मन की बात
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को इस साल पहली बार देश के जनमानस से “मन की बात“ की और देश के समक्ष मुंह फैलाए खडी समस्याओं की चर्चा की। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी लगातार आकाशवाणी से प्रसारित कार्यक्रम में लोगों से “मन की बात“ कह रहे हैं। देश का प्रधानमंत्री अगर अपने देशवासियों से “ज्वलंत मुद्दों“ पर “मन की बात“ साझा करते हैं, तो उसका असर होना निश्चित है। आकाशवाणी षहरी क्षेत्रों में भले ही अधिक नहीं सुना जाता हो मगर दूर-सदूर और देहातों में आज भी यह खासी लोकप्रिय है। “मन की बात“ को शहर और देहातों दोनों में बराबर सुना जा रहा है। मुंबई और चेन्नई समेत छह बडे शहरों में इस कार्यक्रम की लोकप्रियता के आकलन के लिए कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार 67 फीसदी लोग प्रधानमंत्री की “मन की बात“ को पूरी शिद्दत से सुनते हैं। आकाशवाणी से “मन की बात“ कार्यक्रम शुरु होने के बाद इसके राजस्व (विज्ञापन) में भी खासा इजाफा हुआ है। कार्यक्रम की लोकप्रियता का आलम यह है कि “मन की बात“ विज्ञापन के मामले में आकाशवाणी पर क्रिकेट के ”आंखों देखा“ (लाइव कमेंट्री)“ जैसे लोकप्रिय कार्यक्रमों से कही अधिक महंगा है। 27 जनवरी 2015 को प्रसारित 35 मिनट के “मन की बात“ कार्यक्रम को 14.70 करोड लोगों ने सुना था। तब इस कार्यक्रम में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भी शरीक हुए थे। यह अपनेआप में एक रिकार्ड है। आकाशवाणी के अलावा दूरदर्शन नेशनल और दूरदर्शन न्यूज भी “मन की बात“ का लाइव प्रसारण करते हैं। 3 अक्टूबर, 2014 को दशहरे पर प्रधानमंत्री के “मन की बात“ का पहली बार प्रसारण हुआ था। अब तक “मन की बात“ के 15 प्रसारण हो चुके हैं और इसकी वेबसाइट पर 61,000 से ज्यादा आइडियाज मिल चुके हैं। इसके लिए 1.43 लाख ऑडियो भी मिल चुके हैं। मगर वेब साइट बहुत अच्छा रिसपांस का न आना कार्यक्रम के लिए थोडा चिंता का विषय हो सकता है। आकाशवाणी का पोस्ट बॉक्स 111 इस कार्यक्रम पर मिलने वाली चिठठियों के लिए खास तौर पर आरक्षित है। मगर इस मामले में कोई अच्छा रिसपांस नहीं है। दिसंबर, 2014 को “मन की बात“ कार्यक्रम को सबसे ज्यादा 5972 चिठ्ठियां मिलीं थीं। उसके बाद से इसमें लगातार गिरावट आ रही है। आनलाइन रिसपांस कहीं ज्यादा है। बहरहाल, देश के प्रधानमंत्री ने पहली बार सकारात्मक पहल शुरु की है और इस कार्यक्रम के माध्यम से प्रधानमंत्री लोगों को सरकारी कार्यक्रमों से जोडने का प्रयास कर रहे हैं। इसके परिणाम भले ही बडे पैमाने पर न हों मगर कहते हैं हर नेक काम की शुरुआत कितनी भी छोटी क्यों न हो, इसका अंजाम बहुत बडा होता है। देश को आज जिस तरह से गंभीर समस्या-दर-समस्या से दो चार होना पड रहा है और समकालीन सियासी नेताओं की क्रेडिबिलिटी जिस कद्र खराब है, उसका ख्याल करते हुए प्रधानमंत्री का यह प्रयास सराहनीय है और इसके शर्तिया अच्छे परिणाम सामने आने वाले हैं। “मन की बात“ कार्यक्रम में जनमानस से जुडे मुद्दों पर चर्चा की जाती है। “मन की बात“ में अब तक मोदी स्वच्छता, ड्रग, किसानों की समस्याएं जैसी ज्वलंत मुद्दों की चर्चा कर चुके हैं। इस कार्यक्रम का जनता पर काफी असर भी पडता है। यह प्रधानमंत्री के मन की बात कार्यक्रम का ही असर है कि पूरे देश में लोग-बाग अब आस-पास सफाई का खास ख्याल रख रहे हैं। “मेक इन इंडिया“ को सफल बनाने के लिए प्रधानमंत्री का खाद्दी को मुख्य मुद्दा बनाया है। दोनों ही कार्यक्रम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से प्रेरित हैं। स्वच्छता और खाद्दी (स्वदेषी वस्त्र) महात्मा गांधी की स्वत्रंतता आंदोलन के केन्द्रबिंदु रहे हैं। शुरू में महात्मा गांधी के स्वच्छता और स्वदेशी कार्यक्रमों का फिरंगियों ने मजाक उड़ाया था मगर बाद में पूरी दुनिया में इनकी सराहना की गई। देश को सामाजिक-आर्थिक प्रगति के पथ पर आगे ले जाने के लिए प्रधानमंत्री की “मन की बात“ बदलाव लाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को इस साल पहली बार देश के जनमानस से “मन की बात“ की और देश के समक्ष मुंह फैलाए खडी समस्याओं की चर्चा की। