शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

कब तक सियाचिन में सैनिक शहादत पाते रहेंगे?

सियाचीन में 35 फीट बर्फ में छह दिन तक मौत से लडता रहा, आखिरी सांस तक हारा नहीं, 125 घंटों तक जिंदगी और मौत के बीच झूलता रहा मगर दिल्ली के आर्मी अस्पताल में सैनिक हनुमनथप्पा जिंदगी की लडाई हार गया। देश  की करोडों दुआएं भी उसे बचा नहीं पाई और न ही अत्याधुनिक मेडिकल साइंस उसके किसी काम आई। इस योद्धा का बचना भी चमत्कार ही माना जा रहा था। डाक्टरों ने उनकी हालत को बेहद गंभीर बताया था।  वीरवार सुबह वीर सैनिक  हनुमनथप्पा ने आखिरी सांस ली। हनुमनथप्पा की मौत से पूरा देश  गमगीन है। बहादुरी की मिसाल सैनिक  हनुमनथप्पा को बचाने के लिए पूरा देश  दुआएं कर रहा था कि एक और चमत्कार हो जाए ओर बहादुर सैनिक  हनुमनथप्पा  बच जाए। हरिद्धार की गुरुकुल कांगडी यूनिवर्सिटी की यज्ञशाला में अध्यापकों और छात्रों ने हनुमनथप्पा की सलामती के लिए महामृत्युंजय मंत्रों का जाप तक किया। टीवी-रेडियो पर  हनुमनथप्पा की किडनी और लीवर के निष्क्रिय   होने की खबर पर लोग वीर सैनिक के अमूल्य जीचन को बचाने के लिए आगे आए। किसी ने अपने गुर्दे पेश  किए तो किसी ने लीवर और अन्य अंग। उत्तर प्रदेष की एक महिला ने जब सुना कि लांसनायक हनुमनथप्पा की किडनी खराब है, वह फौरन अपनी किडनी  देने आगे आई। मुंबई के एक पूर्व-सैनिक भी इसी तरह आगे आए और हनुमनथप्पा के लिए अपने किसी भी अंग देने को तैयार थे। पर मौत के आगे किसी की नहीं चलती। डाक्टरों की लाख कोशिशों  के बावजूद इस वीर सैनिक को बचाया नहीं जा सका। हनुमनथ्प्पा वीरगति पा गया और पीछे छोड गया बहादुरी और अदम्य साहस की बेमिसाल गाथा।  हनुमनथप्पा 2002 में सेना में भर्ती हुआ था और अपने 13 साल की सर्विस में 10 साल तक बार्डर पर तैनात रहा। 2003 से 2006 तक हनुमनथप्पा ने जम्मू-कश्मीर  में आतंकरोधी ऑपरेशन में सक्रिय भूमिका निभााई । 2008 से 2010 तक इस योद्धा ने स्वेच्छा से राष्ट्रीय  राइाफक्स में सेवाएं दी और इसके तुरंत बाद  हनुमनथ्प्पा ने 2012 तक पूर्वोत्तर सीमा पर स्वेच्छा से पोस्टिंग ले ली। दिसंबर 2015 से यह योद्धा 19600 फुट की ऊंचाई पर स्थित दुनिया की सबसे ऊंची चौकी पर तैनात था। सियाचीन में छह दिन तक 35 फीट बर्फ में दबे रहने के बाद सोमवार को हनुमनथप्पा को जिंदा पाकर पूरा देश  खुशी  से झूम उठा था। उसके नौ साथी बर्फ  में दबकर मारे गए थे। कहते हैं “ बहादुर मौत को भी चकमा दे जाते हैं“। हनुमनथप्पा ने भी 125 घंटों तक मौत को चकमा दिया। 35 फीट बर्फ  में दबकर माइनस 40 डिग्री तापमान में किसी का छह दिन तक जिंदा रहना किसी अलौकिक चमत्कार से कम नहीं था। और देशवासी फिर इसी चमत्कार की आस लगाए हुए थे। मगर चमत्कार बार-बार नहीं होते हैं।  अतंत, सियाचीन का योद्धा जिंदगी की लडाई हार गया। हनुमनथप्पा की शहादत ने देश  को उसका ऋणी बना दिया है। पूरा देश  जब चैन से सो रहा होता है,  हनुमनथप्पा जैसे हमारे बहादुर सैनिक सियाचीन में हड्डियों को कंपा देने वाली ठंड में ग्लेशियरों के इस  खतरनाक द्धीप की निगरानी करते हैं। सियाचीन हिमाच्छित क्षेत्र है जहां आस-पास आबादी का कोई नामो-निशान नहीं है। सियाचीन की रखवाली के लिए भारत ने वहां सेना की सात बटालियन तैनात कर रखी है। इन पर देश  को हर रोज लगभग 5 करोड और सालान 1800 करोड रु खर्च करने पडते हैं। इसकी तुलना में पाकिस्तान को अपने अधीन सियाचीन क्षेत्र में तैनात तीन बटालियन पर प्रतिदिन लगभग डेढ करोड रु अथवा सालाना 540 करोड रु खर्च करने पडते हैं। इस क्षेत्र में अक्सर एवालांच आते हैं और इनमें भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त कर जाते हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर सियाचिन में ऐसा क्या है कि सैनिकों को बार-बार शहादत्त देनी पडती है। इस क्षेत्र की निगरानी के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं तैयार की जाती ? प्रोन्नत टकनॉलॉजी का जमाना  है और आजकल रोबोट हर काम करते हैं। ताजा जानकारी अनुसार अमेरिका में 2 लाख 60 हजार रोबोट फैक्ट्ररियों में कम कर रहे हैं। सियाचिन जैसे दुर्गम क्षेत्र की निगरानी की वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए।