अब होगा क्रिकेट का उद्धार ?
अततः दुनिया के समृद्धतम भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड(बीसीसीआई) का काया पलट साफ-साफ नजर आ रहा है। और इस बार भी यह क्रांतिकारी पहल न्यायपालिका को ही करनी पडी है। जो काम सरकार और क्रिकेट के धुरंधर खिलाडी लबे समय से नहीं कर पाए, सर्वोच्च न्यायालय ने वह कुछ ही महीनों में कर दिखाया है। वीरवार को सर्वोच्च न्यायालय ने बीसीसीआई दो टूक शब्दों में निर्देश दिए कि लोढा समिति की सिफारिशों को अविलंब लागू किया जाए। न्यायालय ने इसके लिए बीसीसीआई को 3 मार्च तक का समय दिया है। इस दिन इस मामले की अगली सुनवाई होनी है, इसलिए तब तक बीसीसीआई को लोढा समिति की सिफारिशों को लागू करने वाले एक्शन प्लान को अदालत में पेश करना होगा। वीरवार को बीसीसीआई के वकील ने मामले को लटकाने की पूरी कोशिश की और बीसीसीआई की लीगल कमेटी की सात फरवरी को प्रस्तावित बैठक तक इंतजार करने की गुहार लगाई। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस टी एस ठाकुर और जस्टिस फकीर मोहम्मद इब्राहीम कलीफुल्ला की पीठ नहीं मानी और कहा कि लोढा समिति की रिपोर्ट एकदम सटीक एवं सुधारवादी है। रिपोर्ट को देश के सर्वाधिक प्रतिष्टित न्यायाधीश की अध्यक्षता में तैयार किया गया है और सर्वोच्च न्यायालय चाहता है कि बीसीसीआई इस पर अक्षरश : अमल करे। देश की सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है, इसलिए बीसीसीआई को मानना ही पडेगा और अगर सिफारिशे लागू हो जातीं हैं तो भारत में क्रिकेट के खेल में क्रांतिकारी बदलाव आना तय हैं। देश में क्रिकेट के खेल को कंट्रोल करने के लिए बनाई गई बीसीसीआई में गैर क्रिकेट सियासी लोगों, अफसरों और उधोगपतियों का दबदबा रहने के कारण यह खुद ही कंट्रोल से बाहर हो गई थी। जिन लोगों ने जीवन में कभी बल्ला तक नहीं पकडा, वे बीसीसीआई को चला रहे हैं। बार-बार वही लोग बीसीसीआई पर कुंडली मार कर बैठे हुए हैं। जाहिर है इन हालात में क्रिकेट का सुधार होने से रहा। हालात से तंग आकर मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा। न्यायालय ने बीसीसीआई में सुधारात्मक उपाय सुझाने के लिए देष के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आर एम लोढा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति का गठन किया। 4 जनवरी को लोढा समिति ने न्यायालय को अपनी रिपोर्ट दी। लोढा समिति ने बीसीसीआई में आमूल-चूल परिवर्तन के सुझाव दिए हैं। समिति की अहम सिफारिषों में बीसीसीआई को आरटीआई के अंर्तगत लाना शामिल है। इससे बीसीसीआई की कार्यशैली में पारदर्शिता आएगी। मंत्रियों और अफसरों को बीसीसीआई से बाहर रखकर समिति ने क्रिकेट से जुडे अनुभवी खिलाडियों के लिए मार्ग प्रशस्त किया है। अपने पद और रसूख का इस्तेमाल करके मंत्री-नौकरशाहों ने देश के खेल संगठन को सियासी अखाडा बना रखा है। अध्यक्ष के लिए अधिकतम दो साल की टर्म तय किए जाने से बीसीसीआई पर व्यक्ति विशेष का एकाधिकार नहीं रहेगा। बीसीसीआई के पदाधिकारियों के लिए अधिकतम दो टर्म रखने से सालों से धमा-चौकडी मचाने वालों पर अकुंश लगेगा। सट्टे को वैध बनाने की सिफारिष पर कुछ हलकों में असहमति हो सकती है मगर समिति ने सभी पहलुओं पर गौर करने की बाद ही ऐसी सिफारिश की है। कानूनन प्रतिबंध और पुलिस की सख्ती के बावजूद देश मे क्रिकेट सट्टा धडल्ले से खेला जाता है। इस स्थिति में सट्टे को वैध बनाने से इस अवैध धंधे से जुडे नकारात्मक परिणामों से बचा जा सकता है। आईपीएल के लिए अलग गर्वनिंग बॉडी बनाए जाने से इस मनी-मिंटिंग प्रतियोगता को और ज्यादा कमाऊ बनाया जा सकता है। कुल मिलाकर, लोढा समिति की सिफारिशे क्रिकेट के लिए रामबाण साबित हो सकती है। भारत में गांव-गांव, गल्ल-गल्ली क्रिकेट का जनून है और हर बच्चा, युवक सचिन तेंडुलकर और विराट कोहली बनने का सपना पालता है। इस सपने को साकार कराने के लिए क्रिकेट को फिर से “भद्र लोगों“ की गेम बनाया जाना अनिवार्य है।
