बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

कश्मीर में अनिश्चतता के बादल

                                         

लोकप्रिय सियासी नेता के राजनीतिक क्षितिज से चले जाने पर सियासी हालात कैसे बदल सकते हैं, जम्मू-कश्मीर  में करीब एक माह से व्याप्त राजनीतिक  अनिश्चतता इस बात का प्रमाण है। एक माह पहले तक राज्य में लोकप्रिय सरकार थी मगर अब राज्यपाल  शासन है। जम्मू-कश्मीर  देश  का अति संवेदनशील और सीमावर्ती राज्य  है। राजनीतिक शू न्यता राज्य के नाजुक हालात को और ज्यादा बिगाड सकते हैं। 2015 में सपन्न विधानसभा चुनाव में अलगाववादियों की धमकी के बावजूद राज्य की जनता ने चुनाव में बढचढ कर हिस्सा लिया था और लोकप्रिय सरकार के पक्ष में फतवा दिया था। त्रिशंकू जनादेश  के कारण पीडीपी और भाजपा ने मिलकर सरकार बनाई। इस जनवरी की 7 तारीख को मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद का अकस्मात निधन होने के बाद से सत्तारूढ दल पीडीपी (पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी)  भाजपा से  गठबंधन जारी रखने पर खासी दुविधा में है। पार्टी तय नही कर पा रही है कि सरकार बनाने के लिए भाजपा का सहयोग लिया जाए या नहीं। पीडीपी के अधिकांश  विधायक और सांसद भाजपा से गठबंधन के सख्त खिलाफ हैं। मुफ्ती के निधन के बाद राज्य में नई सरकार बन ही नहीं पाई हालांकि भाजपा गठबंधन जारी रखने के पक्ष में थी और पार्टी  महबूबा मुफ्ती को मुख्यमंत्री बनाने के लिए तैयार थी। मुफ्ती के निधन के बाद अब पार्टी का सारा दारोमदार  महबूबा मुफ्ती पर है और पार्टी के सभी विधायक उन्हें ही मुफ्ती असली वारिस  मानते हैं। पर महबूबा अपने पिता की तरह राजनीति की मंझी हुई खिलाडी नहीं है। राज्य में व्याप्त अलगाववादी और हिंसक माहौल उन्हें जल्दबाजी में कदम उठाने की इजाजत भी नहीं देते हैं। अपनी पिता से अलग महबूबा को सत्ता की बयार के संग बहना गवारा नहीं लग रहा है।  मुफ्ती मोहम्मद सईद इस कौशल में माहिर थे। 2015 में सपन्न विधानसभा चुनाव में त्रिशंकू जनादेश  के कारण  मुफ्ती ने भाजपा के साथ सरकार बनाने में जरा भी देरी नहीं की। चुनाव में मुफ्ती की पीडीपी को सबसे अधिक सीटें मिलीं थी। मुफ्ती अस्सी के दशक में  भाजपा के समर्थन वाली वीपी सिंह सरकार में काम कर चुके हैं। 1989 में वीपी सिंह की जनता दल सरकार में वे गृहंमत्री थे। वीपी सिंह सरकार को भाजपा का बाहरी समर्थन था। इस दौरान उनकी बेटी रुबैया सईद का आतंकवादियों ने कश्मीर  मे अपहरण कर लिया था। रुबैया की रिहाई के बदले तत्कालीन सरकार को पांच खूंखार आतंकियों को रिहा करना फ्डा था। भाजपा ने इसका का जबरदस्त विरोध किया था।  1999 में मुफ्ती ने अपनी अलग पार्टी पीडीपी बनाई और 2002 के विधानसभा चुनाव में 18 सीटें हासिल करने के बाद कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई। मुफ्ती की पार्टी का गठन ही अलगाववादियों को राष्ट्रीय  मुख्यधारा में  जोडने के मकसद से किया गया और पार्टी आज भी इस स्टैंड पर कायम है। इसके उलट भाजपा अलगाववादियों से सख्ती से निपटने के पक्ष में है, उनसे बातचीत करना तो दीगर रहा। पीडीपी राज्य को विशेषतौर पर मिले संवैधानिक दर्जे (अनुच्छेद 370) क़ो बनाए रखने की प्रबल पैरवीकार है जबकि भाजपा इस अनुच्छेद को निरस्त करने के पक्ष में है। भाजपा को मुस्लिम विरोधी माना जाता है और भाजपाई अक्सर मुसलमानों के खिलाफ आग उागलते है। पीडीपी कश्मीर  घाटी में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करती है। और भी कई मुद्दे हैं जिन पर दोनों दलों में खासा मतभेद है। नीतियों ओर विचारधारा में भारी मतभेद के बावजूद भाजपा के साथ सरकार बनाने पर पीडीपी को “अवसरवादी“ माना गया। यही चिंता महबूबा मुफ्ती को सताए जा रही है। भाजपा के साथ सरकार बनाने से पीडीपी का ज्यादा नुकसान हो रहा है। मौजूदा स्थिति में अगर पीडीपी भाजपा के साथ सरकार बनाती है, तो पार्टी का घाटी में जनाधार सिकुड सकता है। महबूबा मुफ्ती अभी युवा हैं और राजनीति में उन्हें लंबा सफर तय करना है। अवसरवादिता और सत्ता की भूख उनके लंबे राजनीतिक कैरियर को लकवा मार सकती है। मध्यावधि चुनाव एक विकल्प हो सकता है और इस स्थिति में पीडीपी को मुफ्ती के निधन से उपजी सहानुभूति का लाभ भी मिल सकता है। मगर इससे राज्य पर चुनाव का खामखवाह का बोझ पडेगा। फिर से त्रिशंकू जनादेश  भी मिल सकता है।