आजाद भारत में अलगाववाद और आतंक के बाद आरक्षण के मुद्दे ने देश की अखंडता और सामाजिक एकता पर सबसे ज्यादा कुठाराघात किया है। आरक्षण ने सामाजिक ताने-बाने को बुरी तरह से तहस-नहस कर डाला है। हरियाणा में सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण की मांग को लेकर जाटों का आंदोलन इस बात का ताजा प्रमाण है। इस आंदोलन ने राज्य को 35,000 करोड रु से ज्यादा का नुकसान तो किया ही है, समाज को भी बांट कर रख दिया है। हरियाणा खापों और चौपालों की सामाजिक न्यायिक व्यवस्था के लिए विख्यात रहा है और सामाजिक एकता की मिसाल भी रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में खापों की अनुमति के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता है। मगर आरक्षण के मामले में खाप भी दो फाड हो गई है। सियासी दलों ने अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए आरक्षण को जमकर भुनाया है। समाज का हर वर्ग आरक्षण चाहता है। इससे आरक्षण का मूल मकसद राजनीतिक कुव्यवस्था में लुप्त हो गया है। आजादी के बाद माना गया था कि अगडे और पिछडे वर्ग में समान आईक्यू वाले बच्चे में बराबरी नहीं हो सकती। अगडे तबके का बच्चा पिछडे की तुलना में बेहतर लालन-पालन और सुख-सुविधाओं के बलबूते आगे निकल जाता है। इसी बिला पर सामाजिक रुप से पिछडे तबकों को अगडों की बराबरी पर लाने के लिए तब सामाजिक तोर पर पिछड़े दलितों एवं कबालियों को सरकारी नौकरियों एवं शैक्षणिक संस्थानों के साथ-साथ संसद और विधानसभाओं- मंडलों में भी 27 फीसदी आरक्षण दिया गया। यह संवैधानिक व्यवस्था थी। इसलिए दलितों को अनुसूचित जाति एवं कबालियों का अधिकृत दर्जा दिया गया। तत्कालीन नेतृत्व का मकसद नेक और राष्ट्रीय हित में था और समाज के हर वर्ग ने खुशी -खुशी इसे माना भी। शुरु में यह भी माना गया कि पिछडों के अगडों के बराबर आते ही आरक्षण की व्यवस्था को समाप्त कर लिया जाएगा। ऐसा समय कब आएगा, यह तय करना समकालीन सरकार का काम था। आजादी के सात दशक बाद अगडे और पिछडे का तुलनात्मक आकलन सामाजिक पिछडेपन से नहीं किया जा सकता। आज स्थिति यह है कि अगडो में भी अधिकतर परिवार आर्थिक रुप से पिछडों की तुलना में अधिक कमजोर हैं। आरक्षण की चिंगारी के सुलगने की यही प्रमुख वजह है। दुखद स्थिति यह है कि राजनीतिक दलों ने उतरोत्तर आरक्षण को सियासी हितों के लिए भुनाना शुरु कर दिया और इसी वजह दलित और कबायली लंबे समय तक कांग्रेस का भरोसेमंद वोट बैंक भी रहा। आजादी के तीस साल बाद 1977 में पहली बार केन्द्र में गैर कांग्रेस जनता पार्टी की सरकार सता में आई थी । 1979 में इस सरकार ने “सामाजिक और शैक्षणिक“ तौर पर पिछडे तबकों की पहचान के लिए सांसद बीपी मंडल की अध्यक्षता में मंडल कमीशन नियुक्त किया। कमीशन ने कुल मिलाकर 3743 उप-जातियों की पहचान करके इन्हें सामाजिक और शैक्षणिक पिछडा बताया। कमीशन का आकलन था कि अनुसूचित एवं जनजातियों के अलावा देश की 54 फीसदी आबादी सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर काफी पिछडी हुई हैं और इनके सामाजिक-आर्थिक उत्थान की जरुरत है। इससे पहले कि मंडल कमीशन की सिफारिषें लागू हो पातीं, जनता सरकार ही गिर गई। तत्पश्चात 1989 में भाजपा के समर्थन से बनी विश्व्नाथ प्रताप सिंह सरकार ने मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करने का प्रयास किया पर देश के कई क्षेत्रों में आरक्षण विरोधी आग भडक गई। तब भी मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू नहीं हो पाईं। बाद में कई राज्यों ने पिछडे तबकों को आरक्षण दिया मगर इसके पीछे पिछडेपन से कहीं ज्यादा राजनीतिक स्वार्थ रहा है। हालांकि आरक्षण 50 फीसदी से ज्यादा नहीं दिया जा सकता मगर तमिल नाडु और सयुंक्त आंध्र प्रदेश में आरक्षण 50 फीसदी सीमा को लांघ चुका है। इस बात में दो राय नहीं है कि हरियाणा के जाट शैक्षणिक तौर पर अपेक्षाकृत पीछे हैं मगर आरक्षण का आधार शैक्षणिक पिछडापन नहीं बनाया जा सकता। दलितों को लंबे समय से आरक्षण की सुविधा है मगर आंकडे गवाह हैं कि 90 फीसदी दलित आज भी शैक्षणिक रुप सें काफी पिछडे हैं। आरक्षण का जिन्न बार-बार बोतल से बाहर निकल आता हे। इस जिन्न को बोतल मे बंद रखने के लिए एक विकल्प यह है कि आरक्षण को आर्थिक पिछडेपन के आधार पर दिया जाए।
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