जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी (जेएनयू) मामले पर भाजपा और पार्टी समर्थकों द्वारा अदृश्य (क्रिप्टो) फासीवाद का नंगा नाच देश के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। मोदी सरकार और भाजपाई जेएनयू से जुडी एक सामान्य घटना को “राष्ट्रीय अस्मिता“ का मुद्दा बनाकर “अभिव्यक्ति की स्वत्रंतता“ को दफनाने पर आमादा है। भाजपा समर्थकों का अदालत परिसर में वामपंथियों को पीटना, विरोधियों को देशद्रोही साबित करना और अपने किए पर पछतावे की जगह इसकी शेखी बघारना आने वाले खतरे के प्रति आगाह करता है। जेएनयू में अफजल गुरु को शहीद बताने और भारत के खिलाफ नारे लगाने से कहीं ज्यादा खतरनाक फासीवादी मानसिकता है। क्रिप्टो फासीवाद से आज तक कोई भी देश फूल-फूल नहीं पाया है। पिछले कुछ समय की घटनाएं स्पष्ट संकेत दे रही हैं कि भाजपाा और उसके समर्थक फासीवाद को थोपने की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं। उतर प्रदेश के दादरी में गोमांस की आड में मुसलमान को जिंदा जला डालना, कर्नाटक में प्रगतिशील लेखकों की हत्या, हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में दलित छात्र को आत्महत्या के लिए विवश करना और देश की राजधानी में छात्रों ओर पत्रकारों पर हमला जैसी घटनाएं क्रिप्टो फासीवाद का नंगा नाच है। भाजपाई कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को गोली मारने की सार्वजनिक बात करते हैं । आलोचकों को पाकिस्तान जाने की नसीहत देते हैं। फासीवादी मानसिकता के कारण पूरे देश में असहिष्णुता का माहौल व्याप्त है। क्या बोला जाए, क्या लिखा जाए और क्या खाया-पिया जाए, यह सब भाजपाईयों की पसंद का हो तो आप देशभक्त हैं वरना देशद्रोही। जेएनयू में आजाद कश्मीर की आवाल बुलंद करना और अफजल गुरु को शहीद बताना अगर देशद्रोह है तो समूचा कश्मीर राज्य देशद्रोही है। कश्मीर में भारत के खिलाफ नारे लगाना और आजाद कश्मीर की मांग करने वाले सालों से ऐसा कर रहे हैं और आज भी कर रहे है। मगर न तो भाजपा नीत अटल बिहारी वाजपेयी सरकार और न ही मौजूदा मोदी सरकार भारत विरोधी नारों और आजाद कश्मीर की आवाज को दबा पाई है। जम्मू-कश्मीर में मुफ्ती मोहम्मद सईद की मौत होने तक भाजपा पीडीपी के साथ सत्ता का सुख भोग रही थी और अभी भी “अलगाववादियों“ की पैरवीकार पीडीपी के साथ राज्य में सता का सुख भोगने का सपना पाले हुए हैं। जेएनयू मामले में दिल्ली पुलिस की भूमिका भी खासी विवादास्पद रही है। पुलिस की पक्षपातपूर्ण कार्यशैली ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के इन आरोपों को पुष्ट किया है कि दिल्ली पुलिस मोदी सरकार के इशारे पर काम कर रही है। दिल्ली पुलिस जेएनयू में देश विरोधी नारे लगाने वाले प्रमुख आरोपियों को तो आज तक पकड नहीं पाई है मगर जेएनयू के वामपंथी छात्र नेता को टीवी फुटेज पर गिरफ्तार कर लिया जाता है। पुलिस कमिशनर सुबह कहते हैं कि कन्हैया कुमार के खिलाफ पुख्ता सबूत हैं और शाम को मुकर जाते हैं। जाहिर है यह सब केद्र सरकार के इशारे पर किया गया। निसंदेह, देशद्रोह करने वालों को कतई बख्शा नहीं जाना चाहिए और उन्हें कडी से कडी सजा मिलनी चाहिए। पूरा देश यही चाहता है मगर कौन देशभक्त है और कौन देशद्रोही, यह तय करना न्यायपालिका का काम है। कन्हैया कुमार और उन जैसे छात्र देशद्रोही है या नहीं, अब दिल्ली उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय इस बात का फैसला करेगी। भाजपा अथवा अन्य किसी को भी जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित विश्वविधालय ओर उसके छात्रों का कैरियर सियासी हितों के लिए बर्बाद करने का अधिकार नहीं है। भाजपा यह बात भूल गई है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के कारण ही वह केन्द्र और राज्यों में सता में आ पाई है। अपनी दिली बात कहना और औरों की बात सुनना लोकतंत्र का अहम हिस्सा होता है। कश्मीर ही नहीं पूर्वोत्तर भारत भी लंबे समय से अलगाववाद की आग में सुलग रहा है और सेना की तैनाती के बावजूद यह आग बुझ नहीं पाई है। इतिहास इस बात का गवाह है कि लाठी-गोलियों से किसी भी मुक्त आवाज को दबा नहीं जा सकता। इसके विपरीत दबाने से बगावत की चिंगारी और ज्यादा फैलती है। बीजेपी केन्द्र और देश के अधिकतर राज्यों में सता में है। इन हालात में लोकतांत्रिक और प्रगतिशीलल सियासी दलों के समक्ष सबसे बडी चुनौती फासीवादी मानसिकता से लडने की है। और यह लडाई मिलकर ही लडी जा सकती है।
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