गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

केन्द्र के एजेंट नहीं है राज्यपाल

देश में राज्यपाल पद को लेकर जब-तब विवाद उठता रहा है। कई बार राज्यपाल अपनी  शक्तियों का दुरुपयोग करके केन्द्र सरकार के राजनीतिक हितों को पोषित कर इस संवैधानिक पद की गरिमा पर प्रहार करते रहे हैं। दिल्ली में “आम  आदमी पार्टी“ की सरकार और उप-राज्यपाल नजीब जंग में जबरदस्त जंग छिडी हुई है। उप-राज्यपाल प्रचंड बहुमत से चुनी गई अरविंद  केजरीवाल सरकार को विफल करने में कोई कसर नहीं छोड रहे हैं। स्पष्ट  है यह सब केन्द्र के इशारे पर किया जा रहा ह। हाल ही में अरुणाचल प्रदेश  के राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा ने संवैधानिक व्यवस्था का निरादर करके कांग्रेस नीत सरकार को अपदस्थ करने की मंशा  से विधानसभा का सत्र काफी पहले (16 दिसंबर को) ही बुला लिया। इससे पहले राज्यपाल सरकार की सिफारिश  पर विधानसभा का सत्र 24 जनवरी को आहुत कर चुके थे और इसकी बाकायदा अधिसूचना जारी भी की गई थी। कांग्रेस के 21 विधायकों के दल बदल के बाद राज्यपाल ने यह कदम उठाया। जाहिर यह सब भी केद्र के इशारे पर किया गया। राज्यपाल को अपने तौर पर राज्य विधानसभा का सत्र बुलाने का कोई अधिकार नहीं हैै। संविधान में  स्पष्ट व्वयस्था  है कि राज्यपाल मंत्रिमंडल के परामर्श   के बगैर कोई काम नहीं कर सकते।  गुवाहटी उच्च न्यायालय ने राज्यपाल के इस कदम को  गैर-संवैधानिक करार देते हुए व्यवस्था दी कि यह संविधानिक शक्तियों का सरासर दुरुपयोग है। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने भी यही व्यवस्था दी है कि राज्यपाल को विधानसभा सत्र बुलाने का कोई अधिकार नहीं है। दिल्ली अथवा अरुणाचल प्रदेश  से पहले भी राज्यपाल केन्द्र के एजेंट की तरह काम करते रहे है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए  कांग्रेस द्वारा नियुक्त राज्यपाल कमला बेनिवाल से जबरदस्त टकराव रहा था। राज्यपाल ने 2013 में गुजरात विधानसभा द्वारा पारित लोकायुक्त बिल को मंजूरी देने की बजाय उसे लौटा दिया और खुद लोकायुक्त को नियुक्त कर दिया था ।  कमला बेनिवाल मोदी सरकार द्वारा महिलाओं को स्थानीय निकाओं (लोकल बॉडीज) मे 50 फीसदी आरक्षण देने वाले बिल समेत कई बिलों पर कुंडली मार कर बैठी रहीं। केन्द्र में मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही बेनिवाल को पहले स्थानांतरित करके त्रिपुरा भेजा गया और फिर उन्हें डिसमिस कर दिया गया। इससे पहले 15 अगस्त, 1984 को आन्ध्र प्रदेश  के तत्कालीन मुख्यमंत्री एनटी रामाराव को राज्यपाल राम लाल ठाकुर ने रातोंरात अपदस्थ करके एन भास्कर राव को मुख्यमंत्री की शपथ दिला दी थी। रामाराव उस समय अमेरिका में इलाज करवा रहे थे। रोचक बात यह है कि राज्यपाल ने संवैधानिक औपचारिकताओं को पूरा तक नहीं किया। विधानसभा चुनाव के समय  कांग्रेस से एनटीआर की पार्टी तेलुगू देशम में  शामिल हुए भास्कर राव को इस बिला पर मुख्यमंत्री बना दिया कि उन्हें टीडीपी के अधिकतर विधायकों का समर्थन प्राप्त है जबकि ऐसा कुछ भी नहीं था। कहते हैं राम लाल ने यह सब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर किया था। राज्यपाल की शक्तियों के घोर दुरुपयोग का यह अनोखा मामला था। संविधान में राज्यपाल के अधिकारों और शक्तियों का साफ-साफ उल्लेख है। इसके बावजूद राज्यपाल संविधान का निरादर करने से बाज नहीं आते हैं। सर्वोच्च न्यायालय से मंगलवार को  व्यवस्था दी कि राज्यपाल को संविधान में सीमित अधिकार दिए गए हैं और वे मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल के फैसले को निरस्त नहीं कर सकते। अरुणाचल प्रदेश  के राज्यपाल की विधानसभा सत्र को पहले बुलाने की कार्यवाही पर  न्यायालय ने यह व्यवस्था दी। निष्कर्ष  यह है कि देश  में राज्यपाल पद की गरिमा उतरोतर गिरती जा रही है। इसकी वजह है समकालीन सरकार द्वारा अस्वीकृत राजनीतिक लोगों और सेवानिवृत नौकरशाहों को पुनर्वासित करने के लिए उनकी संवैधानिक पद पर नियुक्ति। इस स्थिति में राज्यपालों का केन्द्र सरकार के प्रति अहसानमंद रहना स्वभाविक है। देश  के संघीय ढांचे की सेहत के लिए यह स्थिति ठीक नहीं है। बेहतर यही होगा कि जजों की नियुक्ति की तरह राज्यपाल की नियुक्त के लिए भी निष्पक्ष  और तटस्थ व्यवस्था की जाए। मोदी सरकार आर्दशवादी होने का दावा करती है। इस मामले में पहल करके वह ऐसा साबित कर सकती है।