मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

महाभियोगः न्यायपलिका पर प्रहार

कांग्रेस की अगुवाई में सात विपक्षी दलों द्वारा  शुक्रवार को देश  के मुख्य न्यायाधी  जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ  महाभियोग का नोटिस बेहद दुखद है।  कई दिनों से इस बात की चर्चा  हो रही थी। प्रस्ताव का पारित होना तो दीगर रहा, कांग्रेस के पास लोकसभा में प्रस्ताव पेष करने के लिए भी पर्याप्त सांसदों का समर्थन नहीं है। लोकसभा में प्रस्ताव पेष करने के लिए कम-से-कम 100 सांसदों के दस्तखत की जरुरत होती है। महाभियोग का प्रस्ताव राज्यसभा में पेष करने के लिए 50 सांसदों के हस्ताक्षर होने चाहिए। षुक्रवार को पेष महाभियोग प्रस्ताव पर 71 सांसदों के दस्तखत हैं। और अगर राज्यसभा अध्यक्ष एवं उप-राश्ट्रपति ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया तो जस्टिस दीपक मिश्रा महाभियोग का सामना करने वाले पहले मुख्य न्यायाधीष होंगे। राश्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट  और हाई कोर्ट के जजों को हटाने के लिए महाभियोग प्रकिया का इस्तेमाल किया जाता है।  इससे पहले एक बार सुप्रीम कोर्ट के जज और एक बार हाई कोर्ट  जज के खिलाफ महाभियोग के प्रस्ताव पेष तो हुए  मगर पारित नहीं हो पाए।  देष की न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार मुख्य न्यायाधीष के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव पेष किया गया है। 1993 में सुप्रीम कोर्ट के जज वी रामास्वामी महाभियोग का सामना करने वाले पहले जज थे मगर यह महाभियोग प्रस्ताव लोक सभा में गिर गया था। तब सतारूढ दल कांग्रेस ने महाभियोग प्रस्ताव में हिस्सा नहीं लिया था, इसलिए यह पारित नहीं हो पाया। इसके लिए वही तर्क  दिए गए, जो अब सत्त्तारूढ दल दे रहा है। कलकत्ता हाई कोर्ट के जज सौमित्र सेन के खिलाफ  2011 में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। राज्यसभा में प्रस्ताव पारित भी हो गया मगर इससे पहले कि लोकसभा इसे पारित करती, उन्होंने खुद ही इस्तीफा दे दिया। 2011 में सिक्किम हाई कोर्ट  के चीफ जस्टिस पीडी दिनाकरन ने महाभियोग प्रस्ताव पेष होने से पहले ही पद छोड दिया था। 2015 में गुजरात हाईकोर्ट के जस्टिस जे बी पार्टीवाला पर जाति से जुडी अमर्यादित  टिप्पणी के लिए महाभियोग लाने की तैयारी चल ही रही थी कि उन्होंने माफी मांग ली और मामला आगे नहीं बढा। उसी साल मध्य प्रदेष हाई कोर्ट के जस्टिस एसके गंगेल के खिलाफ जांच के दौरान आरोप साबित नहीं होने के कारण महाभियोग का प्रस्ताव नहीं लाया जा सका। आंध्र प्रदेष -तेलंगाना के जस्टिस सीवी नागार्जुन के खिलाफ 2016 और 2017 में दो बार महाभियोग लाने की कोषिष की गई मगर दोनों ही बार प्रस्ताव को प्रयाप्त समर्थन नहीं मिला। जजों के खिलाफ महाभियोग लाने की लंबी और जटिल प्रकिया है। पहले प्रस्ताव पेष करने के लिए पर्याप्त समर्थन की दरकार होती है, फिर संसद में पारित करवाने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरुरत। इतना (दो-तिहाही ) बहुमत सिर्फ  सतारूढ दल के पास ही होता है, विपक्ष के पास नहीं। इस बात के दृश्टिगत  सतारूढ दल के समर्थन के बगैर राश्ट्रपति अथवा जजों के खिलाफ महाभियोग का पारित होना कतई मुमकिन नहीं है। कांग्रेस और महाभियोग लाने वाली पार्टियां यह बात भली-भांति जानती है। फिर देष के मुख्य न्यायाधीष के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने का क्या औचित्य? जाहिर है यह सब न्यायपालिका पर दबाव डालने के लिए किया जा रहा है। कांग्रेस ने जो पांच कारण गिनाए हैं, उनमें भी “राजनीतिक स्वार्थ“ की बू आ रही है। कांग्रेस के वरिश्ठ नेता और पेषे से वकील सलमान खुर्षीद ने प्रस्ताव का मुखर विरोध किया है। पूर्व  प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह ने भी प्रस्ताव पर दस्तखत नहीं किए है। साफ है महाभियोग पर कांग्रेस में ही मतभेद है। न्यायपालिका की निश्पक्षता और स्वायत्तता लाने के लिए ही  संविधान में महाभियोग की व्यवस्था की गई है। देष में न्यायपालिका ही एकमात्र विष्वसनीय संस्था रह गई है। अवाम इस पर पूरा भरोसा करती है। सियासी लोग अब इस संस्था की निश्पक्षता को भी पचा नहीं पा रहे हैं।