मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

Who Are We To Decide Who Is Patriot and Who's Not?

अभिव्यक्ति की स्वत्रंतता को कुचलना और आलोचना को न सह पाना आजादी के लिए सबसे बडा खतरा होता है, महान विचारकों के दर्शन  का यही निचोड है। जवाहरलाल  यूनिवर्सिटी (जेएनयू ) में छात्र नेता कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी  और छात्रों एवं अध्यापकों के मुक्त विचारों को दबाने की  मोदी सरकार  कार्रवाई यही संकेत दे रही है। मोदी सरकार आलोचना (डिसेंट)  को देशद्रोह बता कर देश की  सर्वोत्तम शैक्षणिक संस्था को तहस-नहस करने पर आमादा लग रही .है।   दुखद बात यह है कि  राष्ट्रीयता  की आड में संवैधानिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। जेएनयू देश  की  प्रतिष्ठित  यूनिवर्सिटी है। 2012 में नेशनल असेसमेंट  एंड  एक्रिडिशन काउंसिल ने जेएनयू को सबसे ज्यादा 4 मेंसे 3. 9 ग्रेड दिया था। देश  के अन्य किसी भी  यूनिवर्सिटी को यह ग्रेड नहीं मिला है। इंडिया टूडे पत्रिका ने जेएनयू को देश  की दूसरी सर्वोतम यूनिवर्सिटी माना है। इसके बावजूद मोदी सरकार को जेएनयू फूटी आंख नहीं सुहा रही है। इसकी वजह है कि इस यूनिवर्सिटी में वामपंथी विचारधारा का जोर है और भाजपा से सम्बद्ध अखिल भारतीय परिषद (एबीवीपी) का जेएनयू में मोदी सरकार के आने के बाद भी दबदबा नहीं बन पाया है। जिस तरह दिल्ली यूनिवर्सिटी में आजतक अखिल भारतीय परिशद का दबदबा (कभी -कभी कांग्रेस से संबंद्ध एनएसयूआई भी) रहा है और वामपंथी  यहां फटक तक नहीं पाए हैं, उसी तरह जेएनयू में एबीवीपी भी वामपंथियो को रोक नहीं पाई है। यही वजह है कि मोदी सरकार वामपंथी छात्र संगठनों से जुडे नेताओं और अध्यापकों के पीछे पडी हुई है।  गृहमंत्री राजनाथ सिंह का बयान सााफ-साफ बताता है कि मोदी सरकार जेएनयू को लेकर कितनी संवेदनषील है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह के अनुसार जेएनयू में 9 फरवरी को आयोजित इवेंट में लश्कर के  आतंकी हाफिज सईद का हाथ है। अगर ऐसा है तो सरकार और उसकी खुफिया एजेंसियां आज तक कहां थी? समय रहते उन छात्रों को क्यों नहीं पकडा गया, जो हाफिज सईद के संपर्क  में थे।  सरकार ने 9 फरवरी तक क्यों हालात को हाथ से फिसलने दिया? क्या राजनाथ सिंह नहीं जानते है कि मौजूदा केबिनेट सचिव और इंटेलीजेंस ब्यूरो (आईबी) के निदेशक भी जेएनयू के छात्र रहें है। देश  के कई आला अधिकारी और राजनीतिज्ञ जेएनयू के छात्र रहे हैं। और ये सब जेएनयू को देशद्रोही गतिविधियों का मंच बताने के आरोप को सिरे से खारिज करेंगे।  पूरी दुनिया में यूनिवर्सिटीज  मुक्त विचार व्यक्त करने के मंच रहे हैं। पश्चिम   में आक्सफोर्ड, हावर्ड, लंदन स्कूल ऑफ इक्नॉमिक्स जैसी नामी यूनिवर्सिटीज बाकायदा मुक्त विचारों के लिए विख्यात है। आजादी से पहले आक्सफोर्ड  यूनिवर्सिटी में भारत की आजादी के संघर्ष   और गांधी-नेहरु  पर खासी चर्चा  हुआ करती थी। इसका यह मतलब नहीं था कि यह यूनिवर्सिटी देशद्रोही तत्व का मंच थी। यूनिवर्सिटीज को विभिन्न विचारधारओं को संगम माना जाता हैं। इनमें ज्वलंत विषयों पर शोध होता है, व्याख्यान दिए जाते हैं और मुक्त विचार व्यक्त किए जाते हैं। लोकतंत्र में हर नागरिक को अपनी बात कहने का पूरा-पूरा अधिकार होता है। इसे राष्ट्रीयता  अथवा राष्ट्र -विरोधी विचारधारा में नहीं बांधा जा सकता । कौन देशभक्त है और कौन देशद्रोही, यह साबित करना कानून का काम है। राजनीतिक विरोधियों की आवाज दबाने और लोकतांत्रिक सस्थाओं को कुचलने से लोकतंत्र कभी भी फल-फूल नहीं सकता। इस बात को भाजपा से ज्यादा और कौन जानता है। आपातकाल में भाजपा कांग्रेस और तत्कालीन प्रधानमंत्री पर यही आरोप लगाती रही है। मोदी सरकार की मौजूदा कार्रवाई ने आपातकाल की यादों को तरोताजा कर दिया है। तब कांग्रेस सरकार विरोधियों को दबाने के लिए ऐसे ही हथकंडे अपनाया करती थी। युवा अक्सर भावनाओं में बह जाते हैं और अगर वे दिशा  भटक जाते हैं, उन्हें सही मार्ग दिखाना और राष्ट्रीय  मुख्यधारा से जोडना राष्ट्र  की जिम्मेदारी है। स्वतंत्र  विचार व्यक्त करने से कोई देशद्रोही नहीं बन जाता। भाजपा को यह खुशफहमी है कि केवल उससे जुडे लोग ही देशभक्त है। सच्चाई यह है कि मुक्त एवं स्वतंत्र आवाज को दबाकर लोकतंत्र का गला घोटना भी देशद्रोह जैसा है।