गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

Let There Be a More Vibrant President Address To Parliament

हर साल की तरह इस बार भी राष्ट्रपति के  अभिभाषण में सरकार की उपलब्धियों का ही बखान किया गया है। राष्ट्रपति  का अभिभाषण  सरकार द्वारा तैयार किया जाता है, जाहिर है  सरकार इसमें अपनी आलोचना करने से रही।  यही परंपरा है और देश  के प्रथम  नागरिक को इस परंपरा का ही निर्वहन करना होता है। मंगलवार को  राष्ट्रपति  प्रणब मुखर्जी ने अपने अभिभाषण में इस बात पर जोर दिया कि संसद में “गतिरोध“(डिसरप्नश ) की बजाए “बहस (डिबेट) अथवा चर्चा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। संसद देश  की सर्वोच्च संस्था है और यह लोगों की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं को परिलक्षित करती है। यानी विपक्ष को संसद में गतिरोध को छोडकर बहस अथवा चर्चा करनी चाहिए। जनमानस भी यही चाहता है। संसद में गतिरोध से जनता की कमाई जाया होती है और इससे सिवा विपक्षी सदस्यों की अहं संतुश्टि के कुछ भी हासिल नहीं होता है। जनता सांसदों को उनकी समस्याओं का निराकरण करने और दबे-कुचलों एवं असहायों की आवाज  संसद में  बुलंद करने के लिए चुनती है। और अगर सांसद ऐसा करने की बजाए संसद की कार्यवाही को बाधित करते हैं तो उनके चुने जाने के कोई उपयोगिता नहीं रह जाती है। इससे लोकतंत्र ही कमजोर होता है। यही बात उपराष्ट्रपति  और राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी ने सांसदो के साथ बैठक में कही। मगर संसद में सरकार के नीतियों और कार्यक्रमों की  आलोचना अथवा विरोध करना और ज्वलंत मुद्दों पर ध्यानाकर्षण  प्रस्ताव पेश  करना संसदीय व्यवस्था का अहम हिस्सा है। विपक्ष भी संसद की कार्यवाही को वाधित करने के पक्ष में नहीं होता है और उसे मजबूरन ऐसा करना पडता है। जीवंत (वाइब्रेंट) संसदीय व्यवस्था में चर्चा अथवा बहस के अलावा भी जनता की आवाज उठाने के तरीके अपनाए जाते हैं और हर लोकतांत्रिक देश  में यही होता है। तथापि भारतीय संसदीय व्यवस्था इग्लैंड के ”वेस्टमिनिस्टर“ की नकल है। इसी व्यवस्था में  राष्ट्रपति  को देश  का सर्वोच्च पद तो  माना गया है मगर सीमिति अधिकार दिए गए हैं।  राष्ट्रपति को वही करना पडता है जो मंत्रिमंडल उन्हें करने को कहती है। इस व्यवस्था में  राष्ट्रपति  की राय कोई मायने नहीं रखती। अगर सरकार के किसी फैसले से  राष्ट्रपति  सहमत नहीं है तो वे  ज्यादा से ज्यादा वह उस फैसले पर सरकार से पुनर्विचार करने को कह सकते हैं। इसके बात भी अगर सरकार वही फैसला लेती है, तो  राष्ट्रपति  को मानना ही पडता है। इग्लैंड में भी यही व्यवस्था है और वहां महारानी   नाममात्र (सेरेमोनियल) की मुखिया है। मगर इग्लैंड में महारानी लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए सतत प्रयासरत रहती है। भारत में  राष्ट्रपति भी ऐसा कर सकते हैं।  राष्ट्रपति पद की अपनी गरिमा है और उनका कहा हर शब्द सरकार के कानों में फौरन सुनाई देता है। भारत में हर साल संसद के पहले सत्र में  राष्ट्रपति  और राज्य विधानसभाओं में राज्यपाल के अभिभाषण की परंपरा है मगर यह कोई ज्यादा उपयोगी साबित नहीं हुई है। अधिकतर अभिभाषण नीरस होते हैं और  इसमें सरकार का गुणगान होता है। अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान बहस भी अक्सर नीरस होती है। साल का पहला सत्र ज्यादातर मामलों में क्योंकि बजट सत्र होता है, इसलिए लोगों को बजट में अधिक रुचि रहती है। और बजट को पहले लीक नहीं किया जा सकता।  राष्ट्रपति  के अभिभाषण में भी बजट की कोई झलक तक दिखाई नहीं देती है। इस स्थिति में ऐसे अभिभाषण  की कोई ज्यादा प्रासंगिकता नहीं रह जाती। राश्ट्रपति देश  का प्रथम नागरिक होता है और उन्हें देश  की हर छोटी-बडी समस्या से अवगत होना चाहिए। इस बात के मद्देनजर  अभिभाषण में सरकार की उपलब्धियों की जगह  अगर  राष्ट्रपति  सरकार के समक्ष जनता का पूरा साल का एजेंडा पेश  करें और सरकार को उस पर संजीदगी से काम करने को कहें, तो यह ज्यादा उपयोगी साबित हो सकता है। बेशक यह एजेंडा सरकार की राय से तैयार किया जाए, मगर परंपरागत अभिभाषण की बजाए लोगों की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं को परिलक्षित करना संसदीय व्यवस्था को ज्यादा मजबूत कर सकता है।