रोगी की जान बचाने अथवा उसे जिंदा रखने के लिए कुछ नहीं किया जाता। “लिंविग विल“ अथवा इच्छा मृत्यु पर कानून बनाए जाने तक सुप्रीम कोर्ट के दिशा  निर्देश  जारी रहेंगे। देश  में अभी तक इच्छा म्रत्यु पर कोई कानून नहीं है। अमेरिका और रुस जैसे  विकसित देशों  में भी इच्छा मृत्यु की इजाजत नहीं है और इस तरह की मौत को अपराध की श्रेणी (आत्म हत्या) में रखा गया है। अभी तक केवल चार मुल्कों- हालैंड, कनाडा, लक्जमबर्ग  और बेल्जियम- में ही इच्छा मृत्यु की अनुमति है। दक्षिण कोरिया में इस साल फरवरी से इच्छा मृत्यु की अनुमति दी गई है। सुप्रीम कोर्ट  के ताजा फैसले के बाद भारत अब इच्छा मृत्यु देने वाला दुनिया का छठा मुल्क बन जाएगा। अमेरिका के कुछ राज्यों, जर्मन और जापान में असिस्टिड आत्महत्या अथवा “डाक्टर की सहायता से आत्महत्या“ की अनुमति है। यह भी एक तरह से इच्छा मृत्यु ही है। आस्ट्रेलिया के विक्टोरिया राज्य में 2019 में  असिस्टिड डाइंग स्कीम संबंधी कानून लागू हो जाएगा। बहरहाल, सदियों से दुनिया में इस बात पर जबरदस्त बहस होती रही है कि जिस तरह  सभ्य समाज में हर इंसान को सम्मान से जीने का अधिकार है, उसी तरह उसे गरिमापूर्ण  मृत्यु का भी अधिकार होना चाहिए। मगर समाज यह भी मानता है कि मौत कब आती है, इस पर किसी का वश  नहीं है। इस शाश्वत  सत्य को भी पूरी धरती मानती है कि मौत का समय निश्चित  है, इसे किसी भी सूरत में इसे टाला या समय पूर्व नहीं लाया जा सकता। उन्नत आर्युविज्ञान भी मौत पर काबू नहीं कर पाया है। दुनिया में कैंसर से आज भी हर साल एक करोड से ज्यादा लोग मरते हैं। मौत गरिमापूर्ण नहीं हो सकती।  इन सच्चाई के दृष्टिगत  मृत्यु को इच्छा के अनुसार कैसे संभव बनाया जा सकता है? मांगने पर अगर मौत मिलती तो मानव आत्महत्या ही क्यों करता?  लाइफ स्पोर्ट  सिस्टम से भी रोगी को तब तक जिंदा रखा जा सकता है, जब तक उसे मौत नहीं आ जाती। मानवतावादी  इस बात को लेकर अक्सर चिंता व्यक्त करते हैं कि मृत्युशैया पर लेटे मानव को मरने के लिए छोड देना क्या अमानवीय कृत्य नही है। इच्छा मृत्यु को लेकर देश  में अभी भी कई दिक्कतें है। केन्द्र सरकार इच्छा मृत्यु से जुडे तमाम पहलुओं पर गौर कर रही है और लोगों से सुझाव भी मांगे गए है। इन सब बातों के कारण केन्द्र ने सुप्रीम कोर्ट  में इच्छा मृत्यु का विरोध किया था। इच्छा मृत्यु को लेकर न्यायपालिका की अलग-अलग रही है। 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मानव को जीने के साथ-साथ मरने का भी अधिकार होना चाहिए मगर 1996 में कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 (राइट टू लीव) का उल्लघंन बताया था। 2000 में केरल हाई कोर्ट ने इच्छा मृत्यु को आत्महत्या जैसा बताया था। बहरहाल, गेंद अब सरकार के पाले में है।