राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून में मोदी सरकार द्वारा प्रस्तावित बदलाव से संप्रग सरकार का महताकांक्षी कार्यक्रम अपने मूल मकसद से भटक सकता है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून एक्ट (एफएसए) बनाकर मनमोहन सिंह सरकार ने देश के हर व्यक्ति को दो वक्त के भरपेट भोजन की व्यवस्था की थी। तीन साल पहले पारित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एक्ट जुलाई 2013 से लागू भी हो गया था। इस एक्ट के तहत देश की लगभग दो-तिहाई आबादी को सस्ते में खाद्यान्न मुहैया कराना था। एफएसए के तहत सार्वजनिक वितरण व्यवस्था (पीडीएस) से हर परिवार को प्रति सदस्य 5 किलो ग्राम खाद्यान्न सस्ती दरों पर दिया जा रहा है। चावल तीन रु किलो, गेंहूं 2 रु किलो और दाले एक रु किलो के दाम पर बेचा जा रहा है। गर्भवती महिलाओं और कुपोषित बच्चों को अलग से सस्ते में तीन वक्त का खाद्यान्न दिया जाता है । दुनिया की विशालतम गरीबी उन्मूलन इस योजना पर सरकार को 1. 25 लाख करोड रु अथवा सकल घरेलू उत्पाद का 1.5 फीसदी और सरकार के बजट का 8 फीसदी खर्च करना पड रहा है। कांग्रेस शासित असम सरकार ने 14 दिसंबर, 2015 से इस एक्ट को लागू कर दिया है। ओडीशा की बीजू जनता दल सरकार 17 नवंबर, 2015 से ही खाद्य सुरक्षा एक्ट को लागू कर चुकी है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और छतीसगढ एफएसए को संजीदगी से लागू कर चुकी है। लेकिन लगभग 20 राज्य इस योजना को लागू नहीं कर पाए हैं । गत सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात को एफएसए लागू नहीं करने पर फटकार भी लगाई। मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद इस राष्ट्रीय सुरक्षा कार्यक्रम का आकलन करने के लिए वाजपेयी सरकार में खाद्य मंत्री रहे शांता कुमार की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। शांता कुमार समिति ने 21 जनवरी को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। समिति ने देश के फूड बाउल राज्यों में भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) आधारित दोषपूर्ण वितरण व्यवस्था को बदलने और गरीबतम परिवारों को छोडकर अन्यों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से आधे दाम पर खाद्यान्न मुहैया कराने की सिफारिश की है। सब्सिडी को रसोई गैस की तरह सीधे पात्र व्यकित के बैंक खाते में जमा करने की सिफारिश भी की गई है । बतौर केन्द्रीय खाद्य मंत्री शांता कुमार एफसीआई में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड चुके हैं और वे इस सरकारी उपक्रम की कार्यशैली से खासे नाखुश भी थे। अगर इन सिफारिशों को लागू किया जाता है, तो इस योजना पर होने वाले खर्च में काफी बचत हो सकती है। मोदी सरकार भी यही चाहती है। बदलाव के लिए सरकार को मौजूदा कानून में संशोधन करना पडेगा और इसके लिए संसद में बिल लाना पडेगा। ताजा संकेत यही हैं कि सरकार 2013 के खाद्य सुरक्षा एक्ट में संशोधन के लिए जमीन तैयार कर रही है। बढते राजकोशीय घाटे के मद्देनजर मोदी सरकार विभिन्न सब्सिडियों पर होने वाले खर्च को कम करना चाहती है और फूड सब्सिडी पर होने वाला खर्च सभी परिव्ययों में सर्वाधिक है। सरकार के राजकोषीय घाटे में 18 फीसदी हिस्सा फूड सब्सिडी का है। अंतरराष्ट्रीय रेंटिग एजेंसी मूडी का आकलन है कि पिछले आठ सालों में सरकार का फूड सब्सिडी खर्चा हर साल 20 फीसदी बढा है। मोदी सरकार ने सब्सिडी का बोझ घटाने के लिए भी एक समिति बना रखी है। यह समिति भी फूड सब्सिडी को कम करने की सिफारिश कर सकती है। तथापि, मोदी सरकार के लिए खाद्य सुरक्षा एक्ट में संशोधन करना इतना आसान नहीं है। कांग्रेस इस तरह के किसी भी संशोधन का जमकर विरोध कर सकती है। मोदी सरकार को 2013 में पारित भूमि अधिग्रहण बिल में प्रस्तावित संशोधनों को भी कांग्रेस के मुखर विरोध के कारण वापस लेना पडा था। फूड सब्सिडी एक्ट में संशोधनों को गरीब विरोधी माना जा सकता है। असम में अप्रैल-मई माह में विधानसभा चुनाव होने है और इस राज्य में खाद्य सुरक्षा एक्ट लागू है। कांग्रेस शासित असम में भाजपा बदलाव की उम्मीद कर रही है और सत्ता की प्रमुख दावेदार है। इन बात का ख्याल करते हुए खाद्य सुरक्षा एक्ट में संशोधन का प्रस्ताव उलटा भी पड सकता है। भाजपा इस सच्चाई से बखूबी परिचित है कि समकालीन सरकार व्यावहारिक से नहीं बल्कि वोट आधारित राजनीतिक फैसलों से ही चलाई जाती है।
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