मंगलवार (23 फरवरी) से संसद का बजट सत्र शुरु हो रहा है और इस बार भी सत्र के हंगामापूर्ण रहने की संभावना जताई जा रही है । विपक्ष के पास अरुणाचल प्रदेश में दल-बदलुओं की सरकार का गठन, जाट आंदोलन जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी (जेएनयू), हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमूला की आत्महत्या और पठानकोट आतंकी हमले जैसे कुछ ज्वलंत मुद्दे हैं जिन्हें आगे करके वह लोकसभा में मोदी सरकार को घेरने की कोशिश करेगी। गनीमत है कि राज्यसभा की कार्यवाही के सुचारु संचालन के लिए उपराष्ट्रपति और सभापति हामिद अंसारी की पहल पर सरकार और विपक्ष में “ गतिरोध की जगह बहस “ पर सहमति हो गई है। गुडस एंड सर्विसस टैक्स (जीएसटी) और बैंकरप्सी एंड रियल एस्टेट जैसे महत्वपूर्ण बिल राज्यसभा द्वारा मौजूदा सत्र के पहले चरण में ही पारित कर लिए जाएंगे। बजट सत्र का पहला चरण 16 मार्च को खत्म हो जाएगा। सत्र का दूसरा चरण 25 अप्रैल से शुरु होकर 13 मई तक चलेगा। राज्यसभा में 11 बिल और लोकसभा में पांच बिल पेंडिंग हैं। कुल मिलाकर इस सत्र में सरकार 73 बिल पेश करेगी। इन मेंसे 26 बिल को महत्वपूर्ण माना जा रहा है और इन्हें पारित करवाना सरकार के समक्ष सबसे बडी चुनौती है। लोकसभा में सरकार को कोई रुकावट आडे नहीं आएगी क्योंकि राजग के पास खासा बहुमत है। राज्यसभा में सरकार को विपक्ष की मदद लेनी पडेगी। सरकार राज्यसभा में जेएनयू और रोहित वेमूला मामले में चर्चा के लिए मान गई है। विपक्ष को यह बात समझ में आ गई है कि देश का जनमानस बार-बार संसद की कार्यवाही को बाधित करने पर राजनीतिक दलों से खासा क्षुब्ध हो रहा है। उपराष्ट्रपति ने बैठक में स्पष्ट शब्दों में कहा कि सियासी दलों को “डिस्रप्शन “ की जगह “डिबेट“ को प्राथमिकता देनी चाहिए। संसद की कार्यवाही को बाधित करके देश को अच्छा-खासा नुकसान होता है। लोकसभा सचिवालय के आकलन अनुसार संसद के एक घंटे के संचालन पर सरकार को 25 लाख रु खर्च करने पडते हैं। इस हिसाब से अगर सत्र 8 घंटे चलता है तो सरकार को हर रोज 2 करोड रु का खर्चा वहन करना पडता है। जाहिर है अगर संसद की कार्यवाही चार घंटे भी बाधित रहती है, तो जनता की गाढी कमाई का एक करोड रु जाया हो जाते हैं। 2013 के बजट सत्र में विपक्षी भाजपा ने कोयला घोटाले (कोलगेट से कुख्यात), चीन की भारतीय सीमा में घुसपैठ और जेपीसी रिपोर्ट पर संसद की कार्यवाही बार-बार बाधित की, जिससे लोकसभा का 51 फीसदी और राज्यसभा का 52 फीसदी समय जाया हो गया था । उस साल संसद के मॉनसून सत्र का 77 फीसदी हंगामे के कारण जाया हो गया था। 14वीं लोकसभा अपने पांच साल के कार्यकाल में कुल 200 दिन की सीटिंग भी नहीं कर पाई जबकि 300 सीटिंग तो होनी ही चाहिए। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने भी माना है कि साल में कम-से-कम 60 सीटिंग तो होनी ही चाहिए मगर् मौजूदा 15वीं लोकसभा का रिकार्ड भी कोई ज्यादा बेहतर नहीं है। अब तक 12 सत्रों में लोकसभा के 643 घंटे हंगामे की भेंट चढ चुके हैं। यानी जनता के मौजूदा प्रतिनिधि भी जनता को अब तक 160 करोड रु से ज्यादा का नुकसान कर चुके हैं। देश की जनता सांसदों और विधायकों को संसद अथवा विधानसभा की कार्यवाही को बाधित (डिस्रपट) करने के लिए नही, बल्कि ज्वलंत मुद्दे उठाने और उन पर विस्तार से चर्चा करने के लिए चुनती है। दुखद स्थिति यह है कि सांसदों को चर्चा में कोई रुचि नहीं रहती है। आंकडों के आनुसार संसद में बजट पर 25 फीसदी से ज्यादा समय तक चर्चा हो ही नहीं पाई जबकि पश्चिम देशों की संसद बजट पर 80 फीसदी से भी ज्यादा समय तक चर्चा करती है। इन हालात में प्रश्न यह उठता है कि सांसदों अथवा विधायकों को संसद अथवा विधानसभा/मंडल की कार्यवाही बाधित करने की प्रवृति से रोका जाना चाहिए। ऐसा करने के लिए सांसद अथवा विधायक को सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेना अनिवार्य किया जाना चाहिए। इस पर राष्ट्र व्यापी बहस होनी चाहिए।
मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016
Why Not Compulsory Participation of Legislators In House Proceedings?
Posted on 9:28 am by mnfaindia.blogspot.com/






