स्टॉक मार्केटस में इन दिनों चौतरफा अफरा-तफरी का माहौल है। निवेशक मार्केट्स से हाथ खींच रहे हैं और शेयर बाजार में मदंडिओं का दबदबा व्याप्त है। भारतीय स्टॉक मार्केट का ही नहीं, अलबत्ता पूरी दुनिया का यही हाल है। शुक्रवार को हालांकि सेंसेक्स और निफ्टी में मामूली सुधार दर्ज हुआ मगर जुलाई 2009 के बाद शेयर बाजार में अब तक की सबसे बडी साप्ताहिक गिरावट दर्ज हुई। शुक्रवार को 0.15 फीसदी की बढत के बावजूद इस सप्ताह सेंसेक्स में 6.62 फीसदी की गिरावट आई है। निफ्टी 0.07 फीसदी बढत के बावजूद इस सप्ताह 6.78 फीसदी गिरा है। वीरवार को चार दिन की लगातार गिरावट के कारण सेंसेक्स 23,000 के स्तर से भी नीचे चला और निफ्टी 23 माह के न्यूनतम स्तर 7000 के नीचे फिसल गया। चार दिनों की गिरावट के कारण शेयरधारकों को सात लाख करोड रु का फटका लग चुका था। एशिया की अन्य मार्कैटस का तो और भी बुरा हाल है। शुक्रवार को एशियन शेयर्स में लगातार छठे दिन भी गिरावट जारी रही। अमेरिका और यूरोप की शेयर मार्केटस भी भीषण मंदी के दौर से गुजर रही है। यूरोपियन स्टॉक्स 2013 के बाद अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच गए हैं। डॉउ जांस बद से बदतर होता जा रहा है। मार्केटस के अभी मंदी से उभरने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं। मार्केटस में मंदी व्याप्त रहने के तीन प्रमुख कारण है। पहला और सबसे प्रमुख कारण है अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में लगातार गिरावट। 110 डॉलर प्रति बैरल से गिरते-गिरते कच्चे तेल की कीमत बाजार में 30 डॉलर बैरल से भी नीचे आ गई है और जून तक इसके 20 डॉलर तक फिसल जाने की संभावना जताई जा रही है। मांग की तुलना में सप्लाई कहीं ज्यादा है मगर तेल उत्पादक देश उत्पादन को नियंत्रित करने के लिए जरा भी तैयार नहीं है। तेल की कीमतें गिरने से तेल उत्पादक देशों की कमाई में खासी कमी आई और इससे आमदन घटी है। नतीजतन, निवेश भी गिरा है। उधर, यूरोप में ब्याज दरें बेहद कम है और वहां लबे समय से मंदी व्याप्त रहने के कारण निवे कों को कोई रिटर्न नहीं मिल रही है। जापान ने हाल ही में नेगेटिव ब्याज दर नीति अपनाई है। इसका मतलब है जापान का सेंट्रल बैंक अन्य बेंकों को बगैर ब्याज लिए कर्ज दे रहा है। निवेशक अमेरिका की तरफ रुख करना चाहते हैं मगर अमेरिकी सेंट्रल बैंक फेड रिजर्व भी ब्याज दरें दस साल से यथावत रखे हुए हैं। फेड रिजर्व की अध्यक्ष जेनेट येलेन ने स्पष्ट कहा है कि फिलहाल ब्याज दरें नहीं बढेंगी। इन हालात में निवेशक इधर- उधर भटक रहे हैं। चीन में स्लोडाउन ने हालत और बिगाड दिए हैं। उभरती अर्थव्यवस्था में भारत एकमात्र ऐसा देश हैं जो फिलहाल मंदी से बचा हुआ है मगर बैंकिग सेक्टर में बढती अव्यवस्था ने बाजार को निरुत्साहित कर रखा है। राष्ट्रीयकृत बैंकों में सबसे बडे लैंडर स्टेट बैक ऑफ इंडिया का तिमाही मुनाफा पांच साल में पहली बार 67 फीसदी गिरा है। पंजाब नेशनल बैंक की इस बार की तिमाही रिपोर्ट भी काफी खराब है। इस बैंक का तीसरी तिमाही का मुनाफा 93 फीसदी गिरा है। इससे पहले सेंटल बैंक ऑफ इंडिया, इलाहाबाद और देना बैंक भी मुनाफे में जबरदस्त गिरावट रिपोर्ट कर चुके हैं। इसके लिए बैड लोंस प्रमुख रुप से जिम्मेदार हैं। राष्ट्रीयकृत बैंक पर बैड लोंस का बोझ 2.5 लाख करोड रु को पार कर चुका है। यह राशि 2जी स्कैम से भी कहीं ज्यादा। पिछले तीन सालों में ही 27 राष्ट्रीयकृत बैंक 1.15 लाख करोड रु के बैड लोंस माफ कर चुके हैं। इससे बैंको के शेयर्स लगातार गिर रहे हैं। बैंकों पर अब निवेशकों को जरा भी भरोसा नहीं रहा है। बाजार में लिक्विडी की भारी कमी तीसरी वजह है। शेयर बाजार में 70 फीसदी से ज्यादा कारोबार विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) करते हैं। पिछले एक माह में विदेशी निवेशक 11000 करोड रु की निकासी कर चुके हैं और गत तीन सेशन में 1100 करोड निकाल चुके हैं। इन हालात में शेयर बाजार का मंदी से उभरना आसान नहीं है। निवेशक इस माह की 29 तारीख को पेश होने जा रहे बजट की प्रतीक्षा में है। बाजार को मंदी से उभारने के लिए बजट में निवेशकों को रियायतों की दरकार है।
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