अततः दुनिया के समृद्धतम भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड(बीसीसीआई) का काया पलट साफ-साफ नजर आ रहा है। और इस बार भी यह क्रांतिकारी पहल न्यायपालिका को ही करनी पडी है। जो काम सरकार और क्रिकेट के धुरंधर खिलाडी लबे समय से नहीं कर पाए, सर्वोच्च न्यायालय ने वह कुछ ही महीनों में कर दिखाया है। वीरवार को सर्वोच्च न्यायालय ने बीसीसीआई दो टूक शब्दों में निर्देश दिए कि लोढा समिति की सिफारिशों को अविलंब लागू किया जाए। न्यायालय ने इसके लिए बीसीसीआई को 3 मार्च तक का समय दिया है। इस दिन इस मामले की अगली सुनवाई होनी है, इसलिए तब तक बीसीसीआई को लोढा समिति की सिफारिशों को लागू करने वाले एक्शन प्लान को अदालत में पेश करना होगा। वीरवार को बीसीसीआई के वकील ने मामले को लटकाने की पूरी कोशिश की और बीसीसीआई की लीगल कमेटी की सात फरवरी को प्रस्तावित बैठक तक इंतजार करने की गुहार लगाई। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस टी एस ठाकुर और जस्टिस फकीर मोहम्मद इब्राहीम कलीफुल्ला की पीठ नहीं मानी और कहा कि लोढा समिति की रिपोर्ट एकदम सटीक एवं सुधारवादी है। रिपोर्ट को देश के सर्वाधिक प्रतिष्टित न्यायाधीश की अध्यक्षता में तैयार किया गया है और सर्वोच्च न्यायालय चाहता है कि बीसीसीआई इस पर अक्षरश : अमल करे। देश की सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है, इसलिए बीसीसीआई को मानना ही पडेगा और अगर सिफारिशे लागू हो जातीं हैं तो भारत में क्रिकेट के खेल में क्रांतिकारी बदलाव आना तय हैं। देश में क्रिकेट के खेल को कंट्रोल करने के लिए बनाई गई बीसीसीआई में गैर क्रिकेट सियासी लोगों, अफसरों और उधोगपतियों का दबदबा रहने के कारण यह खुद ही कंट्रोल से बाहर हो गई थी। जिन लोगों ने जीवन में कभी बल्ला तक नहीं पकडा, वे बीसीसीआई को चला रहे हैं। बार-बार वही लोग बीसीसीआई पर कुंडली मार कर बैठे हुए हैं। जाहिर है इन हालात में क्रिकेट का सुधार होने से रहा। हालात से तंग आकर मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा। न्यायालय ने बीसीसीआई में सुधारात्मक उपाय सुझाने के लिए देष के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आर एम लोढा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति का गठन किया। 4 जनवरी को लोढा समिति ने न्यायालय को अपनी रिपोर्ट दी। लोढा समिति ने बीसीसीआई में आमूल-चूल परिवर्तन के सुझाव दिए हैं। समिति की अहम सिफारिषों में बीसीसीआई को आरटीआई के अंर्तगत लाना शामिल है। इससे बीसीसीआई की कार्यशैली में पारदर्शिता आएगी। मंत्रियों और अफसरों को बीसीसीआई से बाहर रखकर समिति ने क्रिकेट से जुडे अनुभवी खिलाडियों के लिए मार्ग प्रशस्त किया है। अपने पद और रसूख का इस्तेमाल करके मंत्री-नौकरशाहों ने देश के खेल संगठन को सियासी अखाडा बना रखा है। अध्यक्ष के लिए अधिकतम दो साल की टर्म तय किए जाने से बीसीसीआई पर व्यक्ति विशेष का एकाधिकार नहीं रहेगा। बीसीसीआई के पदाधिकारियों के लिए अधिकतम दो टर्म रखने से सालों से धमा-चौकडी मचाने वालों पर अकुंश लगेगा। सट्टे को वैध बनाने की सिफारिष पर कुछ हलकों में असहमति हो सकती है मगर समिति ने सभी पहलुओं पर गौर करने की बाद ही ऐसी सिफारिश की है। कानूनन प्रतिबंध और पुलिस की सख्ती के बावजूद देश मे क्रिकेट सट्टा धडल्ले से खेला जाता है। इस स्थिति में सट्टे को वैध बनाने से इस अवैध धंधे से जुडे नकारात्मक परिणामों से बचा जा सकता है। आईपीएल के लिए अलग गर्वनिंग बॉडी बनाए जाने से इस मनी-मिंटिंग प्रतियोगता को और ज्यादा कमाऊ बनाया जा सकता है। कुल मिलाकर, लोढा समिति की सिफारिशे क्रिकेट के लिए रामबाण साबित हो सकती है। भारत में गांव-गांव, गल्ल-गल्ली क्रिकेट का जनून है और हर बच्चा, युवक सचिन तेंडुलकर और विराट कोहली बनने का सपना पालता है। इस सपने को साकार कराने के लिए क्रिकेट को फिर से “भद्र लोगों“ की गेम बनाया जाना अनिवार्य है।






