शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

रेलवे पर प्रभु कृपा ?

रेलमंत्री सुरेश  प्रभु की अभी भी रेलवे पर पूरी तरह से कृपा से नहीं हो पाई है। वीरवार को संसद में पेश  रेल बजट से साफ है कि दुनिया की विशाल तम रेल सेवाओं  में शुमार भारतीय रेलवे का उद्धार होते-होते कई साल लग सकते हैं। रेलों में सफर करने वाली आम जनता की माली हालत पर तरस खाते हुए रेल मंत्री ने इस बार भी यात्री किराया नहीं बढाया। तेल की कीमतों में गिरावट का लाभ बजट में साफ दिख रहा है। रेलवे को यात्री किराये से लागत का बमुश्किल  50 फीसदी राजस्व ही मिल पाता है। रेलवे की कमाई का प्रमुख साधन भाडा (फ्रेट) है मगर रेलमंत्री ने इस बार के बजट में फ्रैट भी नहीं बढाया है। कमाई के अन्य कोई पुख्ता विकल्प भी नहीं है। रेलवे की अमूल्य जमीन बेचकर कुछ पैसा जुटाया जा सकता है।  रेलमंत्री ने बजट में यात्रियों को काफी सुविधाएं देने का ऐलान किया है। रेलवे को दुनिया की श्रेश्ठतम जनसेवक बनाने का संकल्प भी दोहराया गया है। इसके लिए रेलवे को अगले पांच सालों में 8.5 लाख करोड रुपयों की दरकार है। अब सवाल यह है कि रेल मंत्री इतनी विशाल  राशि  कहां से लाएंगे? सालों से रेलवे के उद्धार की बडी-बडी घोषणाएं की जा रही हैं और बडी-बडी बातें की जा रही हैं। देश  को आजाद हुए सात दशक होने जा रहे है मगर आज तक लावारिस मानवरहित (अनमैन्ड) फाटकों (क्रॉसिंग) को रेलवे समाप्त नहीं कर पाया है और इस तरह के फाटक लोंगों की सुरक्षा के लिए बडा खतरा बने हुए हैं। हर बार इन फाटकों को नियंत्रित करने का वायदा किया जाता है। इस बार के बजट में रेलमंत्री ने वायदा किया है कि 2020 तक ही मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग समाप्त हो पाएगी। इसी तरह यात्रियों को कंन्फर्म  टिकट सुविधा भी 2020 तक ही मुहैया हो पाएगी। यानी महत्वपूर्ण काम 2020 से पहले पूरे नहीं हो पाएंगेे। मोदी सरकार पांच साल के लिए चुनी गई है। 2019 में लोकसभा चुनाव होंगे और 2020 में नई सरकार होगी। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि अगली बार भी मोदी सरकार ही आएगी और सुरेश  प्रभु ही रेलमंत्री होंगे। इस बात का ख्याल करते हुए सरकार को अपने पांच साल के कार्यकाल के दौरान सभी काम पूरे कर लेने चाहिए़ और ऐसी परियोजनाएं बनानी चाहिए जिन्हें सरकार अपने कार्यकाल में पूरा कर सकें।  बहरहाल, रेलवे को आर्थिक बदहाली के दलदल से बाहर निकालना सुरेश  प्रभु की सबसे बडी चुनौती है। पिछले और अपने पहले बजट में सुरेश  प्रभु ने रेलवे के आधुनिकरण  के लिए डेढ लाख करोड रु जुटाने का प्रस्ताव रखा था और इस साल के बजट में भी रेलमंत्री ने 1.5 लाख करोड जुटाने का प्रस्ताव किया है। पिछले साल रेलमंत्री  इस विशाल पूंजी को जुटा पाए  या नहीं, इसका रेल मंत्री ने अपने भाषण में कोई उल्लेख नहीं किया है। इस बार भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) से रेलवे के लिए डेढ लाख का प्रबंध कर लिया गया है। देश  के वित्तीय विषेसज्ञों को भी इस बात का भरोसा नहीं है कि सरकार रेलवे के उद्धार के वास्ते पांच साल में साढे आठ लाख करोड रु जुटा लेगी। इसकी प्रमुख वजह है कि रेलवे इतनी विशाल  रकम को लौटाने की  स्थिति में ही नही  हैं। रेलवे ही क्या देश  के अधिकांश  सार्वजनिक उपक्रम कर्जा  लौटाने की स्थिति में नही है। पंजाब नेशनल बैंक द्वारा हाल में जारी डिफाल्टरों की सूची में सहकारिता क्षेत्र का अग्रणी उपक्रम नेफेड  बैंक का सबसे बडा डिफाल्टर है। कहते हैं अर्थशास्त्र और राजनीति का छत्तीस का आंकडा होता है। रेलवे जैसे सार्वजनिक उपक्रम भी सशक्त वित्तीय प्रबंध से ही चलाए जा सकते हैं। सरकार को अगर रेलवे को सुचारु रुप से चलाना है तो यात्री किराए और फ्रेट का युक्तिकरण करना होगा। सियासी हितों की खातिर सार्वजनिक उपक्रमों की बलि नहीं नहीं चढाई जानी चाहिए। रेलमंत्री का बजट इस मायने में काबिलेतारीफ है कि उन्होंने इसे यात्री  फ्रेंडली बनाने की कोशिश  की है मगर फोक्ट की सुविधाएं ज्यादा देर तक नहीं चलती। देश  के मध्यम और सभ्रांत तबके आज इस स्थिति में है कि वे सुरक्षित  और आरामदायक रेल यात्रा के लिए कोई भी कीमत दे सकते हैं। फ्यूल की कीमतें गिरने से रेलवे को बचत हो सकती है मगर इसका उपयोग रेलवे के आधुनिकरण के लिए कर सकता है । वित्तीय प्रबंध कहता है “ जो लोग समर्थ  हैं", उनकी जेब ढीली करने में कोई बुराई नहीं है। मगर सियासी स्वार्थ यह सब भुला देता है ।