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी लगातार आकाशवाणी से प्रसारित कार्यक्रम में लोगों से “मन की बात“ कह रहे हैं। देश का प्रधानमंत्री अगर अपने देशवासियों से “ज्वलंत मुद्दों“ पर “मन की बात“ साझा करते हैं, तो उसका असर होना निश्चित है। आकाशवाणी षहरी क्षेत्रों में भले ही अधिक नहीं सुना जाता हो मगर दूर-सदूर और देहातों में आज भी यह खासी लोकप्रिय है। “मन की बात“ को शहर और देहातों दोनों में बराबर सुना जा रहा है। मुंबई और चेन्नई समेत छह बडे शहरों में इस कार्यक्रम की लोकप्रियता के आकलन के लिए कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार 67 फीसदी लोग प्रधानमंत्री की “मन की बात“ को पूरी शिद्दत से सुनते हैं। आकाशवाणी से “मन की बात“ कार्यक्रम शुरु होने के बाद इसके राजस्व (विज्ञापन) में भी खासा इजाफा हुआ है। कार्यक्रम की लोकप्रियता का आलम यह है कि “मन की बात“ विज्ञापन के मामले में आकाशवाणी पर क्रिकेट के ”आंखों देखा“ (लाइव कमेंट्री)“ जैसे लोकप्रिय कार्यक्रमों से कही अधिक महंगा है। 27 जनवरी 2015 को प्रसारित 35 मिनट के “मन की बात“ कार्यक्रम को 14.70 करोड लोगों ने सुना था। तब इस कार्यक्रम में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भी शरीक हुए थे। यह अपनेआप में एक रिकार्ड है। आकाशवाणी के अलावा दूरदर्शन नेशनल और दूरदर्शन न्यूज भी “मन की बात“ का लाइव प्रसारण करते हैं। 3 अक्टूबर, 2014 को दशहरे पर प्रधानमंत्री के “मन की बात“ का पहली बार प्रसारण हुआ था। अब तक “मन की बात“ के 15 प्रसारण हो चुके हैं और इसकी वेबसाइट पर 61,000 से ज्यादा आइडियाज मिल चुके हैं। इसके लिए 1.43 लाख ऑडियो भी मिल चुके हैं। मगर वेब साइट बहुत अच्छा रिसपांस का न आना कार्यक्रम के लिए थोडा चिंता का विषय हो सकता है। आकाशवाणी का पोस्ट बॉक्स 111 इस कार्यक्रम पर मिलने वाली चिठठियों के लिए खास तौर पर आरक्षित है। मगर इस मामले में कोई अच्छा रिसपांस नहीं है। दिसंबर, 2014 को “मन की बात“ कार्यक्रम को सबसे ज्यादा 5972 चिठ्ठियां मिलीं थीं। उसके बाद से इसमें लगातार गिरावट आ रही है। आनलाइन रिसपांस कहीं ज्यादा है। बहरहाल, देश के प्रधानमंत्री ने पहली बार सकारात्मक पहल शुरु की है और इस कार्यक्रम के माध्यम से प्रधानमंत्री लोगों को सरकारी कार्यक्रमों से जोडने का प्रयास कर रहे हैं। इसके परिणाम भले ही बडे पैमाने पर न हों मगर कहते हैं हर नेक काम की शुरुआत कितनी भी छोटी क्यों न हो, इसका अंजाम बहुत बडा होता है। देश को आज जिस तरह से गंभीर समस्या-दर-समस्या से दो चार होना पड रहा है और समकालीन सियासी नेताओं की क्रेडिबिलिटी जिस कद्र खराब है, उसका ख्याल करते हुए प्रधानमंत्री का यह प्रयास सराहनीय है और इसके शर्तिया अच्छे परिणाम सामने आने वाले हैं। “मन की बात“ कार्यक्रम में जनमानस से जुडे मुद्दों पर चर्चा की जाती है। “मन की बात“ में अब तक मोदी स्वच्छता, ड्रग, किसानों की समस्याएं जैसी ज्वलंत मुद्दों की चर्चा कर चुके हैं। इस कार्यक्रम का जनता पर काफी असर भी पडता है। यह प्रधानमंत्री के मन की बात कार्यक्रम का ही असर है कि पूरे देश में लोग-बाग अब आस-पास सफाई का खास ख्याल रख रहे हैं। “मेक इन इंडिया“ को सफल बनाने के लिए प्रधानमंत्री का खाद्दी को मुख्य मुद्दा बनाया है। दोनों ही कार्यक्रम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से प्रेरित हैं। स्वच्छता और खाद्दी (स्वदेषी वस्त्र) महात्मा गांधी की स्वत्रंतता आंदोलन के केन्द्रबिंदु रहे हैं। शुरू में महात्मा गांधी के स्वच्छता और स्वदेशी कार्यक्रमों का फिरंगियों ने मजाक उड़ाया था मगर बाद में पूरी दुनिया में इनकी सराहना की गई। देश को सामाजिक-आर्थिक प्रगति के पथ पर आगे ले जाने के लिए प्रधानमंत्री की “मन की बात“ बदलाव लाने में अहम भूमिका निभा सकता है।






